चाय कि
दूध ? - प्रमोद यादव
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“देख तेरे संसार की हालत क्या हो
गई भगवान् कितना बदल गया इंसान”
अच्छा हुआ...कवि प्रदीपजी कूच कर गए..और
अनाप-शनाप दिन देखने से बच गए..वैसे तो यह गीत उहोनें पूरे संसार को लेकर लिखी पर
अपने देश की पतली हालत से वे ज्यादा परिचित थे..उन्हें उम्मीद थी कि आगे हालात सुधरेंगे..इन्सान
सुधरेगा..पर उनके जीवन-पर्यंत तो कुछ भी नहीं सुधरा..न देश न इंसान..अलबत्ता सब
कुछ और जोरों से बिगड़ा और बदला ..वे होते तो ना जाने और क्या-क्या इंसान की फितरत पर.,.देश
पर लिखते..उन्हीं के तर्ज पर किसी ने एक गीत लिखा- “ अम्मा देख..देख..तेरा मुंडा बिगड़ा जाए..अम्मा देख..देख..” इसका अर्थ (मेरे हिसाब से) यूँ है
- “माँ भारती..देखो..भारतवासी
कैसे बरबाद हो रहे ( सियासत के फेर में)...देखो...लोक-तंत्र नरक-तंत्र हुआ जा
रहा.. देखो..वोट और नोट का चक्कर चल रहा.. प्रजा
का दुःख-दर्द कोई समझ नहीं रहा...देखो..सब उसे खसोट रहे..लूट रहे... देखो... कोई
पिला रहा चुनावी चाय तो कोई पिलाये दूध..माँ...देखो..”
‘ सुनते हो जी....’ पत्नी की तीखी आवाज ने हमेशा की
तरह मेरे चिंतन को चिकोट दिया..अच्छा खासा मैं देश-दुनिया और बदलते इन्सान के बवाल
पर बालिंग की सोच रहा था कि भूचाल आ गया...इसके पहले कि भूचाल रिपीट हो, मैंने जोर
से बिगुल फूंका – ‘ हाँ..सुन रहा हूँ…..बोलो..’
‘ अरे..आज का अखबार तुमने पढ़ा ? ‘ उसने ऐसे पूछा जैसे उसमें उसकी
कोई लाटरी फंसी हो.
‘ हाँ..पहले तो मैं ही पढता हूँ
ना..तुम्हें तो मालूम है..इसके बगैर मुझे ठीक से हाजमा नहीं होता..अब ऐसा क्या छूट
गया जो मैंने नहीं पढ़ा ?’
‘ तुमने पढ़ा न कि चुनाव के चलते
पार्टी वाले जगह-जगह लोगों को मुफ्त की चाय पिला रहे हैं..’
मैंने तुरंत बात काटी - ‘ अरे बीबीजी..पुराना न्यूज है
ये....अब चुनाव करीब है तो गरीब को लुभाने, वोट -बैंक भुनाने ये सब तो करेंगे
ही..तुमने भी तो उस दिन अपनी सखियों के साथ मुफ्त की चाय का लुत्फ़ उठाया ..कैसी थी
मुफ्त की चाय ? मैंने पूछा.
‘ अजी मत याद दिलाइये ..हम जिस
स्टाल पर गई थी, वहां चाय के पूर्व कईयों ने
भाषण पिलाया तब चाय मिली.....पूरे दो घंटे बाद..’
‘ पर मैंने तो सुना है- चाय पहले
परोसी जाती है फिर चुस्की के साथ चर्चा..तुम्हारे साथ कैसे उलट हो गया ? ‘
‘ हाँ..हम सब भी यही सोच गए थे
जी....चाय का वक्त था..और पीने का मन..पर मुफ्त की चाय बड़ी मंहगी पड़ी....छः भाषणों
के उपरांत..दो घंटे बाद मिली..वह भी ठंडी और बेस्वाद..’
‘ पर ऐसी शिकायत तो अखबार में अब
तक नहीं छपी..तुम मिडिया में नहीं गई क्या ? ‘मैंने उसे छेड़ा.
‘ दरअसल चाय वाले की गाय कांजीहॉउस
में कसरत करने गई थी..दूध के पैकेट कहीं उपलब्ध नहीं थे..तो कैसे पिलाते चाय ?हमने
तो “ काली टी” पर भी हामी भरी पर चायपत्ती
लेने जो छोकरा गया था उसे पुलिस ले गई..अब खाली
शक्कर से तो बनती नहीं न चाय..इसलिए......’ वह झेंप-सी गई.
‘मुफ्त की चाय थोड़ी देर से भी
मिले तो क्या बुरा है ? ‘ मैंने चिढाया.
‘ हाँ..पर कोई भाषण पिलाकर पिलाये
तो बहुत बुरा है..” वह
बौरा गई.
‘ अच्छा छोडो यार..तुम अख़बार के
विषय में कुछ बता रही थी न..’ मैंने याद दिलाया.
‘ हाँ..वही तो बता रही थी कि
मुफ्त की चुनावी चाय के बाद अब यू.पी.में दूध मिलना शुरू हो गया है.....बिलकुल
मुफ्त.....एक पुरानी पार्टी दूध पिलाकर वोट बटोरने के उपक्रम में लगी है..’
