Wednesday, 20 January 2016

परिचय-प्रमोद यादव


अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754
 
परिचय  
 
नाम : प्रमोद यादव
जन्म : ३० जून १९५२ को दुर्ग, छत्तीसगढ़ में
व्यवसाय : मूलतः फोटोग्राफर, अनेक पत्र-पत्रिकाओं व भिलाई इस्पात संयंत्र की पत्रिकाओं में छायाचित्रों का तीस सालों से नियमित प्रकाशन। अंचल के कई शहरों- भिलाई, दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर आदि में फोटो-प्रदर्शनी का आयोजन।
साहित्यिक लेखन : १९७० से साहित्य में अभिरुचि। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में डेढ़ सौ से अधिक कहानियों व
व्यंग्य लेखों का प्रकाशन। वेब मैगज़ीन ‘रचनाकार’, गद्यकोश, अभिव्यक्ति आदि में अनेक रचनाएँ प्रकाशित
संपादन : लोक-संस्कृति की पत्रिका ‘लोकसुर‘ के संपादक मंडल से सम्बद्धता।
पुरस्कार व सम्मान : फोटोग्राफी में कई बार पुरस्कृत। सन २००४ में बिलासपुर में आयोजित छत्तीसगढ़ स्तरीय फोटो प्रतियोगिता में संस्कृति मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल द्वारा प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत ०६ मई २०१३ को इस विधा के लिए ‘धरती-पुत्र सम्मान‘ से स्वामी निश्चलानंद द्वारा सम्मानित।
१९७९ में दुर्ग-भिलाई जेसीस द्वारा युवा कहानीकार व बेहतरीन छायाकार के रूप सम्मान।
संप्रति : रिटायर्ड फोटो-अधिकारी (जनसंपर्क विभाग), भिलाई इस्पात संयंत्र, भिलाई, छत्तीसगढ़ (भारत)
सम्पर्क : pramodyadav1952@gmail.com

