हास्य-व्यंग्य –
अप्रैल फूल डे / प्रमोद
यादव
एक विदेशी yuvakयुवक और
युवती एक दिन भारत-दर्शन करते-करते मेरे कस्बे को कृतार्थ करने आ धमके तो मुझे बड़ा
आश्चर्य हुआ कि मेरे अंगने में इनका क्या काम ?मैंने पूछा-‘ यहाँ कैसे ’ तो उसने
बताया कि तीन महीने का टूर है... लालकिला, जंतर-मंतर, कुतुबमीनार, ताजमहल, चारमिनार,गेटवे
आफ इण्डिया...आदि देखते-देखते..घुमते-घुमते..शहर दर शहर भटकते थोडा आराम करने के
मूड में कस्बे आ गए..सुना है कि भारत गावों का देश है और गावों में जो सुख-शान्ति
मिलती है..वह कहीं नहीं मिलती..अब क़स्बा क्रास करके ही तो गाँव जायेंगे न.. फिर
थोडा रुककर बोले-‘ इधर आसपास कोई देखने लायक चीज है क्या ? ‘
मैंने कहा- ‘ हाँ..है...और
वो चीज मै हूँ..’
‘ आपमें ऐसा क्या है जो
दर्शनीय हैं ? ’ उसने सवाल किया.
‘ मैं लम्बे समय से यहाँ के
लोगों को मूर्ख बनाते आ रहा हूँ..और लोग हैं कि आज भी चुनाव में मुझे वोट कर संसद
भेज देते है..उस पर तुर्रा यह कि पिछले बीस सालों से सत्ता में हूँ.. सरकार किसी
भी पार्टी की बने.. मेरा उसमें मंत्री बनना तय रहता है.. ‘
‘ अच्छा..तो आप दल-बदलू हैं
?’
‘ नहीं... दल-बदलू
नहीं..दिल-बदलू हूँ..जहां और जिस पार्टी से दिल जुड़ने को कहता है, जुड़ जाता
हूँ..सामने वाला ( पार्टी ) जानते-बूझते भी मूर्ख बनने तैयार है तो मुझे क्या उज्र
?’
‘ हाँ..मैंने सुना है कि
आपके यहाँ बारहों महीने “ अप्रैल-फूल डे “ मनाने का रिवाज है..बाकी
दुनिया केवल एक दिन एक अप्रैल को इसे मनाकर छक जाती है पर हिन्दुस्तान के
बाशिंदे बारहों महीना मनाते नहीं
छकते..गजब का स्टेमिना है लोगों का.. आप सब को नमन करता हूँ..’
‘ हाँ..आपने ठीक सुना
है..एक अप्रैल को छोड़ सारे दिन हम “ अप्रैल-फूल डे “ मनाते हैं..’
‘ एक अप्रैल से भला क्या एलर्जी है जो इसे छोड़
देते है ?’ उसने आश्चर्य व्यक्त किया.
‘ अब एक दिन तो आप लोगों के
लिए भी छोड़ना पडेगा न..इस दिन आप सब एक दूजे को मूर्ख बना संतुष्ट हो लेते
हैं..हमारे लोग तो जड़ तक संतुष्टि चाहते है..इसलिए साल भर इस सिलसिले को चलाते
है..एक-दूसरे को बेवकूफ बनाते है...नेता जनता को झूठे वायदे कर मूर्ख बनाता
है..ठेकेदार घटिया सामग्री उपयोग कर शहर को बेवकूफ बनाता है..सरकारी आदमी रिश्वत
खाकर ही काम (मजाक) करता है..दूधवाला दूध में पानी मिलाकर मूर्ख बनाता
है..दुकानदार बट्टे मारकर बट्टा लगाता है..मतलब कि मूर्ख बनने-बनाने का खेल अनवरत चलते रहता है.. “ अप्रैल-फूल डे “ यहाँ बारहमासी है..’
‘ वेरी गुड...सचमुच आप लोगों ने काफी तरक्की की
है..हमारे लोग तो पागलपन की हद तक इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें कुछ याद भी नहीं
रहता..कभी-कभी तो लोग देर रात काम कर घर लौटते हैं तो सुबह ही उन्हें मालूम पड़ता
है कि पूरी रात गलत घर, गलत बिस्तर और गलत बीबी के साथ गुजार दिए..’
मैंने तुरंत टोका- ‘ ऐसे में तो रोज ही हंगामा
होता होगा..’
‘ नो...नो..कोई हंगामा नहीं होता..सब के साथ ऐसा
होते रहता है..चुपचाप लोग बहुत ही सौम्यता के साथ “सारी” बोल निकल जाते
हैं..हमारे यहाँ सब झगड़ों की एक ही दवा है-“सारी”
मारो-पीटो और “सारी” बोल दो...लड़ाई
ख़तम..हमारे कोर्ट भी इसलिए ही बड़े फ़ास्ट हैं..यहाँ की तरह तारीख पे तारीख... तारीख
पे तारीख नहीं करते ...बस जज पूछता है-आपने इसके पेट में छूरा घोंपा..अपने बचाव
में कुछ कहना हो तो कहो...और अपराधी केवल एक शब्द “सारी” भर बोलता है और जज
तुरंत उसके रिहाई के आदेश दे देता है...’
‘ अच्छा दोस्त..वेरी वेरी सारी..मैं ये पूछना तो
भूल ही गया कि आपके साथ जो “मेम” हैं वो आपकी गर्लफ्रेंड है या आपकी वाईफ है ? ‘
गोरी मेम को देख उससे पूछा.
‘ नहीं डियर..न गर्लफ्रेंड है न ही वाईफ...पहले
तो विचार था कि वाइफ के साथ टूर करू..पर एक दोस्त ने सलाह दी कि क्यों कचरा करते
हो..किसी गर्लफ्रेंड के साथ जाओ तो जिंदगी का मजा है..बीबी साथ होगी तो रास्ते भर
केवल हिसाब-किताब ही करती रहेगी..तो क्या खाक मजा करोगे ? इसलिए एक गर्लफ्रेंड को
आफर किया था पर समय पर वह एरोड्रम नहीं पहुंची..एकाएक ये दिख गई..इनसे पूछा तो
बोली कनाडा जाना है..मैंने कहा-मेरे साथ दो महीने घूमकर चल देना..और ये मान
गई..अभी-अभी मुझे मालूम हुआ है कि ये मेरे बचपन के एक दोस्त की बीबी है.. उसकी
शादी में नहीं जा सका था इसलिए पहचान न सका. वैसे मैंने दोस्त को बता दिया है कि
उसकी बीबी फिलहाल मेरे साथ टूर पर है...’
मैंने कटाक्ष करते कहा- ‘ मान गए यार..एक अप्रैल
तो कल है पर आप विगत दो महीनों से अपने दोस्त को मूर्ख बना रहे है..उनकी बीबी के
साथ ऐश कर रहे हैं..’
‘ नहीं मित्र...ऐसा मत कहिये..हम मूर्ख बनाते
हैं तो बनते भी हैं.. कल ही मेरे इस दोस्त ने फोन कर बताया कि वह भाभीजी ( मेरी
वाईफ )को लेकर बैंकाक-यात्रा पर है..उसने ये भी कहा है कि अगले महीने की पंद्रह
तारीख को मिस्त्र के पिरामिड के पास मिलेंगे और अदला-बदली कर लेंगे..’
‘ सचमुच यार...तुम विदेशी लोग बड़े जीनियस होते
हो..हम तो कामवाली बाई को सिनेमा भी नहीं ले जा सकते और तुम लोग दूसरे की बीबी को
बड़े हौले से वर्ल्ड टूर करा ले आते हो.. कल एक अप्रैल है..कल का क्या प्रोग्राम
है..किसे मूर्ख बनाने का इरादा है?’
‘ कल तो अपने इस दोस्त को ही बेवकूफ
बनायेंगे..कहेंगे कि उसकी बीबी माँ बनने वाली है..हास्पिटल में एडमिट है..देखना
फिर..क्या मजा आता है..’
‘ अच्छा दोस्त...तो फिर कल मिलते हैं..”आल फूल्स डे “ की हार्दिक
बधाईयाँ..’
दूसरे दिन – सुबह-सुबह उनसे मिलने लाज गया तो वह
काफी परेशान दिखा . पूछा तो बताया कि अभी कुछ देर पहले ही उसके दोस्त ने अपनी बीबी
को “तलाक” का मेसेज भेजा है और कहा है कि मेरी वाईफ के साथ वह
कोर्ट-मैरिज करने जा रहा है..मेरी वाईफ ने भी मुझे “तलाक” का मेसेज भेजने कहा
है..’
‘ नहीं दोस्त..वे आपको अप्रैल फूल बना रहे
हैं..इसे सीरियसली न ले..आपने उन्हें बनाया तो वे भी दस्तूर निभा रहे हैं..’ मैंने
समझाने की कोशिश की.
