Thursday, 26 June 2014

दिल्ली की बेदिली / प्रमोद यादव

‘एक बात कहूँ जी ? ‘ patnpatniपत्नी ने बिस्तर ठीक करते कहा.
‘ हाँ...कहो..’ पति ने टी.वी. में आँखें जमाये जवाब दिया.
‘ अरे...ये टी.वी.आपसे छूटे तो आपकी बीबी बात करे..पहले आप इसे आफ कीजिये तभी हम आन होंगे..’ पत्नी ने शर्त रख दी.
‘ अरे बाबा..बोलो भी...सब सुन रहे हैं हम..’ उसने पत्नी की ओर सिर घूमाकर कहा.
‘ मैं सोचती हूँ...काश..हमारा ये बंगला दिल्ली में होता..तो कितना अच्छा होता...’ पत्नी लम्बी सांस लेते बोली.
‘ क्या मतलब ? ‘ पति ने चौंकते हुए कहा- ‘ यहाँ भोपाल में भला कौन सा रोज भूचाल आ रहा है कि दिल्ली में बंगला होने की बात कर रही हो...’
‘ अजी आप समझे नहीं..मेरा मतलब है कि दिल्ली देश का दिल है..वहां होते तो सबके दिलों में रहते..धड़कते..’ पत्नी ने अतुकांत सफाई दी.
‘ओ मेम साब..सबके दिलों में धड़कने का क्या मतलब ? तुम्हारा ठिकाना..आशियाना तो केवल मेरा दिल है...औरों के दिल में क्योंकर धड़कोगी ? तुम तो जानती हो..इस बंगले से भी ज्यादा स्पेस मेरे दिल में है..जो पूरी तरह मैंने मुहब्बत के दिनों ही तुम्हारे नाम एलाट कर दी ..शादी के बाद तो तुम्हारा पूरा अमला( कमला,सरला.मुन्नू, टुन्नू, माँ-बाबूजी ) इस बंगले में आ बसे (घुसे) फिर भी मैंने दिल थामें रखा..अचानक क्या बात हो गई कि दिल्ली पे दिल आने लगा ? ‘
‘ अरे बाप रे...आप भी ना..क्या से क्या सोच डालते है पल भर में...मैं तो आपके ( आपके ) उस बेचारे की समस्याओं के मद्देनजर दिल्ली की बात कर रही थी जो चार-पांच महीने पहले दिल्ली के सिरमौर और मुखिया थे...हीरो थे..दिल्ली के दिल थे ’
‘ कौन? वो टोपी और मफलरवाले महाशय की बात कर रही हो क्या ? ’ उसने चौंककर पूछा.
‘ हाँ..एबस्लूटली वही..बेचारे की क्या गति ( दुर्गति ) हो गई है..उसने पूरे दिल्ली वालों को टोपी पहनाई,अब दिल्ली वाले उन्हें टोपी पहना रहें..चंद ही दिनों में उन्हें हीरो से जीरो बना दिया...बेदर्दों ने सिरे से उसे खारिज कर दिया...’
‘ साफ़- साफ़ कहो यार बात क्या है ? ‘ पति ने मुद्दे पर आने कहा.
‘ अरे बेचारे को दिल्ली में कोई किराए का मकान नहीं दे रहा....कहाँ-कहाँ नहीं भटक रहे-दस-बारह कालोनी घूम आये पर उन्हें अपनी पसंद का बंगला नहीं मिल रहा..एक-दो जगह बात तय हुई..किराया भी तय हुआ..पर सामान शिफ्ट करने की तैयारी में जुटे कि मकान मालिक का पैगाम आ गया- सॉरी ..पडोसी एतराज कर रहे..धमका रहे हैं...आपके आने से यहाँ नित हो-हल्ला होगा. आन्दोलन और हड़ताल का सिलसिला होगा.....कालोनी की शान्ति भंग होगी.. कान्ति कम होगी.. सो, हम किराये पर मकान नहीं देंगे..हमें कृपया क्षमा करेंगे. 
‘ तो तुम्हें इससे क्या मतलब यार.. वैसे भी किराए पर मकान मिलना इतना आसान नहीं....देखती नहीं- हमारे भोपाल में ही कितने लोग मुंहमांगे पैसे लिए मकान के लिए भटकते रहते हैं..ढूँढने से एक बार जॉब मिल जाएगा पर किराए का मकान नहीं....वे पहले भी आम आदमी थे.. आज भी है..उन्हें मालुम है कि आम आदमी की देश में कितनी क़द्र है..तुम्हें सुनकर बुरा लग रहा कि उनके साथ ऐसा बुरा बर्ताव हो रहा..लेकिन उन्हें तनिक भी बुरा नहीं लग रहा..चुनाव में कितने ही थप्पड़ खाए.. उफ़ तक नहीं किये..उलटे उनके घर जाकर पूछते रहे- मेरा कुसूर क्या है ? लोगों ने उनके चहरे पर स्याही फेंकी..उन्होंने बुरा नहीं माना..कहा- लोकतंत्र में यह सब चलते रहता है..’