सौ साल पहले






अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की
विश्राम स्थली

ISSN 2292-9754




सौ साल पहले



सौ साल पहले" शीर्षक पढ़ ये मत सोचियेगा कि मैं हिंदी
सिनेमा के सौ वर्ष पर या अँग्रेज़ों की ग़ुलामी पर बातें करने जा रहा
हूँ। मैं तो महज़ एक फ़िल्मी गाने की बात करने जा रहा हूँ जो अक्सर
म्यूज़िक चैनलों के कार्यक्रम "भूले-बिसरे गीत" में दिखाया जाता है।
गाना है- "सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था। आज भी है और कल भी रहेगा।"
फ़िल्म है – जब प्यार किसी से होता है और परदे पर इसे गुनगुनाया है
सदाबहार हीरो देवानंद ने साथ में है- अपने ज़माने की हसीन अदाकारा आशा
पारीख। इस गीत को लिखा किसने, मुझे याद नहीं आ रहा। पर जिसने भी लिखा,
कमाल का लिखा है। उसे साष्टांग प्रणाम। और धुन बनाने वाले भैयाजी को भी
सुमधुर संगीत के लिए साधुवाद।
तो वाक़या ये है कि रोज़ खा-पीकर रात दस बजे के बाद
मैं अक्सर ही एक दूसरी दुनिया में चला जाता हूँ। बिस्तर पर लेपटॉप ले
मैं सन पचास और सत्तर के बीच की दुनिया में विलीन (अंतर्ध्यान) हो जाता
हूँ। धीमी-धीमी आवाज़ में सदाबहार नग़में सुनता हूँ..। वीडियो देखता हूँ।
वॉल्यूम इसलिए नहीं बढ़ाता कि बेटे को एलर्जी है पुराने गानों से। बीबी
तो सुन भी लेती है। (उसका धर्म भी है) पर पप्पू नहीं मानता, ज़रा सा
वाल्लुम तेज़ हुआ कि बिफर ही जाता है- "पापा, कम कीजिये नहीं तो मुझे
नींद आ जायेगी। कल सुबह टेस्ट है मेरा।" तब मैं गुस्से में लेपटॉप समेट
लेट जाता हूँ। हालाकि नींद नहीं आती। और भला आये भी कैसे? ग़ुस्से में
किसे नींद आएगी? आँखें मीचने के बाद भी मुझे गीताबाली, मधुबाला,
मीनाकुमारी, नरगिस, शकीला, श्यामा, वहीदा, पद्मिनी कूल्हे मटकाती नाचती
हुई स्पष्ट नज़र आती हैं। और उनके पीछे एक ख़ास अंदाज़ में ढीले-ढाले
पेंट-शर्ट पहने बाग़-बागीचे में दौड़ते-झूमते- गाते नज़र आते हैं- दिलीप,
देवानन्द, राजकपूर, राजेंद्रकुमार, राजकुमार, गुरुदत्त, सुनीलदत्त। फिर
कब इंटरवेल होता है और कब दी एंड समझ नहीं आता। आँख लग जाती है। सुबह
उठकर लेपटॉप को उसकी जगह पर रख फिर रोज़मर्रा के कामों में लग जाता हूँ।
रात होते ही पुनः लेपटॉप पर आ जाता हूँ। ये रोज़ का सिलसिला है।
मेरी श्रीमती बड़ी ही सीधी-साधी है। गाँव से है इसलिए
मेरे साथ-साथ इन पुराने गीतों को भी प्रेम से झेल लेती है। पर पप्पू तो
"यो यो हनी सिंग" युग का है। "चार बोतल वोदका" के बिना रहता ही नहीं।
स्कूल से लौटते ही यूनिफार्म उतारते-उतारते उसे हनी सिंग का बुखार चढ़
जाता है। पूरे फूल वॉल्यूम में उसके गाने सुन ही खाना खाता है।
शोर-शराबा कम करने कहो तो सुनता ही नहीं। बल्कि ख़ुद भी गाने के साथ सुर
बिगाड़ते हनी सिंग की ऐसी-तैसी करता है। और इधर रात को मैं कम से कम
आवाज़ में सुनता हूँ तो भी मुझे रोकता-टोकता रहता है। कभी-कभी तो कहता
है- "पापा, म्यूट में रखकर सुना (देखा) करो न। इन सड़ियल गानों में रखा
क्या है जो आप सुनते रहते हैं। म्यूज़िक का तो अता-पता ही नहीं रहता फिर
क्या सुनते हैं? अब "दिया जला, दिया जला" भी कोई गाना है?.. "जब दिल ही
टूट गया अब जीकर क्या करेंगे" जब भी आप सुनते हैं तो आपके चहरे के भाव
को तो बर्दाश्त कर लेता हूँ पर गानेवाले (गायक) के हाव-भाव देख मेरा
दिल टूट ही नहीं बल्कि ग़ुस्से से फूट भी जाता है..। भगवान् जाने कैसे
के.एल. जैसे कष्टकारी को आप लोग बर्दाश्त करते थे?"
तब समझाता कि ऐसा नहीं कहते बेटे। वे बहुत ही
उत्कृष्ट कोटि के गायक थे। हाँ, एक बात थी, गाने के पहले वो चार बोतल
दारू ज़रूर पिया करते। तभी वे रिकार्डिंग कर पाते । तब पप्पू खिलखिलाकर
हँसते कहता- "मतलब कि "चार बोतल वोदका" आपके ज़माने से चला आ रहा है।"