‘ तो क्या इरादा है ? दूध पीने
गोरखपुर जाओगी ?’
मैंने पूछा.
‘ अरे नहीं जी ..वैसे भी चाय पीने
भला कहाँ अहमदाबाद गए थे..आज नहीं तो कल यहीं पीयेगे..अपने शहर में..बस..न्यौता भर
आने दो..’
‘ तो देवीजी का मन अभी मुफ्तखोरी से
भरा नहीं है..चाय के बाद अब दूध....वे भी अगर
भाषण पिलाकर पिलायें तो ? ‘ मैंने मजाक किया.
‘ नहीं..ऐसा तो नहीं होना
चाहिए...दूध तो बस गरम करो..सर्व करो..शक्कर,चायपत्ती,पानी मिलाने का कोई झंझट ही
नहीं..पहले दूध मिलेगा फिर भाषण..इस बार तो बिलकुल नहीं झेलना है भाषण..’
‘ मतलब कि दूध जरुर पीना है..वो
भी पार्लर में..मुफ्त में..? ‘
‘ हाँ..बिलकुल..’ उसने फटाक से जवाब दिया.
‘ अच्छा बताओ...वोट किसे दोगी ?
चाय कि दूध को ? मैंने सहज भाव से पूछा.
‘ जिससे ज्यादा फायदा हो ..’ उसने तुरंत जवाब दिया.
‘श्रीमतीजी .फायदे तो दूध के ही
ज्यादा हैं..किसी से भी पूछ लो..स्वास्थ्य के लिए हितकारी..इसे धरती का अमृत भी
कहते हैं..एक तरह से इसे पूरा भोजन माना जाता है..यह टी.बी.नाशक, बुद्धिवर्धक,
पाचक होता है..दूध से चहरे का सौन्दर्य बढ़ता है..झांई, मुंहासे, दाग-धब्बे सब गरम
दूध लगाने से चले जाते हैं..इससे ही मलाई,मक्खन,घी बनता है-चाय से नहीं..दूध किसी
का हो- गाय-भैंस, भेड़-बकरी, ऊंटनी-गधी...सबका फायदेमंद होता है..तुम्हें मालूम है
न - क्लियोपेट्रा रोज गधी के दूध से नहाती थी..उसकी सुन्दरता का राज – “लक्स” नहीं गधी का दूध था.. गधी का दूध दो हजार रूपये लीटर में
बिकता है...पुराने लोग आज भी “दूधो नहाओ-पूतो फलो” का आशीर्वाद देते हैं.’
उसने बीच में टोका- ‘ अब चाय पे भी थोड़ी चम्मच चला
दो..इसके भी गुण गिना दो..’
मैंने कहा - ‘ चाय के केवल नुकसान बता सकता
हूँ..यह स्वास्थ्य की सबसे बड़ी दुश्मन है..यह लत है..नशा है..इसमें कोई पौष्टिक तत्व
नहीं होता..इससे एसीडीटी बढती है..शरीर में खुश्की आती है..पाचन में दिक्कत पैदा
करती है..अनिद्रा की बिमारी देती है...अब बताओ..किसे वोट करोगी ? चाय कि दूध ?‘
पत्नी ने जवाब दिया- ‘ अभी तो चुनाव दूर है जी ...तब
तक हो सकता है ..कोई मुफ्त में पिला दे जूस या कोई पिला दे सूप ..कोई पिला दे काफी
तो कोई पिला दे लस्सी .. तब तक वेट कर
लेती हूँ..सब पीने के बाद तय करुँगी - किसको वोट करूँ..’
‘ अरे भागवान..मुफ्त का इतना कुछ
पिओगी तो अपचन हो जाएगा..फिर वोटिंग के दिन वोट नहीं कर पाओगी..पूरे दिन टायलेट में रह
जाओगी.. ’ मैंने समझाया.
‘ अपचन होगा तो सबका “टोंटा”(गला) दबाने जाउंगी.....ई.वी.एम.
में “नोटा” दबाकर आउंगी....’ इतना बोल वह हंसने लगी.
मुझे बेहद ही “फील-गुड” फिल हुआ कि चलो अखबार पढ़ पत्नी “सिलाई-गोटा” से “नोटा” तक तो पहुंची...