‘ बात उनके आम या विशेष होने की नहीं जी..चार-पांच महीने में ही उन्होंने ऐसा क्या गजब ढा  दिया कि दिल्ली वाले इतने बेदर्द और बेदिल हो गए..किराए के एक मकान के लिए उन्हें तरसा रहे..कहीं ऐसा तो नहीं कि इसमें उनके विरोधी पार्टीवालों का हाथ हो..’ पत्नी ने संदेह जाहिर किया.
‘ अब इनके सारे विरोधी तो सत्ता में हैं..या फिर सता के आसपास ही हैं..अब जब उनके ही आदमी उन्हें चवन्नी-अठन्नी समझ छोड़ रहे हैं..पार्टी छोड़ भाग रहें हैं..तो मैं नही समझता कि सत्ता में बैठे लोग इस नाचीज के साथ ऐसा तुच्छ व्यवहार करेंगे. ऐसा घटिया काम करेंगे...’
‘ अरे.. आप भी उन्हें चवन्नी-अठन्नी कह रहे हैं ..भूल गए..कभी आप भी आपहुआ करते थे..उन्हीं की टोपी लगा तारीफ़ के पुल बांधा करते थे..उनके सुर से सुर मिलाया करते थे..आपसे ऐसी आशा न थी.. छिः..’ पत्नी विचलित होकर बोली.
‘ देखोजी..राजनीति में भावुकता का कोई स्थान नहीं होता.. हमें वक्त के साथ चलना चाहिए.. उनका वक्त था तो उनके साथ था..अब अच्छे दिनों की बात ये कर रहे तो इनके साथ हूँ..हमें वर्तमान को साधकर चलना चाहिए ..’ पति ने फिलासफी बघारी.
‘ फिर भी आप बड़े खुदगर्ज निकले.. दिल्ली वालों की तरह बेदर्द निकले..आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी..’ पत्नी गुस्से से बोली.
‘ अरे भागवान..न सूत न कपास. आपस में लठम-लठाजैसी स्थिति मत बनाओ.. तुम्ही कहाँ –कहाँ की बातें छेड़ती हो.. मुझे लड़ने को उकसाती हो...खैर..अब छोडो इन बातों को और बताओ- तुम दिल्ली में बंगला होने की  कुछ बातें कह रही थी...’ पति ने बड़े ही सहजता से कहा.
‘ अब जाने भी दो...’ पत्नी दो टूक जवाब दे बिस्तर पर पसर गई.
‘ कहीं ऐसा तो नहीं कि महारानीजी दिल्ली में उस बेचारे”  को किराया देने का मूड बना रही थी ..’ पति ने कटाक्ष करते पूछा.
वह लजाकर मन्द-मन्द मुस्कुराने लगी.
‘ तो ये बात है..’ पति ने छेड़ते हुए कहा - ‘ तुम्हारी दिली इच्छा है तो दिल्ली में इन्हें किराये पर मकान तो दे सकते हैं..पर पहले वहां एक बड़ा-सा बंगला खरीदना होगा.और इसके लिए यहाँ के बंगले को बेचना होगा..तुम्हारे माता-पिता ,भाई-बहनों को बेक टू पेवेलियन.भोपाल से सीहोर भेजना होगा.. कहो तो इनसे बातें करूं ? ‘
‘ फालतू बातें बहुत करते हो जी.. जाओ...मुझे नींद आ रही....मैं सो रही हूँ..’ इतना कह वह करवट बदल लुढ़क गई.
पतिदेव उसकी बेसिर पैर की बातों को याद करते, हौले-हौले मुस्कुराते फिर न्यूज देखने बैठ गए....टी.वी. खोलते ही वही हजरात दिखे -- ट्रक में सामान लादे कहीं शिफ्ट होने जा रहे थे..पीछे मुड-मुड अपने पुराने (सरकारी) आवास को निहार रहे थे.. उसने सोचा कि पत्नी को उठाकर ये दृश्य दिखाए..
फिर सोचा- नहीं.. किरायेदार खो देने का गम उसे रात भर सोने नहीं देगा....दिली धक्का लगेगा.. दिल्ली उसे सचमुच बेदिल लगेगा..
  उसने पत्नी को नहीं उठाया.. चुपचाप टी.वी.बंद कर वह भी बगल में लुढ़क गया.
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Sunday, 15 June 2014

जमूरे...कब आयेंगे अच्छे दिन ?

15 जून 2014

प्रमोद यादव का व्यंग्य - जमूरे! कब आएंगे अच्छे दिन?