मैंने कई बार उसे बताया कि हमारे ज़माने के गाने में
जो माधुर्य है, गीतों के जो शब्द हैं, जो भाव हैं, साहित्य का उसमें जो
कसाव है वो आजकल के गानों में नहीं। अब "आती क्या खंडाला", "तुझको
मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ", "मुन्नी बदनाम हुई", "शीला की जवानी" भी
कोई गाना है? हमारे ज़माने के अधिकांश गाने सदाबहार हैं। "मुग़ले आज़म" का
मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे हो या "कोहिनूर" का दो सितारों का
ज़मीं पर है मिलन आज की रात। या फिर "अजी बस शुक्रिया" का सारी सारी
रातें तेरी याद सताए हो या "पारसमणि" का हँसता हुआ नूरानी चेहरा। सब
गानों में दम हुआ करता। तब वह मुस्कुरा कर कहता- "दम तो आज के गाने में
ज़्यादा है पापा। आपने हनी सिंग और मिकासिंग का गाना नहीं सुना – "दमा
दम मस्त कलंदर, अली दा पैला नंबर" मैं समझ गया कि आज के बच्चे को
समझाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। वो कहता है कि आपके ज़माने
के गाने सुन नींद आती है। मैं कहता हूँ आजकल के गाने सुन खीज आती है।
कभी वो छेड़ता है तो कभी मैं।
कभी-कभी जब दूसरे दिन की छुट्टी रहती है तो उस रात
पप्पू लेपटॉप के पास आकर बैठ जाता है और पुराने गानों को बड़ी ही
गंभीरता से सुनता-देखता है। कभी कुछ टीका-टिपण्णी भी कर देता है फिर
थोड़ी ही देर में सो जाता है। कल रात आकर बैठा तो मैं वीडियो देखते सुन
रहा था-"सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा"
उसने तुरंत ही सवाल दागा- "पापा, ये कैसा गाना है। इस हीरो की क्या
उम्र होगी?"
मैंने कहा- "लगभग पच्चीस वर्ष।"
"और हिरोईन की?"
"यही कोई बीस-बाईस वर्ष।"
"तो फिर ये कैसे गा रहा है कि सौ साल पहले से उसे
चाह रहा है। ये तो सरासर झूठ बोल रहा है। सौ साल पहले तो ये रहा ही
नहीं होगा। ना ही ये हिरोईन रही होगी तो क्या पिछले जनम की बातें कर
रहा है? ये तो गाना ही ग़लत लिखा गया है। किसने लिखा है?"
"मैंने नहीं लिखा बेटे। पर जिसने भी लिखा, उसका
तात्पर्य ये है कि जन्म-जन्मान्तर से हीरो हिरोईन को चाहता है।
साहित्यिक गाने ऐसे ही होते हैं, "फूलों के रंग से दिल की क़लम से, लिखी
तुझे रोज़ पाती" जैसे। या "शोख़ियों में घोली जाए थोड़ी सी शराब, उसमें
फिर मिलाया जाए थोड़ी सा शबाब, होगा यूँ नशा जो तैयार, वो प्यार है"
जैसे। तुमने इस गीत की पंक्तियों को ध्यान से नहीं सुना। इसके मुखड़े
में ही विशेषता है। चलो सोचकर बताओ क्या विशेषता है? बता दोगे तो सौ
रुपये दूँगा।"
वह सोचते-सोचते गुनगुनाने लगा- सौ साल पहले, मुझे
तुमसे प्यार था। आज भी है और कल भी रहेगा। सौ साल पहले, सौ साल पहले।
सोच-सोच वह पगलाने लगा। उसे कुछ भी विशेष नहीं लगा तब बोला- "पापा, कोई
क्लू दो न।" तब मैंने कहा- "ठीक है। तुम टेन्स यानी काल तो पढ़े ही
होगे? कोई एक वाक्य ऐसा बताओ जिसमे भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों का
समावेश हो। ये साल्व कर लोगे तो इस गाने की विशेषता भी समझ जाओगे।"
पप्पू फिर सोच में पड़ गया। बहुत माथापच्ची की पर
नहीं बता सका तब उसने बड़े ही भोलेपन से पूछा - "क्या है वो वाक्य
पापा?"
तब मैंने जवाब दिया – "सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार
था आज भी है और कल भी रहेगा।" इसमें भूत है, वर्तमान है और भविष्य भी।
और यही इस गाने की विशेषता है। पुराने गानों को यूँ ही सडियल मत समझा
करो। इनमें दूध मलाई और मक्खन तीनों होते हैं। समझे?"
उस दिन के बाद से उसने पुराने गानों को कभी उबाऊ
नहीं कहा। कभी वॉल्यूम कम करने नहीं कहा.। यो-यो को टा-टा कर अब सौ साल
पहले जैसे गानों को गुनगुनाने लगा है।चलिए। देर आयद-दुरुस्त आयद। मेरे
घर तो अच्छे दिन आ ही गए।