‘ वो तो ठीक है दोस्त..पर अगर यह मजाक न हुआ तो
? ‘उसने प्रश्न दागा.
‘ तो से क्या तात्पर्य है..अप्रैल फूल है तो
मजाक ही होगा..’ मैंने सान्तवना दी.
‘ ऐसी स्थिति में आप मेरी जगह होते तो क्या करते
? ‘ उसने फिर एक सवाल दागा.
मैंने जवाब दिया- ‘ आपकी जगह मैं होता तो कतई
परेशान न होता और टूर जारी रखता..बल्कि अपने कैलेण्डर से एक अप्रैल को ही गायब कर
देता.. लोग इस दिन मजाक के मूड में अपने दिल की बात कहते है.. जवानी के दिनों में
एक बार एक सुन्दर लड़की को “ आई लव यूं “ बोला तो उसने भी बड़ी शिद्दत से पलटकर “ आई टू “ कह दिया..मैं
परेशां हो गया.. रात भर सो न सका..दूसरे दिन जब उससे मुखातिब हुआ तो बोली- कल एक
अप्रैल था बुद्धू ..तुमने तो मजाक नहीं किया होगा..पर मैंने किया.. .बुरा मत
मानना..अब तो समझ गए होंगे कि क्या कहना चाहता हूँ..’
‘ हाँ दोस्त ..समझ गया..मुझे टूर जारी रखना
चाहिए.. अपने कैलेण्डर से एक अप्रैल को विलोपित का देना चाहिए..और आप लोगों की तरह
बारहों महीने अप्रैल फूल डे मनाना चाहिए..सलाह के लिए शुक्रिया .. चलता
हूँ..नमस्ते..’
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-प्रमोद
यादव
गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़
मोबाईल- 09993039475
चुनावी-रणनीति के तहत /
प्रमोद यादव
एक दिन एक नेता और एक
भिखारी सुबह-सुबह सेक्टर नाईन रोड पर मार्निंग वाक करते टकरा गए. नेता के साथ उसका
एक चमचानुमा पुछल्ला भी था जो अक्सर उनके पीछे जासूसों की तरह चिपका होता...उसे
बाडीगार्ड इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि उसका ‘बाडी’ ही नहीं था.. किसी घडी-चौक के
घडी के बड़े कांटे की तरह ऊपर से नीचे तक एकदम सपाट था वह..उसका सिर भी कांटे के
नुकीले सिरे जैसे नुकीला था.. अतः पक्का था कि वह नेताजी का बाडीगार्ड कतई न था.
वैसे “ बाडीगार्ड ” फिल्म रिलीज होने के बाद सारे वी.आई.पी. और
नेतागण सलमान जैसे ही बाडीगार्ड खोजते फिर
रहे हैं...अब सलमान खान तो बालीवुड छोड़कर किसी मुस्टंडे नेता का बाडीगार्ड बनने से
रहा..उसे तो केवल करीना-कैटरीना जैसी हीरोइनों के बाडीगार्ड बनने में आनंद
है..बौड़म चेहरे वाले बेडौल , तोंदू और उम्रदराज नेता का बाडीगार्ड तो वह सौ करोड़
में भी न बने..
खैर ..छोडिये इन बातों को.. क्या है कि मुझे
विषयांतर होने में तनिक भी समय नहीं लगता...शुरुआत कहीं से करता हूँ और पहुँच कहीं
और जाता हूँ ..‘ जाना था जापान पहुँच गए चीन ‘ गाने की तरह..तो किस्सा यूं है कि
नेताजी पीछे मुड-मुड़कर अपने पुछल्ले से अंताक्षरी खेलते आगे बढ़ रहे थे और उनके
सामने-सामने भिखारी लोटा लिए शायद नित्यकर्म निपटाने, मूड बनाते आगे बढ़ रहा
था..दोनों के सिर छत्तीस के आंकड़े की तरह थे इसलिए आपस में टकरा गए..भिखारी के
लोटे का मटमैला पानी नेताजी के झक सफ़ेद लिबास को तर करते एक माडर्न आर्ट उकेर गया
कुरते में..वह बौखला गया- ‘ अंधे कहीं के...देख के नहीं चलते ? ’
भिखारी भी एक नंबर का छंटा था- नेता की तरह
ही..उसने पलटवार किया- ‘ अरे..उल्टा चोर कोतवाल को डांटे..बटन है तुम्हारी आँखें
और दोष मुझ पर मढ़ते हो..पुछल्ले से इतना ही प्रेम है तो उसे ही आगे कर चलते..कम से
कम मुझसे आलिंगन करने से तो बच जाते..और फिर तुम कोई मालगाड़ी का इंजन थोड़े हो कि
मुंडी पीछे कर पटरी पर सरपट चल लोगे..ये सड़क है बाबा...सड़क.. मुंडी आगे करके चलना
मांगता..नहीं तो यहीच होगा...और फिर टकराए भी तुम्ही हो... मैं नहीं....बार-बार
दुम देखोगे तो यहीच होगा... गनीमत समझो कि बाबुराव से टकराए...किसी सांड से टकराते
तो पता चलता..’
‘ तुम किसी सांड से कम हो क्या ? सड़क घेरकर
चलोगे तो कोई भी शरीफ आदमी टकराएगा..’ नेताजी का पारा चढ़ गया.
‘ देखो नेताजी..सफ़ेद कुरता-पाजामा पहन लेने से कोई
सी.एम–पी.एम.नहीं बन जाता..मैं सड़क घेरकर चलूँ या सड़क को लेकर चलूँ.. तुम्हें इससे
क्या ? सड़क तुम्हारी जागीर तो नहीं.. बल्कि तुम बटन खोलकर चलना सीखो..आगे मुझसे भी
ज्यादा सिरफिरे मिलेंगे..ऐसा न हो कि कोई पीट दे..शुक्र मानों कि जल्दी में हूँ
नहीं तो ये कार्यक्रम मैं ही कर देता..’ भिखारी ने गुस्से से कहा.
नेताजी को काटो तो खून नहीं..वह कुछ पल के लिए
जैसे “ फ्लैशबैक “ में चला गया..वापस लौटा तो बोला- ‘ तुम तो वही भिखारी हो न
जो हनुमान मंदिर के बाहर भीख मांगते हो ? ‘
‘ हाँ...वहीच हूँ.. तो...तो इससे क्या ? ‘
‘ भिखारी तो हो ही..बड़े बद्तमीज भी हो...बड़े
लोगों से बाते करने का तुम्हें मैनर नहीं..’ नेताजी रुआब के साथ गर्दन ऊची कर बोले.
‘ सारे मैनर्स जानता हूँ नेताजी.. मुझे मत
सिखाओ..चूँकि इस वक्त धंधे में नहीं हूँ इसलिए आम आदमी के लहजे में बोल रहा
हूँ..कभी मंदिर की ओर आओ तो देखो कि कितने मैनर वाला हूँ..मेरे मैनर्स के तो
भिखारी भी कायल हैं..मैं वो भिखारी हूँ कि भिखारी से भी भीख वसूल लेता हूँ..इतने
प्यार और तहजीब से मांगता हूँ....तुम लोग तो वोट भी लठ्ठ मारे जैसे मांगते
हो....मैनर्स की दरकार तो तुम नेताओं को ज्यादा है..‘ भिखारी एक सांस में बक गया.
‘ अच्छा..तो अब एक नेता को एक भिखारी से मैनर्स
सीखना होगा..’ नेता बुदबुदाया.
‘ अरे काहे का नेता...हो तो तुम भी हमारे ही
बिरादरी के....फर्क इतना है कि हम पेट के लिए मांगते है , तुम पीढीयों के लिए..हम
रोज मांगते हैं , तुम पांच साल में....हम अल्ला-ताले के नाम से मांगते हैं , तुम
पार्टी के नाम से....हम नोट से संतुष्ट हो जाते हैं, तुम वोट से.. हम केवल ख़ास-ख़ास
ठिकानों पर मांगते है- जैसे- मंदिर-मस्जिद
,बस-स्टैंड, रेलवे स्टेशन, बाजार, ट्रैफिक सिग्नल्स आदि.. तुम लोग “ सारा जहाँ हमारा “ की तर्ज पर मांगते हो.....तो बताओ..भिखारी तुम भी हुए कि नहीं ? फर्क इतना है
कि हम आम भिखारी हैं तो तुम “ नॅशनल “..’