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- प्रमोद यादव
गया
नगर , दुर्ग, छत्तीसगढ़
चाय पे बुलाया है../ प्रमोद यादव
“ शायद
मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है
”
बिना मतलब के कोई किसी को चाय पर नहीं
बुलाता..( वैसे तो आजकल यह चलन ‘आउट डेटेड‘है..कोई चाय तो क्या पानी भी नहीं पूछता ) पर “इन्होनें” तो पूरे आवाम को एक साथ,एक ही
वेन्यु में चाय पर बुलाया तो मतलब कुछ न कुछ नहीं बल्कि बहुत ही कुछ था..कहने को
वे कहते रहे कि किसी ज़माने में वे भी चाय बेचा करते..इसलिए उन्हें मालूम है कि चाय
की गुमटी या ठेला एक तरह से फुटपाथ का पार्लियामेंट होता है...दुनिया-जहान की सारी
आवश्यक और अनावश्यक बातों की,राजनीति,धर्म,विज्ञानं,सिनेमा,युद्ध,सीमा की ,पड़ोस की
अनुपमा,साधना आदि की चर्चा केवल यहीं होती है..इसलिए देश की दशा,दुरदशा,व्याप्त
भ्रष्टाचार,सुराज-स्वराज आदि की चर्चा करने चाय की चौपाल को चुना..वे ये भी फरमाए
कि चाय गरीबों का व्यापार है..( इतना तो सभी जानते हैं भाई....हम कहाँ कहते हैं कि
टाटा या अम्बानी केतली लिए घूमते हैं ) आगे बोले कि सारे देश की जनता से एकमुश्त
चर्चा करने चाय की गुमटी को चुनने का कारण इनसे बेपनाह मोहब्बत है.और इसलिए इन्हें
सम्मानित करने का शौक चर्राया ..यह एक प्रयोग है..सार्थक हुआ( चुनाव जीते ) तो आगे
और भी कुछ करेंगे..( अगला पड़ाव ‘ पानठेला ’ हो सकता है..पानठेले में भी वही सब चर्चा होती है जो
चायठेलों में होती है..फर्क इतना है कि चाय ‘आगाज’ है तो पान ‘अंत’)
अब तक तो देश में दो ही तरह के चाय
प्रसिद्द रहे –
रेलवे की चाय और नान-रेलवे चाय..पहली वाली चाय कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक
जैसी,एक कीमत की –और
बेहद ही बकवास - बेस्वाद..वहीँ दूसरी चाय (नान-रेलवे) विभिन्न स्वाद व महंगे दामों
में ठेलों, गुमटियों, ढाबों, रेस्तराओं, थ्री-स्टार, फाइव स्टार में उबलब्ध होते
हैं..अब ये तीसरी पोलिटिकल चाय का प्रमोशन-विमोचन हुआ है..इसका स्वाद तो वही बता
पाएंगे जिन्होंने चुस्की ली....राजीनीतिक चाय को हलक से उतारना हर किसी के बस की
बात नहीं. और वो भी मुफ्त की...तो आइये- बात करते है..कुछ पीने और पिलानेवालों
से..चाय की चौपाल पर.. सबसे पहले चलते हैं-कोलकाता ..
‘ हाँ भैयाजी.. सुना है आप पच्चीस
सालों से यहाँ पार्टी कार्यालय के सामने पार्टी के लोगों को पिला रहें हैं..आप के
पिलाये लोग आज भी राजनितिक पटल पर कई ऊँचे पदों पर पगलाए पसरे हैं..क्या इसके
पूर्व कभी किसी बड़े लीडर.ने आपको इस तरह तवज्जो दी ? ‘
‘ नहीं साहब..बिलकुल नहीं..अपने आखिर अपने होते
हैं..चायवाले का दर्द एक चायवाला ही समझ सकता है..’
‘ अच्छा..तो बताओ..इनसे आपको क्या उम्मीदें हैं ?’
‘ उम्मीद तो यही है साहब कि ये
पी.एम. बनेंगे तो हमारा सालों से रुका रकम(उधार की चाय का) जो पार्टी वाले पी
(डकार) गए हैं..हमें ईमानदारी से दिला देंगे..हम जब-जब भी मांगते हैं, ये देते
जरुर हैं पर केवल धमकी.. कि तुम्हारी गुमटी गोल कर तुम्हे भी ‘गो-वेंट-गान‘ कर देंगे.. ‘
‘ ठीक है भैया ..आप “ पैसा वसूल “ कार्यक्रम जारी रखे..हमारी
शुभ-कामनाएं..’ और
मैं चलता बना.
इस बार पटना के पमुख इलाके के चौराहे पर स्थित
चाय-स्टाल पर पहुँच मुफ्त की चाय पीते एक जजमान से पूछा-
‘ भाई साहब..देश की सबसे महंगी
मुफ्त चाय कैसी है ?’
उन्होंने तपाक से कहा- ‘ मुफ्त की है इसलिए बढ़िया है..अब
रोज तो मिलेगी ना ? ‘ जवाब
के साथ उसने एक अदद प्रश्न भी उछाल दिया..एक के साथ एक फ्री की तरह..मैंने समझाया-
‘ रोज नहीं भैया..केवल अभी दो
घंटे भर..रोज पिलायेंगे तो ये सड़क पे आ जायेंगे... फिर इन्हें तो कोई मुफ्त में भी
न पिलाये....बताइए..आप केवल चाय पीने आये हैं या इनसे कुछ चर्चा भी चाहते है ?’
‘ हाँ..मैं कुछ जानना चाहता हूँ..’
‘क्या ?’
‘ यही कि ये पागलों की तरह सबको
क्यों मुफ्त में चाय पिला रहे हैं ? ‘
मैं आगे और कुछ न सुन
सका, भाग आया.