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सौ साल पहले - प्रमोद यादव




अन्तरजाल पर आपकी मासिक पत्रिका

अन्तरजाल पर साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली
वर्ष: 10, अंक 103,  जनवरी द्वितीय अंक, 2016
ISSN 2292-9754
लेखक या सम्पादक की लिखित अनुमति के बिना पूर्ण या आंशिक रचनाओं का पुर्नप्रकाशन वर्जित है। लेखक के विचारों के साथ सम्पादक का सहमत या असहमत होना आवश्यक नहीं।  सर्वाधिकार सुरक्षित। साहित्य कुंज में प्रकाशित रचनाओं में विचार लेखक के अपने हैं और साहित्य कुंज टीम का उनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।
सम्पादक:- सुमन कुमार घई; साहित्यिक परामर्श:- डॉ. शैलजा सक्सेना; सहायता - विजय विक्रान्त; संरक्षक - महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश
सम्पादकीय: साहित्य का व्यवसाय चाहे लेखक कितना भी कह लें कि लेखन केवल "स्वान्तः सुखाय" प्रक्रिया है, परन्तु मैं इसे नहीं मानता। लेखक सदा पाठक या श्रोता की अपेक्षा रखता है। सृजन प्रक्रिया अगर मानसिक सुखद व्यसन है तो दूसरी ओर इस कला के प्रकाशन का आर्थिक बोझ दुखदायी हो सकता है..... पूरा पढ़िए
इस अंक में कहानियाँ -
रामलीला
अम्बरीश कुमार श्रीवास्तव
लव एंड शादी.कॉम
रिशी कटियार
बेटियाँ
हेमंत शेष
हास्य - व्यंग्य - बाल साहित्य - लघु कथा -
सौ साल पहले - प्रमोद यादव
सिंघम रिटर्न ५३ .... - सुशील यादव
मुखर-मुखिया, मजबूर मार्गदर्शक...!! - तारकेश कुमार ओझा
ग़लती नहीं करूँगी, बिल्ली की दुआएँ - प्रभुदयाल श्रीवास्तव कहानीकार - हेमंत शेष
तोहफ़ा - ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’
ये कहाँ आ गए हम...।, फ़ैशन, तीर्थान्त - रचना गौड़ ’भारती‘
आलेख शृंखला - साहित्य और सिनेमा -  शोध निबन्ध -  
इसी बहाने से-
मित्रों, एक लम्बे अरसे से किसी बहाने से साहित्य चर्चा नहीं कर पाई। इस बीच कुछ लिखा, कुछ पढ़ा और बहुत सा सोचा...
कविता, तुम क्या कहती हो!! - डॉ. शैलजा सक्सेना

फ्रांसीसी राज्य क्रान्ति और यूरोपीय नवजागरण की अंतरकथा : ए टेल ऑफ़ टू सिटीज़
डॉ. एम वेंकटेश्वर
भारतीय साहित्य में अनूदित साहित्य का महत्व और कन्नड़ का अनूदित
"हयवद्न" नाटक का विशेष अभ्यास
-  पिनल पढियार
धर्म का मौलिक स्वरूप - रामकेश्वर तिवारी
जयशंकर प्रसाद की कहानियाँ- वर्तमान परिप्रेक्ष्य - रहीम मियाँ
नाटक - साक्षात्कार -  अनूदित साहित्य
ज़हर का पौधा
डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
नुक्कड़ नाटक की अध्येता और आलोचक डॉ. प्रज्ञा से बातचीत
मोनिका नांदल
एक राजनैतिक कहानी
तेलुगु मूल : "ओका राजकीय कथा"
लेखिका : वोल्गा
हिन्दी अनुवाद: प्रो. एम. वेंकटेश्वर
कविताएँ - शायरी -
शहर, वो औरत, गुमनामी, दीवाली - डॉ. विक्रम सिंह ठाकुर
शिकायत सब से है लेकिन, नए साल से कह दो कि, चाय का कप - डॉ. मनीषकुमार सी. मिश्रा
हँसना झूठी बातों पर, तेरा चेहरा नज़र आये - मनोज यादव
आम आदमी का सामान्य ज्ञान, बेटियाँ, फिर से कुएँ पर जा-जा कर, याद - जयप्रकाश मानस
मेरे मार्गदर्शक - पिता और शब्दकोश, पत्थर तोड़ती औरत - मनोज चौहान
वही तो रक्त है, त्राहि-त्राहि मची हो, ओ मातृभूमि तेरी जय होये - उपेन्द्र परवाज़
इक कहानी तुम्हें मैं.., सूरत बदल गई कभी, बिना तेल के दीप जलता नहीं है - संजय कुमार गिरि
वो इश्क के क़िस्से, अपने पास न रखो, तेरे इंतज़ार में, थककर चूर, तेरे आगोश में - अमित राज ‘अमित’
दिल मिरा ये सोचकर हैरान है, हम क्या बताएँ कैसे, और क्या था - अनिरुद्ध सिंह सेंगर

प्रमोद यादव के रेखाचित्र..