नीम पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर मदारी और जमूरा दोनों पस्त से अलसाए बैठे हैं.गर्मी इतनी कि दूर-दूर तक आदमी तो दूर, कोई जानवर तक नजर नहीं आ रहा..नीम के पत्तों में कोई हलचल नहीं. कोई खडखडाहट नहीं..उमस से हलाकान मदारी ने जेब से रूमाल निकाल चहरे पर फिराते बोला - ‘ जमूरे..’
‘ हाँ उस्ताद..’ आदतन आलाप के स्वर में जमूरे ने हामी भरी.
‘ जमूरे...अब इस मदारी के धंधे (खेल) में कोई दम नहीं रहा...लाख डमरू घुमाओ..डुग डुगी बजाओ..गले फाड़ चिल्लाओ..पर तमाशा देखने कोई जुटता ही नहीं..’
‘ ठीक कहा उस्ताद..’ जमूरे ने उत्तर दिया-‘ पहले तो एक बार डमरू बजाओ और मिनटों में चींटियों की तरह तमाशबीनों की भीड़ लग जाती..बच्चे तो बच्चे,बड़े-बूढ़े तक डमरू की गमक से खींचे चले आते थे..’
‘ हाँ जमूरे..अब तो बच्चे तक नहीं ठहरते..रिक्शे में लदे,बढ़िया यूनिफार्म पहने, टा टा करते बाजू से निकल जाते हैं.. पर नजर तक नहीं डालते..देखते ही देखते सब कुछ कितना बदल गया न ..’ मदारी ने आह भरते कहा.
‘हाँ उस्ताद..बन्दर-भालू के करतब देखने कैसे बच्चे उमड़े पड़ते थे..और तो और बड़े-बूढ़े भी बच्चों की आड़ में जानवर का तमाशा देखने जुट जाते..सत्यानाश हो पी.एफ.ए. वालों का (पीपुल फॉर एनिमल्स) जिन्होंने जीव बचाओ अभियान के तहत हम गरीब जीवों को ही मार डाला..अब भला इस डी.जे.और धमाल बाजा के युग में एक डमरू की क्या औकात कि तमाशबीन जुटा सके.. कोई भीड़ जुटा सके..’
‘ जमूरे..समझ नहीं आता कि क्या करें ? इन दिनों भीड़ जुटाना बेहद “टफ” हो गया है..ठीक है..कई साल पुराने खेल रोज-रोज भला कौन देखेगा ? लेकिन अब कोई नया खेल भी कहाँ से ईजाद करें ? अब या तो हमें ये धंधा बंद कर देना चाहिए या फिर इसे “हाईटेक” करने की कोशिश करनी चाहिए..’
‘ उस्ताद..अब भला मदारी के खेल को कैसे और क्या “हाईटेक” करेंगे ?’ जमूरे ने सवाल दागा.
‘ ठीक उसी तरह जमूरे..जैसे पिछले दिनों एक राजनीतिक पार्टी ने चुनाव-प्रचार की टेक्नोलोजी को हाईटेक किया और उसी के बल पर आसानी से चुनावी-जीत का वरण भी किया...’
‘ पर उस्ताद..चुनाव-चुनाव है..उसके प्रचार-प्रसार और भीड़ जुटाने के तरीके “हाईटेक” हो सकते हैं पर मदारी के खेल में इसकी कहाँ गुंजाइश है ?’ जमूरे ने संदेह व्यक्त किया.
‘ हाईटेक की गुंजाइश हर फील्ड में रहती है जमूरे ..ज्यादा दिमाग न खपाते हुए इन नेताओं से ही कुछ सीखो ..तुम तो पढ़े-लिखे हो न ? अब इनके दिए नारे से ही हम भीड़ जुटाएंगे.. “ अच्छे दिन आने वाले हैं” पर तुम एक स्क्रिप्ट तैयार करो..कल रामलीला मैदान में एक नया तमाशा करते हैं...देखते हैं-भीड़ कैसे नहीं जुटती..तमाशबीन कैसे नहीं आते..’
‘ ठीक है उस्ताद..मैं कुछ सोचता हूँ..रात को लिखकर आपको बताता हूँ..’
दूसरा दिन...रामलीला का मैदान...सुबह के दस बजे.....
जमूरा चादर ओढ़े जमीन पर लेटा है और मदारी डमरू बजा जोर-जोर से चिल्ला रहा है- ‘ मेहरबान...कदरदान.. आईये..अपने जमूरे से जानिये कि आपके अच्छे दिन कब आने वाले..देश में तो यह नारा तैर ही रहा लेकिन कब, कैसे, कहाँ और किसका ? ये किसी को नहीं मालूम..सरकार को भी नहीं मालूम..लेकिन जमूरे को सब कुछ मालूम है.. आईये..आईये..आईये और अपने अच्छे दिनों का मिनटों में हिसाब लीजिये..ऐसा अवसर फिर नहीं आने वाला..’
थोड़ी ही देर में पूरा मैदान तमाशबीनों से खचाखच भर गया..खेल आरम्भ हुआ.