नेताजी इस तुलनात्मक अध्ययन से बौखला गए, बोले-
‘ देखो.. हममें और तुममें उतना ही अंतर है जितना कि राजा भोज और गंगू तेली में....कहाँ
हम और कहाँ तुम... जानते नहीं- समाज में हमारी कितनी प्रतिष्ठा, दबदबा, और
मान-सम्मान है..हम जहाँ खड़े होते हैं-वहीँ भीड़ लग जाती है.. ‘
‘ हाँ...भीड़ तो लगेगी ही..मदारी जो ठहरे..बचपन
में ऐसे तमाशे खूब देखे नेताजी...डमरू के बजते ही भीड़ जुटनी शुरू हो जाती..मदारी
तरह –तरह के करतब या सांप-नेवले की लड़ाई दिखा आखिर में मुद्दे पर आ जाते..लोगों को
अनाप-शनाप दवाई बेच,पैसे लूट दफा हो जाते...फिर साल भर बाद ही वे दुबारा अवतरित
होते ...तुम सब भी इनके चचा ही हो....डमरू की जगह अपने चमचों को बजाते हो..वह भीड़
जुटाता है..फिर शुरू होता है भाषणों का दौर.. आश्वासनों का दौर..भीख मांगने ( वोट
मांगने) का दौर..मदारी तो भला खेल-करतब दिखाकर लूटता था..तुम लोग तो सब्जबाग दिखा
लूटते हो..और लूटमार के बाद ऐसे गायब होते हो जैसे गधे के सिर से सिंग..रहा सवाल
मान-सम्मान और प्रतिष्ठा का तो हम भिखारी भी किसी से कम नहीं..दिन भर में
चालीस-पचास लोग ही तुम्हारे चरण छूते होंगे..यहाँ पच्चीस सौ लोगों को मैं निपटा
देता हूँ एक दिन में – चरण छूकर.....तुम्हे आशीर्वाद देने में आनंद आता है तो हमें
लेने में..अपना-अपना फलसफा है..पर आंकड़े मेरे भारी हैं..समझे ? ‘ भिखारी ने भाषण
पिला दी.
नेता अकबका गया, बोला- ‘देखो..कितनी भी सफाई दे
लो..पर हकीकत यही है कि तुम्हारा हमसे रत्ती भर भी मेल नहीं..हमारे पास बंगला है,
कार है, बैंक-बैलेंस है, नौकर है,चाकर है.. ‘
नेता की बात पूरी भी नहीं हुई कि भिखारी ने टोका
-- ‘ अब ये मत कहना की तुम्हारे पास क्या है ? मैं पहले ही बता दूं कि मेरी माँ
सालों पहले ही मर गई..और हाँ.. धन-दौलत का धौंस तो देना ही मत..हम कुछ खरचते नहीं
इसका ये मतलब नहीं कि कंगले हैं.. कोठी-कार तो हम भी मेंटेन कर सकते हैं पर ऐसा
करना धंधे के ऊसुल के खिलाफ है..तुम लोगों की तो मजबूरी है कि हर चुनाव में अपनी
प्रापर्टी का ब्यौरा दो..इसलिए दिन-रात गिनते रहते हो..हमें तो एक पल की भी फुर्सत
नहीं कि हिसाब-किताब करें..धंधे में इस कदर बिजी होते हैं..हम भिखारियों को कमतर मत आंको..हममे से कई तो तुम्हे भी खरीद
दे..अखबार तो पढ़ते ही होगे..कभी न कभी तो पढ़ा ही होगा कि भिखारी जब मरते हैं तो
उनकी पोटली से बेशुमार दौलत निकलता है...कभी लाखों में तो कभी करोड़ों में..मेरी
चाची मरी तो शनि मंदिर वाले उसके ठीहे से छब्बीस लाख रूपये निकले..मेरा ममेरा भाई
( अयप्पा मंदिर वाला ) गुजरा तो तो उसकी गाँठ से तिरपन लाख निकले..अभी-अभी कुछ
दिनों पहले पढ़ा होगा कि सऊदी अरब के जेद्दा शहर में एक भिखारन ईशा मरी जो पचास
सालों से इस व्यवसाय में थी , तो उसके पास साधे छः करोड़ की संपत्ति मिली ..वो
हमारी दूर की रिश्तेदार थी..हमारे एक चचा बचपन से दुबई चले गए थे..और वहीँ
मांगते-मांगते जम गए थे ..उसी की बीबी थी ईशा..’
इस बार नेता ने न केवल भिखारी की बात काटी बल्कि
हाथ जोड़ कहा- ‘ बस भी करो यार..मैं हारा तुम जीते.. चलो..मैं अपने चुनाव –प्रचार
का श्रीगणेश तुम्ही से करता हूँ...तुमसे एक वोट की भीख मांगता हूँ..मुझे चुनाव
जीतने का आशीर्वाद दो..’
‘ ऐसे नहीं नेताजी...पहले इस लोटे को भरकर
मंगवाओ..मुझे भी जल्दी है..फिर मिलते हैं आपके चुनाव-कार्यालय में..संभव हो तो
नाश्ता मंगवाकर रखिये..निपटने के तुरंत बाद मुझे बड़ी भूख लगती है..’
नेता ने चमचे को लोटा दे हैण्ड पम्प से पानी भर
लाने कहा..चमचा लौटा तो राम-भरत मिलाप दृश्य देख चकरा गया..नेता चुनावी रणनीति के
तहत गधे को बाप बना रहा था...भिखारी के पैर छू आशीर्वाद ले रहा था..
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प्रमोद यादव
गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ
प्रापर्टी मीटर और मैं /
प्रमोद यादव
‘ पापाजी...दो हजार aanaanoaanouनौ में आपकी प्रापर्टी कितनी थी ? ‘
‘ क्यों ? ये वाहियात सवाल क्यों ? ‘
बंटी को डांटते maimainmaineमैंने प्रतिप्रश्न किया.
‘ यूं ही पापा..इन दिनों टी.वी. में बार-बार “प्रापर्टी मीटर” के अंतर्गत बताया जा रहा है कि अमुक आदमी की प्रापर्टी
पांच साल पहले इतनी थी और आज की तारीख में चौगुनी हो गयी है..अमुक नेताजी पांच साल
पहले लगभग गरीबनवाज थे जो अब शहंशाह की श्रेणी में शुमार हैं..एक मंत्री ने तो
पांच साल पहले अपनी प्रापर्टी मात्र एक मर्सिडीज कार बताया था ..आज वे मर्सिडीज के
व्होल्सेल डीलर हैं..’
‘ अच्छा...अच्छा..तो तुम चुनाव की बात कर रहे हो....बेटा.. यह तो चुनाव आयोग
का नियम है कि जिसे चुनाव लड़ना है,वह नामांकन के वक्त अपनी पूरी चल-अचल संपत्ति का
ब्यौरा दे..’
‘ इससे क्या होता है पापा ? ‘ उसने मासूमियत से पूछा.
‘ इससे दो बातें मालूम होती है बेटा... पहली बात कि चुनाव लड़ने वाला किस तबके
का है ? नीचे तबके का कि ऊंचे तबके का ? अमीरी-गरीबी की लड़ाई एक जमाने से बदस्तूर
जारी है पर इनके बीच की खाई उतरोत्तर बढती ही जा रही है..अमीर और अमीर हो रहे हैं
तथा गरीब और भी गरीब..अमीर लड़ते हैं तो गरीब ही उन्हें जिताकर खाई को और चौड़ा करते
हैं..पर नीचे तबके का कोई लड़ता है तो सारे के सारे मिलकर उन्हें और नीचे धकेल देते
हैं..बेचारे जमानत तक नहीं बचा पाते....’
‘ तो गरीब लड़ते ही क्यों हैं पापा ? ‘
‘ शायद अमीर बनने के लिए.. राजनीती करके कोई आज तक गरीब नहीं हुआ..यह फलसफा कई
गरीबों को बर्बाद कर गया है..’
‘ और दूसरी बात क्या है पापा ? ‘
‘ दूसरी बात पांच साल बाद मालूम होती है कि उसने उसमें ( हरामखोरी और
भ्रष्टाचार कर ) कितनी श्रीवृद्धि की..’
‘ ऐसा भी तो होता होगा पापा कि पांच साल में किसी की प्रापर्टी घट जाती हो..’
‘ नहीं बेटा..नेताओं की संपत्ति उतरोत्तर बढती ही है..किसी अमीर सेठ के पेट की
तरह..घटती तो केवल हम आम लोगों की है..’ मैंने समझाया.
‘ कैसे पापा ? ‘ उसने उत्सुकता से पूछा.
‘ अब अपने पापा को ही देख..पांच वर्ष पहले भी कुछ न था..आज भी कुछ नहीं
है..मेरी संपत्ति तो केवल तुम और तुम्हारी मम्मी हो...अब भला इस संपत्ति में क्या वृद्धि होगी ? इस मंहगाई के दौर में तुम पर दो-तीन और भाई-बहन
लाद देता तो तुम्ही कराह उठते..इसलिए इसमे वृद्धि नहीं की..अब रही बात तुम्हारी
मम्मी की..तो इस अकेली जान को मैं चाहकर भी दो-तीन नहीं कर सकता..जवानी में किसी
ने घास डाली नहीं तो इस उमर में कौन डाले
? वैसे भी एक ही ले-देकर चल रही है..’