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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग,छत्तीसगढ़
प्रमोद यादव के रेखाचित्र..

Tuesday, 19 January 2016

संकल्प / लघुकथा / प्रमोद यादव

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रोज देखता कि जैसे ही वह दुकान खोलता ,पहले तिजोरी खोल धूप-बत्ती करता..श्लोक-वोक पढ़ता.. फिर गद्दी के ऊपर दीवाल में टंगी देवी-देवताओं की फोटुओं को हाथ जोड़ प्रणाम करता.. इतना कुछ करते ही रहता कि तेरह साल का छोटू बिला नागा उसी समय नीबू और हरी मिर्च की माला लिए पहुँच जाता.. नीबू–मिर्च की माला ले मन्त्र-जाप करते एक पांच का सिक्का वह उसकी हथेली पर धरता और कुर्सी खींच उसमें चढ़कर मेन गेट के बीचो-बीच माला टांग देता.. फिर छोटू आगे की दूकान तरफ बढ़ जाता..और वह अपने काम में लग जाता... यह रोज का सिलसिला था..
एक दिन मैंने दोस्त से पूछा कि क्या तुमने कभी छोटू से बातचीत की है ? तो उसने सिर हिलाया- ‘नहीं..’ फिर उसी ने पूछा-‘ क्यों पूछ रहे हो ? भला उससे क्यों बात करूँ और क्या बात करूँ? गरीब लड़का है..रोज नीबू-मिर्च लिए आ जाता है तो रख लेता हूँ..सारे लोग रखते हैं तो मैं भी रख लेता हूँ..’
‘ केवल इसिलए रख लेते हो कि सभी रखते हैं या फिर टोना-टोटका मानते हो ? ‘
‘ अरे नहीं यार..मैं इसलिए रखता हूँ कि वह गरीब है..पर औरों की तरह भीख तो नहीं मांग रहा..वह मेहनत करता है..अपनी मेहनत का खाता-पीता है..’
‘ क्या सचमुच ही वह गरीब है ?’ मैंने पूछा.
‘ अरे गरीब है तभी तो ये काम करता है..वर्ना ये तो उसके पढ़ने-लिखने के दिन है..और फिर उसे तो चार साल से ऐसे ही देख रहा हूँ..कभी ढंग के कपडे भी नहीं पहनता..’
‘अच्छा ये बताओ क्या तुमने कभी उससे उसके घर-परिवार के बारे में कुछ पूछा है ? ‘
‘ अरे इतनी फुर्सत नहीं यार..सुबह-सुबह बोहनी करूँ कि उससे बातें करूँ ? मैंने आज तक न कभी उससे कोई बात की.. न ही कुछ पूछा ..पर तुम बताओ..तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो ? ‘
‘ अब रहने भी दो यार..सुनकर तुम्हें धक्का लगेगा..’
‘ अरे यार..पहेली मत बुझाओ..बताओ ..बात क्या है ? ‘
‘ बात ये है बुद्धू कि जिसे तुम गरीब समझे हो वो पड़ोस वाले गाँव के एक खाते-पीते संपन्न घर का लड़का है..उनकी एक दिन की कमाई तुम्हारे महीने भर की कमाई से ज्यादा है..अभी-अभी ही मुझे पता चला है..’