‘ जमूरे..जो पूछेगा..बतलायेगा ? ‘
‘ हाँ उस्ताद..जरुर बतलायेगा ..’
‘ ये हलकी दाढ़ी वाले साहब जो सफ़ेद कुरते पाजामें में शहजादे की तरह कुछ बुझे-बुझे से खड़े हैं- क्या इनके अच्छे दिन आयेंगे ? ’ मदारी ने पूछा.
‘ हाँ उस्ताद..ये बरसों बाद अब नानी के घर जायेंगे..’ जमूरे ने जवाब दिया.
तमाशबीनों ने जोरदार ताली बजा शहजादे की ओर मुखातिब हो शुभकामनाएं दी.
‘ जमूरे..ये दुबले-पतले सज्जन जो मफलर बांधे, सफ़ेद टोपी लगाए बार-बार खांस रहे..”आप” की तरह हांफ रहे , इनके अच्छे दिन....’
‘लद गए उस्ताद..’ जमूरे ने बात पूरी भी नहीं होने दी और जोर से कहा- ‘.दिल्ली में रहते भी अब दिल्ली कोसों दूर है... कभी “आप” हम पर कभी हम आप पर.. यही दुनिया का दस्तूर है..’
भीड़ ने फिर जोरों की ताली बजाई..
‘ जमूरे..ये सफ़ेद पाजामें-कुरते में जो काली दाढ़ीवाले बुजुर्ग ( पर जवान से ) नेताजी खड़े हैं, इनके” अच्छे दिनों” के बारे में बताओ ? ‘ मदारी ने कहा.
‘ उस्तादजी...ये तो उस्तादों के उस्ताद हैं..इन्हें अच्छे दिनों का कभी इंतज़ार नहीं रहता.. अच्छे दिन इनका इंतज़ार करते हैं....सरकार कोई भी हो – सबमें शपथ लेते हैं...लोग चिराग लेकर ढूँडते हैं फिर भी “ पद ” नहीं मिलता है ..इन्हें बिन मांगे सब मिल जाता है..फिर भी आजकल “चिराग” लिए घूमते हैं...आगामी पांच सालों का प्लान किये चलते हैं...’ dhu
तमाशबीनों ने फिर एक बार तालियों की गडगडाहट से मैदान को गूँजा दिया. नेताजी भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सके. .
‘ जमूरे.ये भगुवा वस्त्र वाले,काली दाढ़ीवाले बाबा को जानते हो ‘ मदारी ने जमूरे से पूछा.
‘ हाँ उस्ताद..ये काले धन वाले बाबा हैं..इनके तो “बल्ले-बल्ले “ हैं.. अच्छे दिन आने ही वाले हैं..”सिट” ( SIT) तो बैठ गई..अब चलती कब है- देखना है..वैसे भी कई वर्षों से बाबा चिल्ला रहे तो सबने तो अपना “जमा” अब तक निकाल ही लिया होगा...कहीं “ डांडियाखेडा ” जैसी बात न हो जाए..वापस एक चवन्नी भी न आ पाए..’
तमाशबीनों ने फिर एक बार खूब ताली पीटी ..सीटी बजाई. बाबाजी थोडा चिंतित नजर आये.
‘ जमूरे..यहाँ जैकेट पहने खड़े कविजी जो पिछले दिनों कहीं और खड़े थे और वहां से जो भाग खड़े हुए, इनके बारे में बताएं कि अच्छे ( या बुरे ) दिन अब इन्हें कहाँ खड़ा करेंगे ?
‘ इस दीवाना-पागल से बस यही कहेंगे उस्ताद कि अच्छे दिन आ सकते हैं..पुनः मंचस्थ हो सकते हैं बशर्तें अब कहीं और खड़े होने का जहमत न उठायें. .”कुर्सी” में बैठने का दिवास्वप्न न अपनाये..शेर की तरह न गुर्राए..क्योंकि जो गरजते हैं-वो बरसते नहीं..’
इसके पहले कि मदारी जमूरे से कोई और सवाल पूछता एकाएक भीड़ में खलबली मच गई..लोग-बाग़ इधर-उधर भागने लगे जैसे कोई भूचाल आ गया....एक क्षण तो मदारी को भी कुछ समझ नहीं आया लेकिन जब पुलिस सायरन की आवाज करीब से आई तो समझ गया कि खेल ख़तम..आठ-दस पुलिस के जवान मदारी की ओर लपके..दो-तीन जवानों ने जमूरे की चादर खींच उसे पकड़ा.. सारे तमाशबीन इधर-उधर भाग गए.. पुलिसवाले ने डंडा दिखाते कहा- ‘ बिना परमिशन के मीटिंग करते हो..प्रदर्शन करते हो.. तमाशा करते हो..चलो थाने...’
मदारी गिडगिडाया – ‘ हुजुर.. मैं तो लोगो को केवल बता रहा था कि अच्छे दिन कब- कैसे आयेंगे.. कौन कब कहाँ कैसे जायेंगे..सरकार के दिए नारे को ही समझा रहा था.. मदारी का खेल दिखा रहा था..’