‘ क्या कह रहें हैं पापा..मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा....मैं जमीन -जायदाद,,
कार-बंगला, सोने-चांदी वाली प्रापर्टी की बातें कर रहा हूँ और आप “अनाप-शनाप” प्रापर्टी की बात कर रहे..’ वह झुंझलाया.
‘ अरे बेटा..मैं सही संपत्ति की बातें कर रहा हूँ जो विपत्ति में भी साथ
देता है.. “अनाप-शनाप”
संपत्ति की बातें तो नेता करते हैं..’
‘ पापा..कल एक बड़ी महिला नेत्री की प्रापर्टी के बारे में टी.वी. ने बताया कि
पांच साल में उसकी प्रापर्टी पांच गुनी हो गयी...तेरह करोड़ से सीधे पैंसठ
करोड़..बैंक में तो रकम साढ़े सात साल में दुगनी होती है न..फिर पांच साल में पांच
गुनी कैसे ? ‘ बंटी ने सवाल किया..
मैं चुप रहा. पर बंटी फिर घूम-फिरकर वहीँ आ गया, पूछने लगा- ‘ सच-सच बताओ न
पापा..कितनी प्रापर्टी है आपकी ? ‘
‘ अरे बेटा..हम नौकरी पेशा लोगों के पास कुछ बचता ही क्या है कि प्रापर्टी
बने..सारा वेतन तो तीज-त्यौहार और मेहमानों की खातिरदारी में ही ख़त्म हो जाते
हैं.. फिर बिजली का बिल , टेलीफोन का बिल , अख़बार का बिल , दूध का बिल, निगम का
बिल...इतने बिल तो बिलगेटस भी नहीं पटाते
होंगे..इतने पटाने के बाद बचता क्या है कि प्रापर्टी बने ? उलटे हम अक्सर “रिवर्स” में होते हैं..मतलब कि कर्जे में..’
‘ तो ऐसा सब तो नेता और मंत्री-संत्री भी करते हैं..वो हमसे भी बेहतर
दिवाली-होली मनाते हैं..नाते-रिश्तेदारों का छप्पन भोगों से स्वागत करते हैं..तो
जाहिर है - सारे बिल भी भरते होंगे..’
‘ नहीं बेटा...उनका हर काम फ्री वाला होता है..कहीं भी उन्हें पैसे खरचने की
जरुरत नहीं होती..ये सारे काम उनके चमचे, ठेकेदार, और सरकारी अधिकारी-कर्मचारी
पूजा-पाठ की तरह प्रेम से कर देते हैं..कहीं धोखे से मजबूरीवश कुछ खर्च करते भी
हैं तो त्वरित गति से दुगुना वसूल लेते हैं..इसलिए इनकी संपत्ति में दिन दूनी और
रात चौगुनी इजाफा होते रहता है..’ मैंने बंटी को रहस्य बताया तो उसने फिर एक सवाल
फेंका- ‘ तो फिर आप नेता क्यों नहीं बने ? ‘
‘ वो इसलिए कि चोखेलाल बन गया..’
‘ कौन चोखेलाल ? और उसके बन जाने से आप क्यों रह गए ? ‘
‘ मेरा सहपाठी था चोखेलाल..हम साथ-साथ
पढ़ते थे..निपट गधा और डीठ किस्म का लड़का था...मेट्रिक तक मेरी नक़ल करते-करते सफलता
पूर्वक निकल गया.. मेट्रिक के बाद मेरे पिता ने अपनी सरकारी कुर्सी मुझे सौंप
सिंचाई विभाग में क्लर्की की नौकरी लगा दी और चोखेलाल निगम चुनाव लड़कर नेता
से पार्षद बन गया..फिर धीरे-धीरे महापौर की कुर्सी में काबिज हो रूपये
पीटने लगा..फिर एम.एल.ए. बन गया.. आज उसकी गिनती अमीरों में है और मैं तो गिनती भी
भूलने लगा हूँ..फक्कड़ जो हो गया हूँ.. ‘
‘ जब इतने साल उसने आपकी नक़ल की तो एक बार आप भी उसकी नक़ल कर लेते तो क्या
बिगड़ जाता ? बंटी ने उत्तेजित हो कहा.
‘ किया था बेटा..किया था..एक बार जोश-जोश में एम. एल. ए. के चुनाव में खड़ा हो
गया..लोगों ने इस बुरी तरह गिराया कि आज तक उठ नहीं पाया..लाखों के कर्ज हुए सो
अलग..अब तक चूका रहा हूँ..संपत्ति बढाने के चक्कर में फक्कड़ हो गया हूँ..’ मैंने
अपनी वेदना बताई.तो लड़का कुछ पल के लिए एकदम खामोश हो गया. फिर थोड़े अंतराल के बाद
हैरानी जताते पूछा- ‘ तो सचमुच आपकी कोई प्रापर्टी नहीं पापा ? ‘
‘ हाँ बेटा..लेकिन इसमें हैरानी की
कोई बात नहीं..इस देश के एट्टी परसेंट लोग मेरे जैसे ही हैं..’
‘ मुझे बाक़ी लोगों से क्या लेना-देना..पर आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी पापा ..’ वह
गंभीरता से बोला.
‘ क्या मतलब ? ‘ मैं चौंका.
‘ मतलब कि आज तक मैं गलतफहमी में रहा ..आपको प्रापर्टीवाला समझता रहा..’ वह
हताशा से बोला.
‘सो तो हूँ बेटा..मैंने पहले ही कहा न कि मेरे लिए तुम करोड़ से कम नहीं..और
तुम्हारी मम्मी भी करोड़ की है..’
‘ तो क्या आप अगर किसी पार्टी की टिकट से इस बार चुनाव लड़ते तो अपनी संपत्ति
का ब्यौरा यूँ ही देते- एक बेटा- एक करोड़..एक पत्नी - एक करोड़..टोटल- दो करोड़..’
मैं चुप रह गया. फिर कुछ अन्तराल के बाद उसे समझाया - ‘ ये नौबत आएगी ही नहीं
बेटा....चोखेलाल जब तक इस शहर में काबिज है,कोई दूजा चुनाव लड़ ही नहीं सकता..हर
बार दल-बदल वह सत्ता में रहता है..इस दल-बदलू के रहते कोई मुझे क्यों घास
डालेगा..टिकट देगा...बड़े दिनों बाद एक साफ़-सुथरे पार्टी से उम्मीद बंधी थी कि शायद
इस ईमानदार और आम आदमी को वह परख ले पर फिलहाल तो यह पार्टी खुद परखनली में
टेस्टिंग मोड़ में है..इसलिए यह तो तय है कि ना कभी अब मुझे चुनाव लड़ना है ना ही
अपनी संपत्ति का ब्यौरा देना है..अतः तुम इन बेकार की बातों को बिंदास होकर भूल
जाओ..और बाहर जाकर खेलो-कूदो..अन्यथा तुम भी बन जाओगे मेरी तरह बैठे-ठाले करोंड़ों
के मालिक..’
बंटी के पल्ले कुछ न पड़ा. वह मुझे घूरते हुए बाहर खेलने चला गया.
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- प्रमोद यादव
गया
नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़
छप्पर फाड़ के../ प्रमोद
यादव
कहते हैं – “ UUPUUPAUUPARऊपर वाला देता है तो छप्पर फाड़ के देता है “ मैंने कभी इस मुहावरे पर यकीन नहीं किया क्योंकि
पच्चीस-तीस साल छप्पर वाले घर में रहा पर कभी छप्पर नहीं फटा..अलबत्ता कभी बाबूजी
की धोती तो कभी माँ की साडी या अपनी ही पेंट को फटते देखा..उन दिनों कपड़े बड़ी
जल्दी फट जाया करते..अब के कपडे ( जींस ) तो जानवर की खाल जैसे होते हैं..आदमी फट
जाए पर कपडा नहीं फटता..एक चीज और उन दिनों खूब फटा करता – दूध और स्टोव्ह..दूध तो
फ्रिज के अभाव में फटता पर स्टोव्ह नई-नवेली दुल्हन के कारण ज्यादातर फटता..जरुरत
से ज्यादा फुग्गे में हवा भरो तो फूटना तय ही है...और जब कुछ भी नहीं फटता तो
एकाएक बाबूजी बात-बात पर फट पड़ते ..कभी माँ पर तो कभी भाई पर..लेकिन उन दिनों दो चीज
कभी नहीं फटते- एक- “नोट” और दूजा- “वोट”..