देश का दिल दिल्ली के एक चाय स्टाल पर पहुंचा
तो वहां ग्राहक टाईप आदमी कोई न दिखा..सारे लोग नेता जैसे भेष में दिखे..हकीकत तो
यही है कि सब पीने वाले नेता ही थे..जिसका स्टाल था वह बंदा लोगों को दौड़-दौड़ कर
कप सर्व करते दिखा..मैंने पहला सवाल उसी को दागा कि आप मालिक होकर नौकरों की तरह
क्यों सर्व कर रहे हो तो उसका जवाब था- ‘ क्या करें जी..दो घंटों के लिए उन्होंने इसे जबरदस्ती
हायर(हाईजैक) किया है..पैसा देंगे भी या नहीं..कह नहीं सकता..इन सबका रिकार्ड तो
आप जानते ही है- माले मुफ्त-दिले बेरहम ’ इन्होने तो ये भी कहा है कि अगर प्रोग्राम फ्लाप हुआ तो
एल.सी.डी. का भी पैसा तुमसे वसूलेंगे..’
‘ सचमुच..गन्दी बात..गन्दी
बात....’ मैंने उसे सान्तवना
दिया. फिर सवाल किया- ‘आपको अगर चर्चा का अवसर मिले तो क्या पूछेंगे ? ‘
‘ केवल यही कि हम चाय वालों ने उनका क्या बिगाड़ा ? दो घंटे
बाद ये तो कूच कर लेंगे ..फिर हजारों टूट पड़ेंगे कि मुफ्त की चाय पिलाओ ..लोगों को
समझाते-समझाते महीने लग जायेंगे. इस चौपाल के बाद पूरे चुनाव तक पार्टी वाले यूँ
ही मुफ्त की चाय पिलाते रहेंगे तो हम चाय वाले खायेंगे क्या ?..’
उसका दुःख वाजिब था..
.फिर मैं एक नेताजी की
ओर मुड़ गया..पूछा- ‘
नेताजी..इस चाय पार्टी से भला देश का कोई भला होने वाला ? ‘
वे मुस्करा कर बोले- ‘ देश का भला- आपका ठेका. ...हमने
तो इस इवेंट का ठेका लिया है..दो घंटे बीतने को है... अब.करोड़ रूपये हमारी जेब
में...समझे ? ‘
मैं बिलकुल समझ गया कि
गयी भैस पानी में....तभी एक सज्जन ने मुझे भी मुफ्त की चाय थमा दी.. दो चुस्की ले
मैं वहीँ कुर्सी में झपक गया...दुसरे ही पल दुसरे लोक पहुँच गया.. अमरीका का
व्हाइट हॉउस...ओबामा को देख मैं पुलकित हो उठा .. मैंने हाथ मिलाया तो उन्होंने भी
गर्मजोशी से ‘शेक-हैण्ड’ किया..मैंने सीधे मुद्दे पर आते
उनसे पूछा-
‘ओबमाजी.. क्या आप भी पोलिटिक्स
में आने के पहले चाय बेचते थे ? ‘
वे उबल पड़े- ‘ वाट रबिश क्वेशचन ?..पूछना है
तो कोई ढंग का पूछो.. व्हाई आर यू आस्किंग अबाउट ब्लडी टी..? ’
मैंने बताया कि इन दिनों
मेरे देश के दो बड़े लीडर “ चाय-चाय “ का खेल खेल रहें हैं.. आवाम को बता रहे हैं कि कभी वे भी चाय
बेचकर गुजारा करते थे..( फ़िलहाल इनका गुजर-बसर विमान और चापर में होता है..धरती पर
पाँव भी नहीं धरते) आसन्न चुनाव के चक्कर में दोनों वोट बटोरने “ आम” बनने का चक्कर चला रहे हैं..
‘ आप क्या बोल रहे ..मेरे पल्ले
नहीं पड़ रहा....आई कांट अंडरस्टेंड ....’ ओबामा झल्लाए.
मैंने समझाया कि ये
इलेक्शन के पहले पब्लिक को भरमा रहे हैं कि कभी वे भी उन्हीं की तरह आम आदमी
थे..एक ने चाय की हांक लगाई तो दूसरा भी ‘हम किसी से कम नहीं’ के अंदाज में चायवाला बन गया.. वे भी देश को चीख-चीख कर बता रहें हैं कि उनसे पहले
वे....वे बेचते थे चाय... अपने भाई के साथ...इसलिए आपसे पूछा कि क्या आप भी...?’
‘ नो..नो..हम पीते नहीं तो बेचेगा
क्यों ?हमारे घर पानी ही नहीं होता तो कैसे बनेगा टी ? हम तो बचपन से ही
बीयर-शेम्पेन पीते आये .. चाय की चुस्की कभी नहीं ली.. हमारे यहाँ पानी खूब
महंगा.. दुकानों में बिकता है..सुना है आजकल तुम्हारे मुल्क में भी पानी बिकता
है..गुड..वेरी गुड..खूब ..तरक्की किया..’ वे हो-हो कर हंसने लगे.
‘ सर जी..क्या आपने कभी इलेक्शन
जीतने.. आम आदमी बनने.. कुछ बेचा ? ‘
‘ नहीं..हमने बेचा नहीं..बल्कि
ख़रीदा.. बड़े लोग बेचते नहीं..केवल खरीदते हैं..’