बीच में ही उसकी बात काटते अधिकारी ने कहा- ‘ थाने चलो..हम समझाते हैं तुम्हे कैसे आयेंगे-अच्छे (या बुरे ) दिन.. किसी के आये न आये पर जान लो – तुम्हारे तो जरुर आ गए... बुरे दिन... अब जेल में चक्की पीसो रात और दिन..’
इतना कह उस पुलिस अधिकारी ने मदारी को वैन के भीतर धकेल दिया. जमूरा पहले से वहां दुबका बैठा था. मदारी ने उसे घूरते मन ही मन बुदबुदाया - “ मति मारी गई थी कि नालायक से स्क्रिप्ट लिखाया..खेल को हाईटेक करने का (गलत) बीड़ा उठाया..दूसरों का भविष्य बांचते अपने वर्त्तमान को उलझाया..”
इधर जमूरा भी मदारी को देख मन ही मन बुदबुदा रहा था - ‘ अच्छे दिनों के चक्कर में उस्ताद ने क्या बुरा फंसा दिया ..चुनावी नारे के चलते सरकारी मेहमान बना दिया ..’
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प्रमोद यादव
गया नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़


आगे पढ़ें: रचनाकार: प्रमोद यादव का व्यंग्य - जमूरे! कब आएंगे अच्छे दिन? http://www.rachanakar.org/2014/06/blog-post_1071.html#ixzz34PakE8gQ



Friday, 13 June 2014

" मेरे पास माँ है "

मेरे पास माँ है../ प्रमोद यादव
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पिछले दिनों संसद के गलियारे में एकाएक पी.एम. ने जब शहजादे को खड़े देखा तो वे उनकी ओर बढे  और बेहद ही गर्मजोशी के साथ उनसे हाथ मिलाया. शहजादे ने भी उसी शिद्दत से हाथ मिलाया.दोनों देर तक हाथों को झुलाते रहे. पी.एम..के होठों पर लम्बी मुस्कान खिंची थी तो शहजादे ने भी कोशिश करके उनसे भी दूगुनी मुस्कान बिखेरी थी .. दो ही क्षण में आँखों ही आँखों में उन्होंने कई बातें कर डाली. आँखों की भाषा का हिंदी अनुवाद कुछ यूं है –

‘ देखा शहजादे...हम कहते न थे-हमारी सरकार बनेगी..पी.एम.की कुर्सी पर हम ही विराजमान होंगे..तुमने तो इसे मजाक ही समझा होगा ..अब बोलो..?’
‘अब क्या बोलूंजी..’ उसने राजकपूर वाले अंदाज में कहा- ‘ मैं तो अपनी ही पार्टी में मजाक बन गया हूँ. जोकर बन गया हूँ...हमारे खेमे में एक से एक सुपर-डुपर धुरंधर नेता और मंत्री थे इसलिए डूबने की बात तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था..’
पी.एम. ने बीच में बात काट दी –‘ नहीं शहजादे..वे धुरंधर नहीं-नंबर एक के घोटालेबाज थे..आस्तीन के सांप थे...तुम्हारे पी.एम. भर समझदार थे..उन्होंने पहले ही कुर्सी का मोह त्याग हमें वाकोवर दे दिया..अब देखो- मेरे पास पी.एम.की कुर्सी है...सेवन रेसकोर्स का बंगला है.. मंत्रालय है..दरबारी मंत्री है..नौकरशाह है..एस.पी.जी. है..तुम्हारे पास क्या है ? ‘
शहजादे ने भोलेपन से कहा- ‘ मेरे पास माँ है...’
‘ तो अब अपनी माँ को लेकर चार-पांच साल की छुट्टियाँ मना आओ बरखुरदार..ननिहाल हो आओ.. मन बहल जाएगा..तब तक मैं देशवाशियों के लिए अच्छे दिनोंकी व्यवस्था करता हूँ.. अरे हाँ....माँ से याद आया कि मुझे भी माँ के पास जाना है..पडोसी पी.एम. ने उनके लिए सिल्क की साडी भेजी है,उसे  देने हैं ..अच्छा तो हम चलते हैं..’
शहजादे ने नहीं पूछा कि फिर कब मिलोगे ? दोनों पीठ मोड़ अपने-अपने रास्ते निकल गये.