बचपन में कभी नहीं सुना कि कोई बैंक कभी फटे
नोटों को जमा करने का आग्रह कर रहा
हो..आजकल तो बैंक बार-बार चेतावनी देते हैं कि नोट पर हिसाब-किताब किये को
उस नोट का हिसाब हमेशा के लिए ख़त्म..और तो और यहाँ तक भी कहते हैं कि दो हजार पांच
के पहले के नोटों का चलन अमुक तारीख से ख़त्म..जल्द से जल्द उन नोटों को जमा कर
राहत पायें..वर्ना उन नोटों के साथ भाड़ में जाएँ.. उस जमाने में गिनती के नोट
(असली) ही हुआ करते.. लोग बड़े संभाल – संभाल कर रखते..इसलिए नोट फटने से रह जाते..
अब बातें करें- “वोट” की.. तब हर
छोटा-बड़ा घर वोट-बैंक हुआ करता..छोटे-छोटे घरों में भी बड़ी संख्या में लोग
रहते..कहीं सोलह तो कहीं बीस..मेरे शहर में एक परिवार तो ऐसा था जहां अठत्तर लोग
एक साथ रहते..उस परिवार का एक सदस्य मेरा मित्र हुआ करता ..वो जब भी मिलता, मेरा बढ़िया
टाईम पास हो जाता..उससे मिलते ही जेहन में एक से एक सवाल तैरने लगते..कभी पूछता कि
तुम सब सोते कैसे हो..कितनी खटिया है घर में ? तो कभी जानकारी लेता कि एक दिन में
कितनी सब्जी लगती है ? इतने लोगों का खाना कैसे बनता है? कौन बनाता है? कई बार तो
बाजार में उसे ही सब्जी खरीदते देखा....वह मोलभाव करता और पीछे एक नौकरनुमा लम्बा
आदमी बोरी लिए खड़ा होता..जब भाव पट जाता तो सब्जियों को बोरी में डलवाता..हर
मुलाक़ात में उससे कोई न कोई नई जानकारी हासिल कर अपना नालेज अप-डेट करता ..
तो बातें हो रही थी- वोट की..तब के जमाने में
किसी भी परिवार का वोट न कभी फटता था ना ही बंटता था..घर के मुखिया ने जिस पार्टी
को ठप्पा लगाया, सारे के सारे भी उसी पर ठप्पा मारते ( तब ठप्पा का ज़माना था )..किसी की क्या मजाल
कि “ हल छाप” की जगह “बन्दूक छाप” में ठप्पा ठोंक दे ..और यह पवित्र कार्यक्रम पीढ़ी दर पीढ़ी
चलते रहता..वो तो आज का दिन है कि हर घर के वोट फटने लगे हैं..बंटने लगे हैं..अब
एक ही परिवार में चार-पांच पार्टी के लोग निवास करते हैं..कोई-कोई सदस्य निर्दलीय
भी होते हैं तो वहीँ कुछ “नोटा” किस्म के लोग भी जिन्हें कोई भी नहीं सुहाता....देखते ही
देखते सब कुछ बदला पर कुछ नहीं बदला तो मेरी तकदीर... एक कहावत है- “ भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं “ इस पर भी मुझे कभी यकीन न था पर जिस दिन सत्तारूढ़ पार्टी
का पत्र मिला, इस पर यकीन होने लगा . और शायद कुछ दिनों बाद ऊपर वाले मुहावरे पर
भी यकीन करने लगूँ कि ऊपरवाला जब भी देता –देता छप्पर फाड़ के...
तो किस्सा यूं है कि छुटपन से नेताओं को झक सफ़ेद
लिबास में देख मुझे भी “ नेता-नेता” खेलने का मन करता पर बाबूजी इतने सख्त थे कि वे इस धंधे को
“अधमों का धंधा” मानते..पांच साल
में एक बार वे चुपचाप प्रेमपूर्वक वोट डालते और ऐसा निश्चिन्त हो जाते जैसे कोई
भारी काम को अंजाम दिया हो..कोई जीते-कोई हारे-उन्हें कोई मतलब नहीं होता..तब के
जमाने में भिखमंगों की तरह वोट मांगने का रिवाज न था..प्रत्याशी मतदाता के विवेक
पर छोड़ देते- वे जिसे चाहे वोट करे.. वे शालीनतापूर्वक एक बार हाथ जोड़ अभ्यर्थी
होने का धर्म निबाहते.. आज की तरह एकदम पीछे नहीं पड़ते कि मुझे ही वोट करना (
वर्ना देख लूँगा ) तब के प्रत्याशी केवल छः आने खर्च कर चुनाव जीत लेते..केवल गेरू
खरीदते और खुद ही दीवारों को रंग आते.. पैदल चल घर-घर जाकर चुनाव प्रचार करते..तब
आज के जैसे स्मार्ट फोन नहीं थे कि फेसबुक,वाट्सएप, ट्विटर, विडिओ कालिंग, वीचेट
के जरिये सीधे एक सेकण्ड में जनता से जुड़ जाए..
अब तो इतना सब होते भी करोड़ों खर्च कर चापर और
विमानों से प्रचार-प्रसार करते हैं फिर भी डरते हैं कि कहीं हार न जाएँ इसलिए
दो-दो , तीन-तीन ठिकानों से दाखिला भरते हैं..उसमें भी डरते हैं कि कहीं रद्द न हो
जाए इसलिए चार बार, पांच बार भरते हैं..पहले के जमाने में चुवाव संपन्न होने के बाद आखिरी समय तक ” कौन बनेगा करोड़पति ?” की तरह ही सस्पेंस बना रहता कि कौन बनेगा पी.एम.? अब तो सब
उल्टा-पुल्टा है..पार्टी पहले ही पी.एम.
तय कर देता है फिर वो शख्श पी.एम.बनने की जुगत में धुंआधार दौरा करता है, मतदाताओं
को भरमाता है, विरोधियों की पोल खोलता है,”एकला चलो” की तर्ज पर
ऐरे-गैरे नत्थू खैरों को पार्टी में मिलाता है, वोट तोड़ने की कोशिश करता है, भाषण
पे भाषण पिलाता है ( कभी-कभी मुफ्त की चाय भी), लोगों के कान खा जाता है..सोचता
हूँ कि बाई द वे ऐसे भावी पी.एम.किन्हीं कारणवश पी.एम.न बन सके तो क्या हो ? उनकी
जगह खुद को रखता हूँ तो विचार आता है कि ऐसी स्थिति में फांसी ही लगा लूं..पर मैं
जानता हूँ ये बेशर्मी के साथ पार्टी के पीछे वाली कुर्सी में ऊंघते बैठ
जायेंगे..पहले के भी भावी ऊंघते बैठे ही हैं..
माफ़ कीजियेगा...विषयांतर हो रहा हूँ....तो बात
कर रहा था पार्टी के पत्र की..एक साथ दो पत्र मिले - दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों
से..एक मेरे नाम से और एक भाई के नाम से..मुझे सत्ता पार्टी से तो भाई को विपक्ष
से. मैं रामलाल हूँ और श्यामलाल मेरा बड़ा भाई है..पत्र पा हम आश्चर्यचकित हो फूले
नहीं समाये ..मेरी तो जैसे किस्मत ही जाग गई..जिंदगी के सोये अरमान को पत्र ने
झिंझोड़ ही दिया.. हमें नामांकन भरने के लिए बुलावा था..पत्र के निर्देशानुसार हम
अविलम्ब दो अलग-अलग गाड़ियों से पार्टी कार्यालय रवाना हो गए .. पार्टी प्रमुख से
थोड़ी देर की बातचीत में ही मेरा सारा उत्साह काफूर हो गया..माजरा समझ में आ गया..
दरअसल वे मेरे नाम का उपयोग(दुरूपयोग) करना चाहते थे..विरोधी पार्टी ने जिस
व्यक्ति को उतारा था, उसका नाम रामलाल था..सत्ताधारी पार्टी चाहती थी कि आठ-दस और
रामलाल मैदान में हो तो आपस में वोट कट-पिट जाए और सत्ताधारी पार्टी का प्रत्याशी
जीत जाए..सात रामलालों को उन्होंने निर्दलीय की हैसियत से नामांकन भरवाया था, मैं
आठवां था. प्रायोजित उम्मीदवार की हैसियत से मुझे भी निर्दलीय उतारा गया...नामांकन
शुल्क पार्टी भर रही थी.. मुझे सोचने के लिए एक घंटे का समय दिया..
.मैंने भाई को फोन लगाया तो उसने भी लगभग यही
बातें बताई..बताया कि वह निर्दलीय नामांकन भरनेवाला नौवां श्यामलाल होगा.. उसे
विरोधी पार्टी ने दुरूपयोग के लिए बुलाया था ..हम दोनों के क्षेत्र अलग-अलग थे पर
मिशन एक था..राजनीती का कीड़ा तो बचपन से कुलबुला ही रहा था , मैंने हाँ कर दी और
भाई को भी राजी कर लिया ..नामांकन दाखिले के बाद जब पार्टी से प्रचार-प्रसार करने
पैसे मांगे तो दोनों पार्टियों ने ठेंगा दिखाते कहा- इसकी क्या जरुरत ? डुप्लीकेट हो..डुप्लीकेट की तरह रहो..हाँ..अगर
खुद अपनी अनटी से कुछ करना चाहो तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं..