‘ क्या ? ‘ मैंने चौंकते हुए पूछा.
‘ नहीं बताएगा..वेरी सीक्रेट
..सारी..’ वे चुप हो गए.
.एक पल के लिए हमारे बीच
सन्नाटा पसर गया...मैं उस “सीक्रेट” के बारे में सोच ही रहा था कि अचानक जोरों का शोर उठा..
टूटने-फूटने, गिरने-पड़ने, दौड़ने -भागने की आहट आई..कुछ समझ पाता कि “ धड़ाम’ की आवाज के साथ मैं कुर्सी से
नीचे गिरा और झपकी से बरी हो गया..ओबामा का सीक्रेट- सीक्रेट ही रह गया....पता कर
पाता तो देश के इन कर्णधारों को फ्री में “हैण्ड ओवर” कर देता...कम से कम देश वाले डांडियाखेडा जैसे फ्लाप शो की
तरह “चाय-चाय” का यह बोरिंग गेम देखने से तो
बच जाते..
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- प्रमोद यादव
गयानगर,दुर्ग,छत्तीसगढ़
मैं
बिकाऊ नहीं../ प्रमोद यादव
‘ पापा ..पापा..हम अगर आपको बेचें
तो आप कितने में बिकेंगे ? ‘
आठ वर्षीय बेटे के मुंह
से यह सवाल सुन मुझे अटपटा लगा, मैंने उलटे उससे पूछा- ‘ ये क्या अटपटा सवाल है ? मैं
क्यों बिकूँगा ? और भला मुझे क्योंकर कोई खरीदेगा ? तुम्हारे दिमाग में ऐसी बातें
आई कहाँ से ? ‘
‘ पापा..”छोटा भीम” देख रहा था तो ब्रेक आने पर
दूसरे चैनल पर चला गया..वहां कोई अंकल बता रहे थे कि युवराज चौदह करोड़ में
बिका..दिनेश कार्तिक साढ़े बारह करोड़ में..सहवाग तीन करोड़ में...इसलिए पूछा कि आपको
अगर बेचें तो कितना मिलेगा..’
‘ अपनी मम्मी से पूछ लेना..मेरी
कीमत वही लगा पाएगी..वैसे अक्सर तो वह यही कहती रहती है कि मुझे कोई कौड़ियों के
भाव भी न खरीदे..’
‘ मैं समझा नहीं पापा..साफ-साफ
बताओ न आप कितने में बिक सकते हैं ? और आपको खरीदेगा कौन ? क्या आदमियों की भी
बोली लगती है ? ‘
‘ बेटे इतिहास उठाकर देखो तो
समझोगे..सदियों पहले “दास-प्रथा” का चलन था..बड़े-बड़े अमीर
विदेशी-हब्शी लोग थोक के भाव में आदमी ( दास ) खरीदते और उनसे ढोरों की तरह काम
लेते..आदमियों की मंडी सजती थी….खरीदार आदमियों के शरीर को छू-छूकर देखते...हट्टे-कट्टे और मांस-पेशी
वालों को पसंद करते ..जैसे शरीर-शरीर न हुआ सब्जी हो गया.. फिर मोल-भाव
करते...मुझे खरीदकर कोई मेरा अचार भी नहीं दाल सकेगा..मुझे कोई नहीं खरीदेगा..’
‘ मम्मी भी नहीं ? ‘ उसने मासूमियत भरे स्वर में
पूछा.
‘ तुम्हारी मम्मी तो सत्रह साल
पहले मुझे “सात
वचनों” में लपेटकर खरीद ली
है..अब तो उसी की प्रापर्टी हूँ..दुबारा मुझे क्यों खरीदेगी ? ‘
‘ बेच तो सकती है ना ? ‘
‘ हाँ..बेच सकती है ‘ अब बेटे को कैसे बताता की मुझे
बेच डाली है. मैंने कहा- ‘ पर “ सेकण्ड हैण्ड “ माल आजकल खरीदता कौन है ? सबको नए की चाह है..’
‘ पर पापा..युवराज कैसे चौदह करोड़
में बिक गया..वह भी तो आपकी तरह “ सेकण्ड हैण्ड “ ही होगा..’
‘ वो नंबर वन क्रिकेट खिलाडी है बेटे
.. क्रिकेट के काले धंधे में सब कुछ बिकाऊ है..’
‘ तो आप इस काले धंधे से क्यों
नहीं जुड़े ? जुड़ते तो आज करोड़ों के होते..’
‘ अरे बेटा..अब ये उमर काले-धधे
करने के नहीं , बल्कि बाल काले करने के हैं..बता..बाल काले करूँ कि काला धंधा करूँ
? ‘
‘ अच्छा पापा..ये बताइये कि
क्रिकेट खिलाड़ी ही बिकते हैं या हाकी-फ़ुटबाल खिलाड़ी भी ?
‘ वैसे तो इस देश में सब बिकाऊ
है..पर दाम केवल क्रिकेट में ही अच्छे मिलते हैं..’
‘ तो पापा..कल से मैं केवल
क्रिकेट ही खेलूंगा ..मेरे लिए आप स्टम्प और एक बैट ला दीजिये..प्रक्टिस
करूँगा..आपकी उमर तक तो करोड़ों का हो ही जाऊँगा..’