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                                                            प्रमोद यादव
                                                     गया नगर , दुर्ग, छत्तीसगढ़ 


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15 मई 2014
प्रमोद यादव का हास्य व्यंग्य - मुलाकात एक जिन्न से
मुलाक़ात-एक जिन्न से../प्रमोद यादव
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न मालूम क्यों बचपन से मुझे भूत-प्रेत, जिन्न-पिशाच,आत्मा-परमात्मा आदि पर एक विश्वास जैसा रहा..छुट्टियों में गाँव जाता तो वहां के वातावरण में इस विश्वास को और बल मिल जाता...वहां ग्रामीणों का फुर्सत के समय बस यही एक विषय होता- भूत-प्रेत और जिन्न - पिशाच..जैसे हमारे यहाँ का होता है- राजनीति-भ्रष्टाचार और व्याभिचार-घोटाला...जहाँ गाँव में चार यार बैठते- बस शुरू हो जाता..भूत-प्रेत के सच्चे कारनामों का सिलसिला..टोनही की कारगुजारियों का सिलसिला.. जिन्न के किसी शरीर में घुसपैठ कर जाने का सिलसिला..मैं आत्मविभोर हो कांपते -डरते सब सुनता....मेरे भीतर का कौतुहल बार-बार उनसे पूछता-क्या सचमुच ऐसा घटित हुआ ?’ तब सभी मिले सुर मेरा तुम्हाराके अंदाज में एक सुर से इसे आखों देखी-कानों सुनीघटना करार दे देते.. एक कहता- आधी रात को मैंने खेत के मेड़ों के ऊपर इन्हें जमीन से दो फीट ऊपर हवा में चलते (उड़ते ) देखा..दूसरा तुरंत इस बात की पुष्टि कर देता- हाँ..मैं भी साथ में था..कोई बताता कि कैसे पड़ोस की अच्छी भली महिला अपने बगल वाली टोनही के संगत में यह विद्या (?)सीख दो बच्चों को खा गई.. कैसे गाँव वालों ने उसे निर्वस्त्र कर बैगा के कहने पर गाँव से बाहर कर दिया..कोई बताता कि कैसे मंगलू को गाय चराते वक्त भूत ने धर लिया..कैसे अजीब-अजीब आवाज में गुर्राता था वह..बैगा को भूत भगाते पसीना छूट गया..लोगों को बताया कि कोई भारी भूत ने उसे दबोच रखा था..तब मैं भारी भूत का अर्थ नहीं समझ पाया..पर अब लगता है कि भारी से उसका आशय जिया उल हक़या किंगकांगके भूत से रहा होगा.
कभीकभार ये भी बताते कि कैसे पड़ोस की जवान लड़की को समय-बेसमय कोई जिन्न पकड़ लेता है..जिन्न के पकड़ते ही वह विचित्र-विचित्र हरकतें करती है..मुझे होश सम्हालने के बाद मालुम हुआ कि शहर में तो जिन्न वाला ये काम जवान छोकरे कब से करते आ रहे हैं..
खैर..तो मैं बता रहा था कि गाँव जाकर मैं पूरी तरह भूत हो जाता..खाना-पीना सब भूल जाता..बस,यही किस्से-कहानी ही सुनता रहता..कभी-कभी सोचता कि क्या कभी किसी भूत-प्रेत या किसी जिन्न से मुलाक़ात होगी ? क्या कभी इन्हें फेस टू फेसदेख सकूँगा? क्या इनसे बातें कर सकूँगा? इनकी असीमित शक्तियों के विषय में भी काफी कुछ पढ़ा था..कहते हैं कि ये अगर किसी पर मेहरबान हो जाए तो समझो उसकी लाटरी लग गई..जो मांगोगे-वही मिलेगावाली बात हो जाती..उनके लिए हर वक्त ये हाथ फैलाए,सिर झुकाए हुक्म हो मेरे आकाकी मुद्रा में खड़े होते..ऐसे ही एक अदद जिन्न की मुझे हमेशा दरकार और ख्वाहिश रही..पर ख्वाहिश आज तक ख्वाहिश ही रही..
सुनते आया था कि अक्सर ये आबादी से दूर सुनसान इलाके में रहते हैं..श्मशान घाट के आस-पास ज्यादातर पाए जाते हैं.. रामसे की कई फिल्मों में भी ऐसे ही उजाड़ जगह अथवा खंडहरों में इन्हें देखा करता..इसलिए गाहे-बगाहे मैं कई बार भारी गर्मी भरी दोपहरी में श्मशान घाट की सैर कर लेता..वहीँ कुछ पल ठहर जाता..ये सोच के कि – “कभी न कभी कोई न कोई तो आएगापर सिवा दो चार मरियल कुत्तों के कोई न आता..हाँ..कभी-कभी राम नाम सत हैकी धुन के साथ एकाध नया-नवेला भूत जरुर आ जाता..तब थोड़ी देर वहां और रुक जाता..ये सोच के कि नया-नवेला है..अभी पूरी तरह दुर्गति को प्राप्त नहीं हुआ..यहाँ की डोर से मुक्त नहीं हुआ..शायद मुझे और मेरी मंशा को जान ले..और मुझे मिलने का एपाइनमेंटदे दे..