‘ नहीं यार..ऐसा हो ही नहीं सकता..एक संपन्न घर का लड़का भला इतना छोटा काम क्यों करेगा ? ‘
‘शायद तुम्हे मालुम नहीं पर हरेक सफल कारोबारी जानता है कि काम कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता.. बस, उसे लगन और प्रेम से चुपचाप करते रहो तो सफलता कदम चूमती ही है..और छोटू यही करता है..’
‘ नहीं यार..तुम झूठ बोल रहे हो..मैं उस गरीब को अच्छी तरह जानता हूँ..कल सुबह तुम दुकान आओ.. उसी से पूछ लेंगे..सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा..’
‘ दूध का दूध तो नहीं मालुम पर तू पानी-पानी जरुर हो जाएगा ’ मैं मन ही मन बुदबुदाया.
दुसरे दिन सुबह ज्यों ही छोटू आया ,उसने उसे पकड़ लिया.. और सीधे सवाल किया- ‘ बता छोटू..जो कुछ तुम्हारे बारे में सुना - क्या ये सच है ?
‘ जी...’ उसने सिर झुकाए धीरे से कहा.
‘ अरे..किस विषय में पूछ रहा हूँ , तुम्हें मालुम है ? ‘
उसने फिर कहा- ‘ जी.. ‘
‘तुम्हारे पिता क्या करते हैं ? क्या उनकी भी कोई दुकान है ? ‘
‘ जी...चिटफंड का कारोबार हैं..छोटा- सा एक दफ्तर है..’ इस बार उसने कुछ लम्बा सा जवाब दिया.
‘अपने दफ्तर में नीबू-मिर्च टांगते हो ? ‘
‘नहीं..’
‘क्यों.. ?’
‘हम टोना-टोटका नहीं मानते..’
सुनकर दोस्त पानी-पानी हो गया फिर भी हिम्मत न हारते हुए पूछा- ‘ तुम और तुम्हारे पिताजी महीने में कितना कमा लेते हो ? ‘
‘ पता नहीं..एक बार उन्होंने गिनने की कोशिश की थी पर ग्यारह लाख छियासठ हजार के बाद गिन नहीं पाए..उन्हें चक्कर आ गया था ..’
इतना सुनना भर था कि दोस्त को चक्कर आ गया..
दुसरे दिन सुबह छोटू आया तो उसने उसे बैरंग लौटा दिया..अब बिना नीबू-मिर्च की माला के दूकान चल रही है..
गरीब लोगों से उसका विश्वास उठ गया है...कोई भिखारी भी आता है तो उसे लगता है कि कहीं वो बिलगेट की तरह अमीर तो नहीं ? कहीं उसका स्विस बैंक में एकाउंट तो नहीं ?..तरह-तरह के सवाल पूछ परेशान कर डालता है..भीख की जगह भाषण देता है.. दुकानदारी कम ,भाषण बाजी ज्यादा करता है..और अब तो इसी के भरोसे जीता है..यही उसका पेशा है..जिसे वह पूरे लगन से करता है...जी हाँ..अब वो आदमी नहीं नेता है.. देता कुछ नहीं..बस, केवल लेता है..
बहुत ही कम समय में वह संतुष्ट दिखने लगा है..क्योंकि रूपये गिनते अब उसे भी छोटू के बाप की तरह चक्कर आने लगा है..
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प्रमोद यादव
गया नगर, दुर्ग,छत्तीसगढ़