‘ ऐसा नहीं होता मेरे लाल .’ मैंने समझाया – ‘ केवल नामी-गिरामी खिलाड़ी ही बिकते हैं...’
‘ तो नमन झा क्यों नहीं बिका पापा
? ‘
मैं झुंझला गया,बोला- ‘ ये क्या तुम खरीदने-बेचने और
मोल-भाव की बातों में अपना समय बर्बाद कर रहे हो..जाकर चुपचाप अपनी पढ़ाई करो...बच्चों
को इन सब बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए..’
‘ ध्यान नहीं दूंगा तो आपकी तरह
हो जाऊँगा पापा..न घर का न घाट का....मैं भी नहीं बिक पाऊंगा ..और करोड़ों से वंचित रह जाऊँगा..’
मैंने गुस्से से फटकारा-
‘ छोडो ये बकवास ..और
दूसरा कुछ पूछना हो तो पूछो..’
‘ एक सवाल के जवाब को तो आप जलेबी
की तरह गोल-मोल कर रहें हैं..और क्या पूछूं ? अरे बताइये भी कि आप जैसे लोग कभी
बिकते भी हैं या..’ वह
भी तलमला गया.
‘ हम आम आदमी पांच साल में एक बार
ही बिकते है बेटा ..चुनाव के दिनों में..वह भी कौड़ियों के मोल..कभी साडी में बिक
जाते हैं तो कभी कम्बल में..इससे ज्यादा घास कोई डालता भी नहीं..अब आम आदमी करे तो
क्या करे ? ‘
‘ क्या करें से क्या
मतलब....कोशिश तो करें कि “आल सीजन” बिक सकें..साग-सब्जियों की तरह...कल को मेरा कोई दोस्त
पूछेगा कि तुम्हारे पापा की क्या कीमत है तो मैं क्या जवाब दूंगा ?
‘ कह देना डालर के मुकाबले रूपया
से भी कम..’ मैं
भन्ना गया- ‘
पूछेगा तो पहले उसके बाप की कीमत पूछना..’
‘ पापा ..आप तो नाराज हो गए..जैसा
कि आप कहते हैं-सब बिकाऊ है तो किसी का भाव पूछने में क्या हर्ज है ? आप अपनी कीमत नहीं आंक सके पर बाकी तो आंकते ही
होंगे..’
‘ हाँ..बाकी बिकाऊ होंगे..मैं
नहीं .मैं किसी भी कीमत में नहीं बिकूँगा..’ मुझे ताव आ गया.
‘ युवराज से कुछ ज्यादा....बीस
करोड़ में भी नहीं ? बेटे ने कटाक्ष किया.
‘ हाँ.. बीस करोड़ में भी नहीं...
मुझे काला धंधा नहीं करना..मैच-फिक्शिंग जैसे घिनौने काम नहीं करने..मैं बिकाऊ
नहीं ..समझे ? ‘
‘ तो ठीक है पापा..आप बाल ही काला
करते रहिये..मैं मम्मी से बाकी पूछ लेता हूँ..’
अब बेटे को कैसे बताता कि उसके मम्मी की नजरो
में मेरी कीमत फूटी कौड़ी भी नहीं..रोज-रोज लडती है कि हर महीने आफिस से वेतन के
अतिरिक्त “और
कुछ’ क्यों नहीं लाता..जैसे पड़ोस के लोग लाते हैं.. रोज
सुनाती है कि पड़ोसियों का घर दिन प्रतिदिन भरता जा रहा है और हमारा घर किसी मरघट
की तरह सूना का सूना ..यही सब सोच रहा था कि अचानक पूरबी आ गई...और बेटे ने
आखिरकार उसे प्रश्न दाग ही दिया- ‘ मम्मी..पापा को अगर बेचें तो कितने में बिकेंगे ?
‘ तुम्हारे पापा बिकाऊ नहीं बिट्टू..(
बिकते वही हैं जो काम के होते है )..उन्हें कोई नहीं खरीद पायेगा..’
माँ-बेटे के संवाद को और सुन न सका,चुपचाप
बाथरूम की ओर बढ़ गया. पूरबी ने इतना तो ठीक कहा कि मैं बिकाऊ नहीं.पर उसका आशय यह
कतई न था.
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- प्रमोद यादव
गयानगर, दुर्ग,छत्तीसगढ़
मोबाईल-०९९९३०३९४७५
बचपन में जब कभी किसी रोबदार, मूंछदार थानेदार
को देखता तो मन ही मन सोचता- बड़ा होकर ‘थानेदार’ बनूँगा. तब के माँ-बाप बच्चों को आज की तरह इंजीनियर या
डाक्टर बनाने की नहीं सोचते थे बल्कि थानेदार बनाने की मंशा रखते. इसके पीछे ‘लाजिक’ थानेदार की कमाई कतई नहीं होता , केवल ‘पद का रौब’ ही ज्यादा काम करता. तब का थानेदार दो सौ रुपल्ली के वेतन
में भी हजारों पर भारी पड़ता ( रौब के मामले में ) उन दिनों तो हवलदार का भी काफी
जलवा हुआ करता..हमेशा वे हलुवे में होते...