एक दिन यूं ही श्मशान घाट के बाहर लगे पीपल के पेड़ के नीचे बने चौरे पर बैठे ऊपर पेड़ की ओर तक रहा था कि देखा पेड़ के तने में आठ-दस मिटटी के घड़े लटके रहे ..उत्सुकतावश उठा और एक घड़े का ढक्कन खोला ही था कि भूचाल सा आ गया..एकाएक अँधेरा घिर आया..बिजली चमकने लगी..जोरों की आंधी चलने लगी..मैं घबरा गया..समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ.. फिर दो-तीन मिनट की निस्तब्धता के बाद झक सफ़ेद कुरते पायजामे में एक मरियल से व्यक्ति का पदार्पण हुआ..मैंने पूछा- कौन हैं आप ? ‘
मुझे जिन्न कहते हैं आका.. आपका गुलाम.. आपका खादिम..आपकी बरसों की मानसिकता से परिचित हूँ..इसलिए शायद मिलना हुआ...वैसे गैरों से मिलना-जुलना हमारे यहाँ निषिद्ध है..हम मिलते नहीं..केवल घुसते हैं..और वो भी अच्छी बाड़ीदेखकर ही घुसते हैं..
मैं मन ही मन हंसा..खुद की बाड़ी तो मकोड़ी जैसे..और ख्वाहिश है माधुरी में घुसने की..मैंने कहा- आओ जिन्न..स्वागत है..पर तुम जिन्न जैसे तो लगते नहीं..हमने तो आज तक जितने देखे-सब के सब मुस्टंडे..बाड़ी बिल्डर वाले..टकले..पहाड़ से ऊँचे..घनी मूंछों और लम्बी चोटी वाले ही देखे..हम कैसे मान लें कि तुम जिन्न हो ? ‘
अरे..शंका का निवारण किये देते हैं..जिसे देखना चाहो..दिखा देते हैं..ऊपर के लोक में निवासरत किसी भी परिजन अथवा सेलिब्रिटी से कहो तो अभी के अभी मिलवा देते हैं..
सच..क्या ऐसा संभव है ? तो फिर नर्गिस को यहाँ बुलाईये..वो मेरी फेवरेट थी..मैंने कहा.
नहीं आका....इस वक्त वो नहीं आ सकती..बाहर डू नाट डिस्टर्बका बोर्ड लगा है..राज साहब से श्री 420” की सीक्वल पर चर्चा चल रही हैं.. सीक्वल का ज़माना है न.. फारिग होगी तभी आ पाएगी..उनसे फिर कभी मिल लीजियेगा
मुझे शक होने लगा कि पहले ही फरमाईश को पेंडिंग में डाल दिया तो काहे का जिन्न ? फिर भी एक मौका और देते कहा- अच्छा..तो मधुबाला को बुला दो..
उसने आँखें बंद कर कुछ बुदबुदाया और संगमरमरी बदन वाली हसीन मधुबाला ततक्षण ही मेरे सामने खड़ी हो गई- पिया..पिया..ना लागे मोरे जिया.जैसी लग रही थी..कुछ उदास-उदास.. उसकी खूबसूरती देख मेरी आँखें चौंधिया गई..मैंने नमस्तेकहा तो जवाब में उसने वालेकुम सलामठोंक मिनटों में गायब हो गई.
अब तो विश्वास हुआ न ? हम जिन्न हैं...
हाँ जी बिलकुल....तो जिन्न भाई..क्या तुम किसी से भी मेरी बात करवा सकते हो..? ‘ मैंने पूछा.
अवश्य..पर केवल दस मिनट ही..उससे ज्यादा कतई नहीं..उसने जवाब दिया.
क्या मैं झांसी की रानी से भी मिल सकता हूँ ? ‘ मैंने फरमाइशी व्यक्त की.
घोड़े वाली से ?’ उसने उलटे मुझसे पूछा.
हाँ..जी.. वही .. बिलकुल वही.. और क्या मैं नेहरुजी से भी बतिया सकता हूँ ? ‘
बिलकुल आका....फिलहाल तो खाली ही बैठे रहते हैं..कोई पुस्तक भी नहीं लिख रहे..उसने कहा.
क्या ग्राहम बेल भी मिल सकते हैं? ‘ मैंने और कुरेदा.
टेलीफोन वाले न..बिलकुल मिल सकते हैं...पर एक बात याद रखिये...केवल एक ही शख्स से मिल सकते हैं.. वो भी केवल दस मिनट के लिए..अब तय आप करो कि किससे मिलना है..किससे बातें करना है..दस मिनट में सोचकर बताईये ..तब तक मैं आज (श्मशान) आये भूत (मेहमान) को देख लूँ.. इतना कह वह खिसक गया.
मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि किससे मिलूं ? अकबर से कि बीरबल से..मुमताज से कि मोनालिसा से..भगतसिंह से कि सुखदेव से..रहीम से कि रसखान से..प्रेमचंद से कि टालस्टाय से..ग़ालिब से कि मोमिन से..केनेडी से कि लेनिन से...मीरा से कि पारो से..लैला से कि हीर से..न्यूटन से कि आइन्सटीन से..गाँधी से कि गोर्की से..नेहरु से कि राजीव से..नंदा से कि स्मिता से..काका से कि किशोर से..मृणाल से कि बासु से..चोपड़ा से कि देसाई से...जयप्रकाश से कि चरण सिंह से..वी.पी. से कि डी.पी. से..इसी उहापोह में दस मिनट बीत गए और जिन्न आ धमका-
हाँ..आका..बोलो..किससे मिलना है ? किससे बातें करनी है ?..अब की बार हमें ही वहां जाना होगा..बोलो..किसके पास चलें ? ‘ उसने उड़ने के लिए अपने बाजू फैला रखे थे..मुझे पीठ पर सवार होने का इशारा कर रहे थे..मैं बगैर एड्रेस बताये पीठ पर बैठ गया..और बिना रन वे के वह उड़ चला..मिनटों में ही पच्चीस सौ फीट की ऊँचाई में पहुँच गया..अचानक बराबरी से सफ़ेद दाढ़ी वाले का चार्टर्ड विमान गुजरा...वे खिड़की से झांकते मुझे वी.शेप में ऊँगली दिखा रहे थे..दोनों उँगलियों के बीच चुनाव चिन्ह भी फंसा था....मैं काफी रोमांचित हो उठा..लगा कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे..मैंने जिन्न से कहा- अपनी गति थोडा तेज करो जिन्न..इस विमान को पीछे छोड़ना है..
कौन है इसमें आका ? ‘उसने पूछा.
अरे ..जब सारे ब्रम्हांड की जानकारी रखते हो तो इसे नहीं जानते ?’ उलटे मैंने जिन्न को डांटा.
वो क्या है आका..कि उस लोक की पूरी जानकारी हमें है..पर ये तो दूसरा लोक है न..आप ही बता दीजिये कौन हैं ? ‘ उसने विनती की.
ये वो शख्स हैं जो पिछले दो-तीन महीनो से हवा में ही तैर रहें..उसे भी शायद किसी जिन्न ने पकड़ रखा है..नीचे आते हैं तो मिडिया में उड़ने लगते हैं..उनके भाषणों के चलते बच्चों ने टी.वी.सेट बंद कर रखे हैं..उनकी पार्टी के आधे से ज्यादा सयाने लोग भी इस हवा-हवाईके खेल से परेशां हैं..पर बोल कोई नहीं पा रहा..सब को जैसे सांप सूँघ गया है..अभी-अभी एक नया शो शुरू किया है..जो उन्हें नहीं जानते या जानना नहीं चाहते,उनके लिए अपने बारे में आठ पुस्तकें प्रकाशित कर मान न मान मैं तेरा मेहमानको चरितार्थ कर रहे हैं..लोगों को किताब बाँट रहे हैं.. उनकी ऊँची उड़ान से देश ही नहीं वरन विदेशियों के माथे पर भी बल पड़ने लगे हैं..
अरे.. तब तो मुझे इसे पीछे धकेल पछाड़ना ही होगा..लो हम आगे निकल गए..इतना कह जिन्न ने झटके के साथ गति बढाई और एक ही झटके में उस विमान से काफी आगे निकल गया.
अरे..जाना कहाँ है आका.. किससे मिलना है..अब तक नहीं बताया आपने..जिन्न को अचानक याद आया.
दरअसल सूझ ही नहीं रहा जिन्न कि किससे मिलूं ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कल-परसों तक सोचकर तुम्हें बताऊँ ? ’
अरे नहीं आका ..हमारा एक दिन दस साल का होता है..तो समझो अब बरसों बाद ही मिलेंगे..तब तक सोचकर रखना..फिलहाल यह कार्यक्रम यहीं स्थगित..अब हम समय ख़राब नहीं करेंगे..हमें ऊपर से अर्जेन्ट बुलावा है..चलो तुम्हें उस दाढ़ीवाले के विमान में घुसा देते हैं....तुम उनके साथ अपने ठिकाने उतर जाना..
मैं जोर से चीखा - नहीं.....चाहो तो पीठ पलटी कर मुझे यूं ही नीचे गिरा दो..पर उनके साथ नहीं जाना....टी.वी. में सुनते-सुनते पक गया हूँ..अब क्या मार ही डालने का इरादा है ? ‘
मुझे क्या ? ये लो....कहते उसने तुरंत पीठ पलटी कर मुझे नीचे गिरा दिया..
मैं आह...का तेज क्रंदन करते धडाम से नीचे आ गिरा....उठने की कोशिश की तो खुद को बिस्तर के नीचे पाया...सचमुच.. कैसे-कैसे सपने आते हैं..एक जिन्न से मिलने की ख्वाहिश थी..दूसरा भी मिल गया..सरे राह चलते-चलते..- एक के साथ एक फ्री की तरह..
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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़