अब कोई चुनाव में खड़ा हो और चुनाव प्रचार न करे
तो इससे भद्दी बात और क्या हो सकती है..पत्नी-बच्चों के साथ चुनाव प्रचार का अलग
ही मजा है.. सो अनटी से पचास हजार निकाल
मैं अपने क्षेत्र को निकल गया..भाई भी भाभी व भतीजों के साथ पैसे ले अपने क्षेत्र
को रवाना हो गया..दो दिन के प्रचार -प्रसार में ही मैं पागल हो गया..जिस
चौक-चौराहे पर जाता वहा रामलाल का भाषण चलता रहता..लोगों से वोट मांगने घर जाता तो
पूछते-कौन सा वाला रामलाल ? सीधी वाला कि शहडोल वाला...गुरूजी कि महराज जी, घाट
वाले कि वात वाले ?आधा घंटा तो परिचय देने में ही लग जाता..जैसे-जैसे मतदान का दिन
निकट आया .सब कुछ इतना गड-मड हो गया कि मैं खुद भुलने लगा कि कौन सा वाला रामलाल हूँ.. वो तो अच्छा हुआ कि नतीजे आये तो
सारे रामलाल हार गए..कोई एक भी जीत जाता तो मैं अब तक वहीँ होता..एक अच्छी खबर ये है
कि भाई भी सारे हमनामों को हराकर और हारकर लौट आया है..पैसे डूबे तो डूबे, इतने
हमनामों के बीच से उबर आये..यही क्या कम है..जीत-हार तो चुनाव में चलते रहता
है..ऊपवाले ने छप्पर फाड़कर दिया तो नहीं बल्कि ले लिया..समझ नहीं आता..वक्त के साथ
सब कुछ बदलता है तो ये मुहावरे क्यों नहीं बदलते ?
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प्रमोद यादव
गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़
हैप्पी होली /
प्रमोद यादव
‘गुरूजी.. एक बात कहूँ ?‘ भोला ने भंग की तरंग में झूमते
कहा.
‘ हाँ..हाँ..कहो..बेशक कहो..’ मैनें उसे बढ़ावा दिया.
‘गुरूजी.....इस बार होली और चुनाव “ हम साथ-साथ हैं” की तर्ज पर फगुनौटी फिजा में
साथ-साथ प्रगटे हैं तो किसका मजा लें ?’ उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे घूरा.
‘ ये तो तुम्हारी मर्जी है भोले..पर हमारी ही सुनना है तो
यही कहेंगे-चुनावी होली ही खेलो...हर साल तो रंग,अबीर,गुलाल उड़ाकर मजा लेते ही
हो..इस बार नेताओं के साथ, नेताओं की तरह एक-दूजे पर कीचड़ उछाल होली खेलो..’
‘ आपने मेरे मुँह की बात छीन ली गुरूजी...पर कैसे ? मैंने तो
आज तक किसी नेता को नमस्ते तक नहीं किया..किसी पार्टी के दफ्तर नहीं गया..किसी से
कोई काम नहीं करवाया.. किसी को कभी रिश्वत नहीं दिया..ना ही किसी नेता ने मेरा कोई
काम किया..अब एकाएक होली कैसे खेलें और किस पार्टी के नेता से खेलें ? वह हताश सा
हो गया.
‘ पहले ये बताओ भोले. तुम्हें ये लाइन ( नेतागिरी वाला )
पसंद है या नहीं ?’.
‘ सौ फीसदी पसंद है गुरूजी...इनके ठाठ-बाट देखकर चकित रह
जाता हूँ..कई-कई नेताओं को देखा है-एकदम झक सफ़ेद कुरता-पाजामा पहने.. जैसे- आसमान
से आया फ़रिश्ता..दिन भर हाथ जोड़े..तुम्ही हो माता..पिता तुम्ही हो के अंदाज
में...इस आफिस से उस आफिस...इस मोहल्ले से उस मोहल्ले विचरते...बेपरवाह गोल्लरो की
तरह.. .चहरे पे हमेशा लम्बी मुस्कान लिए ...बिनाका फ्लोराइड वाला.. और घोर
निश्चिंतता लिए सेवाभाव से ओत-प्रोत..मदर टेरेसा जैसे.. कभी समझ नहीं पाया कि ऐसे
ऊँचे ठाठ-बाट के लिए इन्हें पैसा कौन देता
है ?’
‘ यही तो राज की बातें है भोले...राजनीती में पैसा अपार है..
पर दिखता नहीं.. छोटा से छोटा नेता भी जानता है कि उसे कहाँ से और किस तरह दुहना
है..अब तो अदना सा कार्यकर्त्ता भी पार्टी पकड़ते ही दोहन शुरू कर देता है..धीरज का
अब ज़माना ही ना रहा..’
मैंने अपना राजनितिक ज्ञान बघारा.
‘ ठीक कहते है गुरूजी..धीरज तो कहीं है ही नहीं..मेरे घरवाले
भी कहीं धीरज से काम लिए होते तो आज मैं भी नेता होता..मंत्री होता..फ़रिश्ता
होता..‘
‘ वो कैसे ?’ मैंने पूछा.
.’ छुटपन में एक बार वार्ड मेंबर के चुनाव में अन्य बच्चों के
साथ टाफी के लालच में प्रचार करने एक चुनावी जीप में चढ़ गया.. लौटने पर घर में
मेरी अच्छी-खासी पिटाई हो गई ..’ वह दुखड़ा रोने लगा.
‘ बस..इत्ती सी बात पर पिटाई हो
गई ? ‘मैं हैरान हुआ.
‘ हाँ गुरूजी... उस जमाने के एक छुटभैय्ये नेता ने उस दिन घर
आकर बाबूजी से मेरी शिकायत कर दी कि अपने लाडले को सम्हालो..किसी दिन यह बहुत बड़ा
नेता बन जाएगा.. बाबूजी ने पूछा कि क्या गजब ढाया इसने ? तब उन्होंने बताया कि
हमारी जीप में बैठकर चुनाव प्रचार कर रहा था और खीसे में विरोधी पार्टी का बिल्ला
लगाये बैठा था....बड़ा दुस्साहसी है आपका
लड़का... बस..पिटाई के साथ बाबूजी ने एलान कर दिया कि कभी भूले से भी किसी नेता या
पार्टी के साथ दिखूं तो खैर नहीं....मेट्रिक निकला नहीं कि नौकरी लगा दी ताकि मैं
नेता या मंत्री ना बनूँ...और इस तरह मैं चुक गया..नेता और मंत्री बनने से..’
‘ कोई बात नहीं भोले....विधि के विधान को भला कौन टाल सकता
है ? पर तुम चाहते तो अपनी मंशा पूरी कर सकते थे-अपने बच्चों को इस लाइन में धकेल
के..’ मेरी बात पूरी भी नहीं
हुई कि वह रुआंसा हो बोला-
‘विचार तो ऐसा ही कुछ था..पर पत्नी मुझे धकेलने तैयार खड़ी
थी..उसका कहना था कि नेताओं की तरह ( और कुछ-कुछ मेरी तरह ) बच्चों को भ्रष्ट नहीं
बनाना है..चुपचाप इन्हें पढ़ाकर कोई ढंग की नौकरी लगाओ..और वही मैंने किया..जोरू से
भला कोई कभी जोर-जबरदस्ती कर पाया है.. देवतागण तक फेल रहे तो मैं भला किस खेत की
मूली ?..बस दोनों भाई नौकरी की नकेल में बंधे जिंदगी गुजार रहे..’ वह पछतावे के अंदाज में बोला.
‘ कोई बात नहीं भोला..दिल छोटा मत करो..जो होना है वो होकर
रहता है..अब मुझे ही देखो..मेरे दोनों बच्चे निपट गधे....पढ़ते ही नहीं थे..तब
पत्नी बोली- इन्हें ऐसी जगह डालो जहाँ कुछ हो ना हो.. पर पैसा जरुर हो....वो भी
अपार..तो मैंने इन्हें बचपन से ही राजनीती में डाल दिया..यह बिना पूँजी का धधा
है..जोरू की बात भला मैं भी कहाँ टाल सकता था..आज दोनों बेटे निगम में पार्षद
हैं...एक सत्तारूढ़ पार्टी में तो दूसरा-दिरोधी पार्टी में..हर पांच साल में सरकार
बदलती है पर मेरे यहाँ कुछ नहीं बदलता..ना ही मेरे लड़के न मैं ..क्योंकि हर बार
मेरा एक बेटा सत्ता में होता है..और दूसरा विपक्ष में .तुमने “ सोने में सुहागा ” वाला मुहावरा तो सुना ही
होगा..किसी दिन घर आके देख भी लेना .एक सोना है तो दूसरा सुहागा...इनके चलते हर
काम आसानी से निपट जाता है..अपना भी और गैरों का भी..गैरों के काम निपटाने थोड़ी-
बहुत दान-दक्छिना ले लेता हूँ....ऐसा ना करूँ तो भीड़ ही लग जायेगी काम करवाने
वालों की...’