मन बड़ा ही चंचल होता
है..और बचपन में तो कुछ ज्यादा ही...पल-पल में उछलता-कूदता बदलता रहता है..कभी शहर-
सेठ के ठाटबाट देख भविष्य में ‘मालदार’ बनने की इच्छा पनपती तो कभी स्कूल के किसी दिमागदार
विद्यार्थी को पुरस्कार पाते देख जगदीशचंद्र बसु बनने को मन करता..कभी किसी
फर्राटेदार दौड़ लगाते किसी खिलाड़ी को देख ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसा मन हो जाता.. तो कभी किसी लालबत्ती वाली गाड़ी में लदे
मंत्री को देख सिर में टोपी पहनने को दिल करता..
बड़ी ही अजीब बात है कि
बचपन में हर चीज कुछ जरुरत से ज्यादा बड़ी दिखती थी ..मसलन कि मेरे मोहल्ले में उन
दिनों श्यामलाल गुप्ता की एक छोटी–सी दूकान थी जो काफी बड़ी लगती..जरुरत की हर छोटी-बड़ी चीज मै
वहीँ से खरीदता..पेन्सिल,कलम, कापी,रजिस्टर,बिस्कुट,चाकलेट,चना,बेर,मुरकू..आदि-आदि..दिन
में कई-कई बार दौड़ लगाता..उसके लंचबॉक्सनुमा गल्ले को देख आँखे फटी की फटी रह
जाती..मुंह तक सिक्कों से अटा होता..6x6 के
बाथरूमनुमा दुकान में पसरा श्यामलाल हमेशा मुझे धन्ना सेठ लगता..और उसकी दूकान
सुपर बाजार.. आज की तारीख में भी वही दुकान है.. वही श्यामलाल है. वही गल्ला
है..पर सब कुछ गरीब-गरीब लगता है..उसके गल्ले में जितने सिक्के होते हैं,उससे
ज्यादा तो सेक्टर नाईन मंदिर के बाहर बैठे भिखारी के आगे बिछे पंछे में होता
है..खैर..विषय पर लौटता हूँ..बातें बचपन की हो रही थी..
जैसे-जैसे बचपन बीतता गया..मर्ज बढ़ता
गया..जिंदगी की हकीकतों के अनेक जादुई दरवाजे ‘सिम-सिम’ कर खुलने लगे..तब मालुम हुआ कि कोई थानेदार,तहसीलदार,जागीरदार,तालुकदार
या मालदार यूं ही नहीं बन जाता..उसके पीछे काफी मेहनत-मशक्कत , पढाई-लिखाई और घिसाई
होती है..घर से रोज नसीहतें मिलती कि कोई भी ‘दार’ (रसूखदार,दमदार,मालदार,इज्जतदार,थानेदार,जागीरदार,तहसीलदार)
बनना हो तो सबसे पहले ईमानदार बनो..रास्ता जरुर कुछ अडचनों भरा , घुमावदार होगा पर ‘मलाईदार’ जाब पाना है तो एक तरह से इसे ‘मस्ट’ समझो....अन्यथा जमादार,चौकीदार
या झाड़ूदार बनना तो तय है ही....घरवाले अक्सर एक लाइन का एक मुहावरा ( ताना)
सुनाते (मारते) –“
पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब,खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब” आज की तारीख में सब उल्टा-पुल्टा हो गया है..खेलने-कूदने
वाले ‘ भारत-रत्न ‘ झोंक रहे हैं और पढ़े-लिखे लोग
भाड़..
पढने-लिखने से ख्याल आया कि पढ़ने-लिखने के दिनों में सबसे बोर काम होता
है-पढना-लिखना..इस बात को लगभग सभी बच्चे स्वीकारेंगे.. केवल दो प्रतिशत बच्चे ही
माँ की कोख से पाकेट-डिक्शनरी लिए पैदा होते है..पढातू होते हैं..बाकी सारे तो
माँ-बाप की तुतारी के डर से ही पढ़ते हैं..पढ़ते क्या हैं,केवल छलते हैं..झूठ क्यूं
बोलूं – मैंने भी छला....घरवाले,
नातेदार, रिश्तेदार सबने ख़बरदार किया कि पढ़-लिखकर इज्जतदार बनूँ..पर मार्क्स इतने
बुरे थे कि सिवा बेइज्जती के कुछ न हुआ ..तब
वे मेरे अन्दर एक ‘दुकानदार’ तलाशने लगे..तब ऐसा ही कायदा
था..पढने-लिखने से चूके तो दुकानदार
बनना तय..दूकानदार से
तात्पर्य ये नहीं कि मेन मार्केट में कांच के चमचमाते दुकान में बैठ टी.वी.-फ्रिज
बेचे या किसी मल्टीस्टोरी माल में लिवाइस जींस या कूपन का काउंटर खोलकर बैठे ..तब
दूकान का अर्थ केवल ‘किराने
की दूकान’ होता था..मेरे विषय में
भी यही सोचा गया..पर थर्ड डिवीजन मेट्रिक करने के बाद मैंने कालेज पढने की जिद की
तो दो-तीन सालो के लिए मेरा ‘किराना-मर्चेंट’ बनना रद्द हो गया..