प्रमोद यादव का हास्य-व्यंग्य - आईक्यू टेस्ट

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 यह सम सामयिक  हास्य-व्यंग्य " आई.क्यू.टेस्ट" प्रेषित है जो मैनपुर यू.पी.के एक समाचार पर आधारित है..जिसमें एक दुल्हन मंडप में दूल्हे का  " आई.क्यू.टेस्ट" लिया और फेल होने पर  उससे शादी तोड़ दी.

आई.क्यू.टेस्ट / प्रमोद यादव


‘ एक बात पूछूँ जी ? ‘ पत्नी चाय के साथ समोसा परोसते बोली.
‘ हाँ..पूछो..’ पतिदेव डायनिंग टेबल की कुर्सी पर विराजते बोले.
‘ ये “आई.क्यू.” टेस्ट क्या होता है ? ‘

‘ अरे..ये अचानक “आई.क्यू.” टेस्ट क्यों पूछ रही हो भई ? पति ने हंसते हुए पूछा.
‘ वो क्या है ना..आज के अखबार में एक समाचार पढ़ी कि मैनपुर यू.पी.की एक दुल्हन मंडप में दुल्हे का “आई.क्यू.” टेस्ट ली और फिर उस दूल्हे से शादी करने से इनकार कर दी..इसलिए पूछ रही थी..’
‘ अच्छा.. अच्छा..समझा...तुम सब औरतें एक जैसी होती हो यार..ऐसे ही समाचारों को चटखारे ले ले के पढ़ती हो..हेड-लाईन वाली खबरों की कभी चर्चा नहीं करती..कभी नहीं पूछी कि पी.एम. साहब दौड़-दौड़ कर अमेरिका क्यों जाते है ?..आस्ट्रेलिया जाकर क्या करते हैं ?..पाकिस्तान क्यों नहीं जाते ? जापान से इतना क्या प्रभावित कि काशी को क्योटो बना रहे.. आदि..आदि..’

‘ अरे बाबा..रुको भी..जो पूछ रही हूँ,उसका जवाब दीजिये...पी.एम.से हमें क्या लेना-देना? वे कहीं आये कहीं जाये उनकी मर्जी..भला कौन रोक सकता है उन्हें ? वे यहाँ मंहगाई नहीं रोक सकते...देश वासी उन्हें विदेश दौरे से नहीं रोक सकते..दोनों मजबूर है..हिसाब बराबर..’ पत्नी ने ज्ञान बघारते कहा.

‘ अरे छोडो भी...अब तुम मंहगाई का रोना रोओगी कि प्याज सुधरा तो दाल गलनी बंद हो गई .. फिर तेल में आग लगी..अब लहसुन उछल रहा.. उफ़..ये चेप्टर बंद करो यार..इसमें उलझना बेकार है..ये तो तय है कि सरकार किसी की रहे- मंहगाई “मस्ट” है..वो रहेगी ही..इसे ही तो मुद्दा बनाकर हर पार्टी चुनाव लडती है..और सरकार बनती है..दूसरा मुद्दा विकास का होता है जिसका सब पार्टी ढिंढोरा पीटते है और जीतने के बाद हाशिये पर डाल देते हैं.. फिर उसे चुनावी जुमला या नारा कह देते हैं..’ पति ने भाषण झाड़ते कहा.

‘  अब राजनीति की ये बोरिंग बातें छोडो ..कहाँ हम शुभ-शुभ शादी-ब्याह..मंडप..दूल्हा-दुल्हन की बातें कर रहे थे..और आप बीच में पी.एम. को ले आये..अब ले ही आये तो ये भी बता दिजीये कि कहीं इनका भी तो मंडप में “आई.क्यू.” टेस्ट नहीं हुआ था ?..उन्हें हमेशा अकेले ही देखते आये हैं..’ पत्नी सशंकित सी बोली.
‘ चुप पगली...कुछ भी अनाप-शनाप बक देती हो...मुझसे पूछी तो पूछी और किसी से न पूछियो ..समझी ? ‘ पति ने गुस्से से कहा.

‘ ठीक है नहीं पूछेंगे...पर जो पूछ रहे वो तो बताओ..क्या ये टेस्ट भी डी.एन.ए.टेस्ट के माफिक होता है ? पत्नी पूछी.
‘ हे भगवान..अब कहाँ से तुम डी.एन.ए.ले आई.. टेस्ट हजारों तरह के होते हैं पगली..जहां जिसकी जरुरत होती है , किया जाता है..’ पति ने जवाब दिया.
‘ अरे हजारों तरह के होते हैं तो एक का अर्थ तो बताईये ? क्या होता है ये “आई.क्यू.” टेस्ट ? क्या शादी के मंडप में ही होता है ये टेस्ट ? फिर हमारी शादी में ये रस्म क्यों नहीं हुआ ?‘

‘ अरी भागवान..ये रस्म नहीं होता ..रस्म होता तो हम पहले तुम्हारा टेस्ट लेते ..’
‘ हाय दईया..क्या दूल्हा भी ले सकता है ये टेस्ट ? आप तो हमें पास कर ही देते..देते क्या-किये हैं..तभी तो हम आपकी बीबी बनकर आये हैं और आपको दुनिया का सारा सुख दे रहे हैं..’ पत्नी भाव विभोर होते बोली.
‘ हाँ..सो तो है..थोड़ी और पढ़-लिख लेती तो और ज्यादा सुख देती..हमें कम से कम “आई.क्यू.” का अर्थ नहीं बताना पड़ता..’ पति गंभीर होकर बोला .