‘ ठीक कहते हैं गुरूजी..जब बड़े-बड़े साधू-संत,महात्मा को दान
- दक्छिना से गुरेज नहीं तो आप क्यों करें ? उसने हामी भरते कहा.
‘ तो बताओ भोला..चुनाव के टिकट घोषित होने लगे
हैं..पक्ष-विपक्ष दोनों चिंतन-मंथन में
व्यस्त हैं..कई सौभाग्यशालियों के टिकट तय.. तो कुछ बदनसीबों के कट गए
हैं..जिन्हें मिली वे अभी से समर्थकों के साथ होली मनाते रंग-गुलाल से सराबोर
हैं..भूल गए कि अभी मतदान भी होना है..गिनती भी होनी है..अक्सर देखा गया है कि
गिनती के वक्त गिनती के लोग ही रह जाते हैं..जो गायब होते हैं वे विजयी पार्टी के
जुलुस में चेहरों पर रंग-गुलाल लगाये “ बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना “ जैसे धमाल करते दिख जाते
हैं...जिनकी टिकट कट गयी ,वे कटे पेड़ की तरह जमीं पर धाराशायी....उन्हें लगता है – होली की जगह मुहर्रम कैसे आ
गया..समर्थक मायूस हो धीरे से परकटे ( टिकट कटे ) को छोड़ टिकट वाले की टोली में
ऐसे जा घुल-मिलते हैं जैसे दूध में चीनी ..उन्हें मालुम है कि कटे पेड़ से कोंपल
निकलने में पांच साल तो लगेंगे ही..कौन कमबख्त इतने साल इन्तजार करे ?..जमाना ऐसा
है कि कोई प्रेयसी एकाध घंटे इन्तजार करवा दे तो प्रेमी प्रेयसी बदलने की सोचने
लगता है..ऐसे में पांच साल..उफ़..तौबा-तौबा.. ‘
‘ठीक कहा गुरूजी.. दुःख की घडी में अपने तक साथ छोड़ देते
हैं..पर यही दुनिया की रीत है..’ उसने लम्बी गहरी सांस छोड़ते कहा.
‘ भोले लगता है ..कोई गहरी चोट खाए हो..’ मैंने उसे धीरे से छेड़ा. .
‘नहीं गुरूजी..ऐसा कुछ भी नहीं..’ उसने शर्माते हुए कहा.
‘ अब बता भी दो यार..होली है..इस मदमाते मौसम में
श्लील-अश्लील का भेद खतम हो जाता है..’ मैंने समझाया.
‘ दरअसल बात यूँ है गुरूजी कि जवानी के दिनों में मेरे दोस्त
अक्सर कहते कि कोई लड़की तुझे कभी घास नहीं डालेगी..लेकिन एक दिन एक लड़की ने डाल
दी..मैं फागुन की तरह बौरा गया..एक दिन उसने कहा- कब तक इन्तजार कर सकते हो
?.मैंने कहा- जीवन भर..’
‘ फिर ?’
‘ फिर क्या ?..इन्तजार ही करता रहा..एकाएक वो कहाँ गायब हुई
..पता ही न चला..मेरी शादी हो गई..बच्चे हो गए. सर पर चाँद भी निकल आया..पर मेरी
चाँद न जाने किस बदली में छिप गई कि कभी निकली ही नहीं.. सच कहूँ- आज भी उसका
इन्तजार है..समझ नहीं आता लोग इतने अधीर कैसे हो जाते हैं..पांच साल भी इन्तजार
नहीं कर पाते..मुझे देखो..आज भी प्रतिकच्छारत हूँ..’
‘ वाह भोले..तुसी ग्रेट हो यार..तुम्हारे इस जज्बे को मेरा
सलाम..तुम्हारे जैसे लोग राजनीती में होते तो कभी दल-बदल की नौबत नहीं आती..काफी
स्वक्छ सरकार होती ..खैर..चलो मुद्दे पर आयें..बताओ..कैसे चुनावी होली खेलोगे ?
सबसे पहले तो तुम्हें पार्टी और नेता
चुनना होगा..किस नेता या पार्टी के साथ होली खेलना चाहोगे ?’
‘ हमारे लिए तो सब बराबर है गुरूजी.. क्या पक्ष और क्या
विपक्ष..पर फायदा तो पक्ष में ही होता है..’
‘ ठीक कहा तुमने..सबसे पहले तो आपको कार्यकर्त्ता बनना
होगा..सत्तारूढ़ पार्टी के दफ्तर जाकर नेता
के सामने हाथ जोड़ बताना होगा कि पूरी निष्ठां और समर्पण के साथ काम करोगे ..दरी
बिछाने से लेकर भीड़ जुटाने का काम करोगे ..चिल्ला-चिल्लाकर नारे लगाने से लेकर प्रदर्शन
-धरने का प्रदर्शन करोगे ..भूख-हड़ताल में रहते पुलिस के डंडे प्रेमपूर्वक खा
लोगे..आदि आदि....नेता अगर संतुष्ट हुआ तभी आगे दाल गलेगी..और दाल गलेगी तो “भात” का प्रबंध आप ही आप होने
लगेगा..’ मैंने समझाया.
‘ गुरूजी ये तो वही बात हुई कि कोई पचहत्तर साल का बूढ़ा
मोबाईल को लाइफ-टाईम रिचार्ज कराए..इतना सब करते तो मर ही जाऊँगा..शार्टकट रास्ता
बताएं..कीचड़ उछालने की कभी आदत नहीं..फिर भी होली के पावन पर्व पर उछाल ही
लूँगा..पत्नी से बहुत कुछ सीखा है.. महिला-नेत्रियों की कामयाबी का राज भी शायद
यही है..मुझे तो एकदम से बड़े नेता बनने की तमन्ना है..मुझे राजनीती के ख़ास टिप्स
दें..’
‘ खास टिप्स से एक जोक याद आया है..एक बेटा अपने राजनीतिज्ञ
बाप से यही पूछता है तो बाप कहता है- जा छत पर चला जा..फिर बताता हूँ..बेटा छत पर
चला जाता है..नीचे से बाप कहता है- अब कूद जा..बेटा घबराकर कहता है- कुदूंगा तो
हाथ-पैर नहीं टूट जाएगा ? बाप कहता है- मैं हूँ ना..पकड़ लूँगा..बेटा धडाम से कूद
जाता है..बाप हट जाता है..बेटा चोट से कराहते पूछता है- आप हट क्यों गए ? तब
बाप कहता है- ये बताने के लिए कि राजनीती
में अपने बाप पर भी भरोसा मत करो...यही राजनीती का पहला पाठ है..’
‘वाह गुरूजी ..बात तो आपने पते की
कही..अब ये बताएं..आप पर भरोसा करूँ कि नहीं ? क्या मुझे नेताओं के साथ कीचड़-उछाल
होली खेलनी चाहिए ? ‘ उसने
मेरी ओर देखा.
मैंने जवाब दिया-.
‘ नहीं भोले.. सीरियसली कहूँ तो अब इस उमर में यह शौक न पालो
तो ही अच्छा..वैसे भी आम से ख़ास बनने की कवायद अच्छी नहीं.. आम हमेशा आम रहे तो
बढ़िया..ख़ास बनकर तो केवल बदनामी ही मिलनी है...घपले-घोटालों की बदनामी,भ्रष्टाचारी
होने की बदनामी, अकूत काले-धन कमाने की बदनामी, सेक्स-स्कैंडल की बदनामी, बुढापे
में डी.एन.ए.टेस्ट की बदनामी...आदि..आदि..आदि...हालाकि राजनीती में बदनामों को ही
नाम वाला कहते हैं..वो एक गीत है न- जो है नामवाला वही तो बदनाम है..तो
भोले..घर-परिवार, यार-दोस्तों के साथ होली खेल बची-खुची जिंदगी को रंगीन करो ..इस
बार पत्नी को पिया समझ इन्तजार ख़तम करो...’
‘ ठीक कहते हो गुरूजी..अभी तक तो पत्नी के साथ होली खेली..इस
बार प्रेयसी के साथ खेलूँगा..पर पत्नी को प्रेयसी के रूप में देखने दो गिलास भांग
और चढाने होंगे..चलता हूँ..भांग घोटना है..आप भी चाहें तो मेरे घर चलकर भांग का
आनंद उठायें..अपनी पत्नी को प्रेयसी समझ होली का लुत्फ़ उठायें..’