कालेज पहुचते ही कलेजे को ठंडक मिली..एक हसीं और संगीन हादसे का शिकार हो
गया..एक चाँद जैसे मुखड़े वाली लड़की को दिल दे दिलदार हो गया..वह अंतिम क्षनो तक (
ससुराल जाते तक ) मेरे प्रति वफादार रही और मैं उसके प्रति..आज के लैला-मजनुओं की
तरह ना उसने मुझे कभी ‘चीट’ किया ना मैंने उसे..अच्छा हुआ उस दौर में सेलफोन नहीं था
नहीं तो हमें भी ( खासकर मुझे ) बेईमान बनने में समय नहीं लगता..आज के युग में
लड़कियों के पास कई ‘आप्शन’ होते हैं..थोडा सा भी आपसी तकरार हुआ या आपने गुस्सा दिखाया कि दूसरे दिन ‘हीर’ किसी दूसरे ‘रांझे’ के बाइक के पीछे मुंह लपेटे सरपट भागती दिखेगी..फिर ‘ ढूंढते रह जाओगे’ जैसी स्थिति हो जाती है..हमारे जमाने में ऐसा नहीं
था...रूठने-मनाने में ही सबसे बढ़िया टाईम-पास होता.. उन दिनों एक गाना भी काफी लोकप्रिय
था - ‘ तुम रूठी रहो,मैं मनाता
रहूँ कि इन अदाओं में और प्यार आता है ’ हमारे दौर में किसी के पास कोई ‘आप्शन’ नहीं होता था..’ जीना यहाँ, मरना यहाँ ‘ जैसी स्थिति होती..एक का एक पर
ही मर-मिटने का रिवाज था...हालाकि कहने की बातें हैं,मरता-मिटता कोई न था..उम्र
होते ही लड़की ब्याह दी जाती..और कभी-कभी ‘अफेयर’ के ‘आम’ हो जाने से कम
उम्र में ही ब्याह दी जाती..और दिलदार
महोदय दोनों ही स्थितियों-परिस्थितियों में ‘ मैं कहीं कवि ना बन जाऊं तेरे प्यार में ऐ कविता ’ कहते-कहते आगे का रास्ता( जो
माता-पिता तय करते )नाप लेते..
‘ चलो
दिलदार चलो चाँद के पार चलो..’गीत आने के चार साल पहले ही मेरी पारो ‘पार’ हो गई थी..मतलब कि ससुराल चली
गई थी..इसलिए चाँद के उस पार क्या है,नहीं जान सका ..अब तो खुद चाँद हो गया हूँ...वह
भी दागदार..छह बच्चों का पिता जो बन गया हूँ..
खैर..दिलदार के बाद चंद दिनों के लिए दुकानदार बना..फिर इसके चलते (दुकान के न
चलते) कर्जदार भी बना..कईयों से उधार लिया फिर भी उद्धार न हुआ अलबत्ता बहुतों के
लिए गद्दार बन गया . अच्छे-बुरे सभी दिनों में मेरा राजदार व सुख-दुःख का हिस्सेदार रही मेरी अभागी , सीधी-सादी पत्नी हर
पल मुझे जी-जान से धारदार बनाने की कोशिश की ,.पर होता वही है जो मंजूरे-खुदा होता
है..समझदार होते हुए भी जिंदगी में कोई धमाकेदार काम न कर सका..सिवा छह बच्चे पैदा
करने के....दमदार,असरदार बनने के चक्कर में दर-दर भटक तार-तार हुआ..
क्या ही अच्छा होता कि किसी सरदार के घर में पैदा होता..ना कोई
थानेदार,मालदार,तहसीलदार बनने का चक्कर होता ना ही दिलदार होने का कोई दर्द....सरदार तो
जन्मजात रौबदार,पानीदार,वफादार,ईमानदार,इज्जतदार,जानदार,शानदार होते हैं..इन्हें
कुछ बनने के लिए कुछ भी बिगाड़ना नहीं पड़ता,,मैंने तो कुछ बनने के फेर में सब कुछ बिगाड़ डाला..जिंदगी को
जायकेदार की जगह बदबूदार बना डाला..अब तो केवल उपरवाले के दीदार की तमन्ना है..और
उससे विनती है कि अगले जनम में किसी सरदार
के घर पैदा कर मुझे आल इन वन बनाए...’दिलदार वाला चेप्टर’ इसी जनम वाला रखे तो आभारी रहूँगा.. बड़ी सोणी लड़की थी वो....जानता
हूँ , अगले जनम में भी वो चाँद के उस पार जाने के पहले ही पार हो जायेगी...फिर
भी..कोशिश होगी कि अगली बार उसके कानों
में गुनगुना सकूँ- ‘ चलो
दिलदार चलो ..चाँद के पार चलो..’ तैयार होना न होना उसकी मर्जी.
XXXXXXXXXX
-प्रमोद
यादव
दुर्ग, छत्तीसगढ़
मोबाइल- 09993039475

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