‘ ठीक बोले जी...हमें आठवीं तक पढ़ लेना था..पर अब क्या करें ? पांचवी फेल हुए तभी समझ गए कि आगे की पढ़ाई और कठिन होगी इसलिए आगे का इरादा छोड़ दिया..अब बीती ताहि बिसार के आगे की सुधि लीजिये.. बताइये.. “आई.क्यू.” टेस्ट क्या होता है ? ‘
‘ अरे यार... तुम घूम-फिर कर वहीं आ गई..तुमने तो पूरा समाचार पढ़ा है न ? बताओ – क्यों इंकार की दुल्हन ने शादी से ?
‘ लिखा था की मंडप में दुल्हन को लगा कि दूल्हा ठीक से मंत्रोच्चारण नहीं कर पा रहा..फिर  उसने दुल्हे को टच स्क्रीन मोबाईल में अपना नंबर टाईप करने कहा तो दूल्हा नाकामयाब रहा.. फिर दुल्हन ने उसे कुछ सिक्के देकर सबका जोड़ बताने कहा लेकिन वह न जोड़ सका इसलिए उसने शादी तोड़ दी ..’ पत्नी विस्तार से बताई.
‘ मतलब साफ़ है यार कि उसे दूल्हा हर एंगल से फिसड्डी लगा इसलिए रिश्ता तोड़ दिया. हमारे जमाने में ये चोचले नहीं थे वर्ना..’

‘ वर्ना... वर्ना क्या ? ‘ पत्नी गुर्राई .
‘ वर्ना.. वर्ना क्या मालूम तुम भी मुझे रिजेक्ट कर देती.. और आज मैं निपट अकेला होता (और कितना खुश होता )’ पति ने बात सुधारते कहा.
‘ कैसी बातें करते हैं जी ? हम आपको जरुर पास कर देते..और किये भी हैं तभी तो हम साथ-साथ हैं.. वैसे आप भी हमारा टेस्ट लेते तो हम पास ही होते..हमें शादी के सारे मंत्र और श्लोक याद है..अपना नंबर भी मोबाइल में टाइप कर लेते है और जोड़-घटाने में तो तीसरी तक हम अव्वल ही रहे..’

पतिदेव ने माथा पकड़ते कहा- ‘ अच्छा हुआ भागवान.. उस जमाने में “आई.क्यू.” टेस्ट का चलन नहीं था- वर्ना आज नजारा कुछ और होता..भगवान् जाने तुम कहाँ होती और मैं कहाँ ? ..खैर..वो तुम नहीं समझोगी..अब सुनो- आई. का मतलब होता है- इंटेलिजेंस और क्यू. का मतलब- कोशेन्ट..हिंदी में इसका मतलब है-बुद्धि-लब्धि.. “आई.क्यू.” टेस्ट यानी बुद्धि-लब्धि परीक्षा..बौद्धिक स्तर मापने का तरीका..इससे बुद्धि का आकलन किया जाता है..यह बहुत बड़ा विषय है..बस इतना जान लो – किसी का “आई.क्यू.” स्कोर हाई होता है तो किसी का लो ..’

‘ किसका हाई और किसका लो स्कोर होता है जी ? ‘ पत्नी बोली.
पति कुर्सी से उठते हुए मजाक से बोला- ‘ समझ लो..औरतों का लो और हम मर्दों का हाई..’
‘ ये गलत बात है जी..आप मर्द लोग हर क्षेत्र में हमें “लो” कर देते हो..और खुद हाई (कमान) हो जाते हो..ये सरासर नाइंसाफी है..’ पत्नी बडबडाती हुई प्लेट समेट किचन की ओर चली जाती है..

पति मन ही मन मुस्कुराते हुए बुदबुदाता है - ‘ “आई.क्यू.” टेस्ट करके शादी करता तो ऐसी सीधी-सादी भोली पत्नी से हाथ धो बैठता..भला हो उस जमाने का और उन पुराने बुजुर्गों का जिन्होंने ये रिश्ता रचाया..तब के लोगों का “आई.क्यू.” स्कोर सचमुच हाई रहा होगा..’
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                                                  प्रमोद यादव
                                       गया नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़