‘ नहीं यार...ऐसी मेरी किस्मत कहाँ ? मैंने तो शादी ही प्रेयसी से की है .. पत्नी बनते ही प्रेयसी लुप्त हो गई..पूरे का पूरा हंडी भी गटक लूँ तब भी पत्नी
ही दिखेगी..आज तुमने पुरानी यादें हरी कर मुझे लाल कर दिया..अब इस पर और कोई रंग
चढ़ने वाला नहीं..चलता हूँ हेप्पी होली..’
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- प्रमोद यादव
गया
नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़
मोबाईल- 09993039475
मुझको अपने गले लगा लो../ प्रमोद यादव
‘ पापाजी...ये
इलेक्शन का तमाशा कब ख़तम होगा ? बंटी ने थोड़े गुस्से भरे अंदाज से पूछा.
‘ क्यों ? इससे
तुम्हें क्या तकलीफ है ? मैंने भी उसी भाव से पूछा.
‘ है....तभी तो आपसे
पूछ रहा हूँ...कई दिन हो गए छुट्टियाँ लगे और आप हैं कि सुबह-शाम टी.वी. में सिर घुसाए, ऐसे मगन बैठे रहते हैं जैसे “ रामायण” देख रहे हों ..’
‘ तो भला इससे
तुम्हें क्या तकलीफ है ? ‘
‘ अरे पापा....सोचा
था छुट्टियाँ लगते ही कार्टून चैनल्स देखूँगा....मूवीस देखूँगा..यो-यो हनीसिंघ के
गाने सुनूंगा..लेकिन बीस दिन बीत गए ..टी.वी. पर आप कब्ज़ा जमाये बैठे हैं..क्या इस
चुनावी मूवी में कोई इंटरवेल – दी एंड
नहीं होता...? ताकि दो पल ही सही- मैं भी तो कुछ देख संकू. .. ‘
‘ होता है बेटे..पर
फिलहाल तू ये समझ कि अभी मैं “ ट्रेलर” ही देख रहा हूँ...”
‘इसका मतलब अभी
इलेक्शन शुरू ही नहीं हुआ ? ‘ बंटी घबरा सा गया.’
‘ ऐसा कब कहा.. “ ट्रेलर” से मेरा आशय है कि अभी तक पार्टियाँ उम्मीदवार ही खोज रहे
कि कौन प्रत्याशी किस जगह किसके विरुद्ध फिट होगा..कौन दम-ख़म वाला और उपयुक्त
होगा...किस सितारे को कौन सितारा तोड़ पायेगा
.कौन किसे टक्कर देने में कामयाब होगा...जाति-समीकरण के तहत भी हर पार्टी
तुष्टिकरण का गणित कर उचित उम्मीदवार ढूँढ़ रहे..कोई अमेठी पर चिंतित है तो कोई
बनारस पर..कोई परेशान है रायबरेली के लिए तो कोई लखनऊ के लिए..’
‘ लेकिन पापा..बहुत
सारे नेता तो रोड-शो कर प्रचार कर रहें हैं..वोट मांग रहे हैं..’
‘ तुम नहीं समझोगे
बंटी..अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तारीख को चुनाव है..इसलिए कहीं कुछ चल रहा है
तो कहीं कुछ....कुछ प्रमुख पार्टी तो अब तक अपना घोषणा-पत्र तक जारी नहीं कर सके
हैं..’
‘ घोषणा-पत्र क्या
होता है पापा ? ‘ बंटी ने सवाल किया.
‘ अरे भई..ये सब तुम
अभी नहीं समझोगे.. ये नेताओं के झूठे वादों का पुलिंदा होता है जिसे वे जीतने के
बाद निभाने का वादा करते हैं पर जीतते ही
सब “गजनी” जैसे हो जाते हैं...यह एक सतत प्रक्रिया है..जिसे हर
जीतने वाली पार्टी और सरकार निभाती है- पूरे वेग और मनोयोग से..’
‘ पापा ये बातें
मेरी समझ से परे है..इसे छोडिये और ये बताइये..दिन भर न्यूज चैनल्स बदल-बदल कर
क्या देखते हैं ? पिछले कई दिनों से आपके पीछे बैठे देख रहा हूँ ...सारे चैनल्स
में एक सफ़ेद दाढ़ी वाले अंकल ही तो गरजते, मुट्ठी भांजते दिखते हैं...फिर बाक़ी में किसे
खोजते हैं ? ‘
‘ तेरी मम्मी को..’
मेरे मुंह से निकल गया.
‘ तो इसके लिए रिमोट
की क्या जरुरत ? इसे मुझे दीजिये....मम्मी तो बिना रिमोट के किचन में मिल
जायेगी..’ और वह छिनने लगा रिमोट.
‘ अरे ..मजाक कर रहा
था..तेरी मम्मी को मैं तब भी बिना रिमोट के ही ढूँढ़ कर ( शादी कर ) लाया था..उस
जमाने में इसका आविष्कार नहीं हुआ था..पर इतना तय है कि रिमोट का आविष्कार किसी न
किसी महिला ने ही किया होगा..क्योंकि उंगली पर नचाने का इन्हें काफी तजुर्बा होता
है..’
‘ पापा..आप क्या
अंड-बैंड बोलते हैं, मेरी तो समझ ही नहीं आता... एक बात बताइये.. पिछले कई दिनों
से ये दाढ़ी वाले अंकल अपनी पार्टी में कई विरोधी पार्टी के दिग्गज लोगो को अपनी
पार्टी में अंधाधुंध एडमिशन दे रहे हैं...छोटे-बड़े किसी से इन्हें परहेज
नहीं..गुरेज नहीं.. गुजरात हो या बिहार..रामलाल हो या श्यामलाल.... एम.एल.ए. हो या
एम.पी...सबका वे गले लगा स्वागत कर रहे..ये बताना क्या चाहते हैं ? ‘
‘ यही कि आनेवाला कल
( भविष्य ) उनका है.. और जिन्हें भी अपने भविष्य ( कल ) की चिता है, आकर चुनाव के
पहले मिल लें..अन्यथा बाद में सबका भविष्य अंधकारमय कर देंगे .. ‘
‘ तो पापा..आप भी
इन्हें क्यों “ज्वाइन” नहीं कर लेते ? ‘ बंटी ने सलाह दिया.
‘ मेरा तो भूत- भविष्य
दोनों पहले से ही अंधकारमय है बेटा..मैं ज्वाइन करूँगा तो दुनिया की कोई ताकत दाढ़ी
वाले को डूबने से नहीं बचा पाएगी....और किसी को डूबते मैं देख नहीं
सकता..संवेदनशील आम आदमी जो ठहरा..’
‘ पर पापा ऐसा भी तो
हो सकता है कि ज्वाइन करते ही कहीं उनके साथ आपकी तक़दीर भी संवर जाए..’ बेटे ने
सम्भावना जताई...’
मैं चुप रहा. बंटी
को मेरी चुप्पी अच्छी न लगी. एक पल बाद कहा –
‘पापा...आप भी उनकी
पार्टी में प्रवेश कर लें..हमारे शहर में
परसों उनकी रैली है..मंच पर आपको गले लगा शामिल करेंगे तो सारे चैनल्स में लोग
आपको देखेंगे..दोस्त-यारों पर बढ़िया इम्प्रेशन पड़ेगा..मम्मी भी कितनी खुश होगी
आपको टी.वी. पर देखकर.. ‘
‘’वो तो ठीक है बेटा
पर वे मुझे कतई शामिल नहीं करेंगे...मैं चाहे लाख कहूँ- ‘ मुझको अपने गले लगा लो’
पर वे मानेंगे नहीं..’
‘ क्यों पापा ? ‘
बंटी ने पूछा.
‘ वो इसलिए
बेटा..क्योंकि मैं किसी पार्टी में नहीं.. मेरी कोई पार्टी नहीं..केवल एक आम आदमी
हूँ..और आम आदमी की जगह मंच पर नहीं, जमीन पर होती है.. जमीं से जुड़ा होता है आम
आदमी...उसे वहीँ जीना और वहीँ मरना..उसकी राजनीति तो केवल घर-परिवार तक ही होता
है.. उसे जमीं से ऊपर उठना (उड़ना) भी नहीं चाहिए..जिसने भी कोशिश की, उसने मुंह की
खाई..और थप्पड़ भी खाए ..अब भला कोई सूजा मुंह लिए टी.वी. में दिखे तो किसे अच्छा
लगेगा ? ‘
‘ तो फिर क्यों
न्यूज चैनल्स में बेकार समय बरबाद कर रहे हैं पापा ...लाईये..रिमोट मुझे हैण्ड-ओवर
कीजिये और चैन से मुझे “ छोटा भीम” देखने दीजिये..’ इतना कह उसने रिमोट छीन ली.
अब सोच रहा हूँ कि
यह आम आदमी क्या करे ? अपनी दाढ़ी नोचे कि सामने वाले की ?
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प्रमोद यादव
गया नगर,
दुर्ग,छत्तीसगढ़
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