Monday, 24 February 2014

प्रमोद यादव के चार हास्य-व्यंग्य -२४-०२-१४

चाय कि दूध ? - प्रमोद यादव

 .

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान् कितना बदल गया इंसान
  अच्छा हुआ...कवि प्रदीपजी कूच कर गए..और अनाप-शनाप दिन देखने से बच गए..वैसे तो यह गीत उहोनें पूरे संसार को लेकर लिखी पर अपने देश की पतली हालत से वे ज्यादा परिचित थे..उन्हें उम्मीद थी कि आगे हालात सुधरेंगे..इन्सान सुधरेगा..पर उनके जीवन-पर्यंत तो कुछ भी नहीं सुधरा..न देश न इंसान..अलबत्ता सब कुछ और जोरों से बिगड़ा और बदला ..वे होते तो ना जाने और क्या-क्या इंसान की फितरत पर.,.देश पर लिखते..उन्हीं के तर्ज पर किसी ने एक गीत लिखा- अम्मा देख..देख..तेरा मुंडा बिगड़ा जाए..अम्मा देख..देख.. इसका अर्थ (मेरे हिसाब से) यूँ है - माँ भारती..देखो..भारतवासी कैसे बरबाद हो रहे ( सियासत के फेर में)...देखो...लोक-तंत्र नरक-तंत्र हुआ जा रहा.. देखो..वोट और नोट का चक्कर चल रहा.. प्रजा का दुःख-दर्द कोई समझ नहीं रहा...देखो..सब उसे खसोट रहे..लूट रहे... देखो... कोई पिला रहा चुनावी चाय तो कोई पिलाये दूध..माँ...देखो..
सुनते हो जी.... पत्नी की तीखी आवाज ने हमेशा की तरह मेरे चिंतन को चिकोट दिया..अच्छा खासा मैं देश-दुनिया और बदलते इन्सान के बवाल पर बालिंग की सोच रहा था कि भूचाल आ गया...इसके पहले कि भूचाल रिपीट हो, मैंने जोर से बिगुल फूंका हाँ..सुन रहा हूँ…..बोलो..
अरे..आज का अखबार तुमने पढ़ा ? उसने ऐसे पूछा जैसे उसमें उसकी कोई लाटरी फंसी हो.
हाँ..पहले तो मैं ही पढता हूँ ना..तुम्हें तो मालूम है..इसके बगैर मुझे ठीक से हाजमा नहीं होता..अब ऐसा क्या छूट गया जो मैंने नहीं पढ़ा ?
तुमने पढ़ा न कि चुनाव के चलते पार्टी वाले जगह-जगह लोगों को मुफ्त की चाय पिला रहे हैं..
मैंने तुरंत बात काटी - अरे बीबीजी..पुराना न्यूज है ये....अब चुनाव करीब है तो गरीब को लुभाने, वोट -बैंक भुनाने ये सब तो करेंगे ही..तुमने भी तो उस दिन अपनी सखियों के साथ मुफ्त की चाय का लुत्फ़ उठाया ..कैसी थी मुफ्त की चाय ? मैंने पूछा.
अजी मत याद दिलाइये ..हम जिस स्टाल पर गई थी, वहां चाय के पूर्व कईयों ने  भाषण पिलाया तब चाय मिली.....पूरे दो घंटे बाद..
पर मैंने तो सुना है- चाय पहले परोसी जाती है फिर चुस्की के साथ चर्चा..तुम्हारे साथ कैसे उलट हो गया ?
हाँ..हम सब भी यही सोच गए थे जी....चाय का वक्त था..और पीने का मन..पर मुफ्त की चाय बड़ी मंहगी पड़ी....छः भाषणों के उपरांत..दो घंटे बाद मिली..वह भी ठंडी और बेस्वाद..
पर ऐसी शिकायत तो अखबार में अब तक नहीं छपी..तुम मिडिया में नहीं गई क्या ? मैंने उसे छेड़ा.
दरअसल चाय वाले की गाय कांजीहॉउस में कसरत करने गई थी..दूध के पैकेट कहीं उपलब्ध नहीं थे..तो कैसे पिलाते चाय ?हमने तो काली टी पर भी हामी भरी पर चायपत्ती लेने जो छोकरा गया था उसे पुलिस ले गई..अब खाली  शक्कर से तो बनती नहीं न चाय..इसलिए...... वह झेंप-सी गई.
मुफ्त की चाय थोड़ी देर से भी मिले तो क्या बुरा है ? मैंने चिढाया.
हाँ..पर कोई भाषण पिलाकर पिलाये तो बहुत बुरा है.. वह बौरा गई.
अच्छा छोडो यार..तुम अख़बार के विषय में कुछ बता रही थी न.. मैंने याद दिलाया.
हाँ..वही तो बता रही थी कि मुफ्त की चुनावी चाय के बाद अब यू.पी.में दूध मिलना शुरू हो गया है.....बिलकुल मुफ्त.....एक पुरानी पार्टी दूध पिलाकर वोट बटोरने के उपक्रम में लगी है..
तो क्या इरादा है ? दूध पीने गोरखपुर जाओगी ? मैंने पूछा.
अरे नहीं जी ..वैसे भी चाय पीने भला कहाँ अहमदाबाद गए थे..आज नहीं तो कल यहीं पीयेगे..अपने शहर में..बस..न्यौता भर आने दो..
तो देवीजी का मन अभी मुफ्तखोरी से भरा नहीं है..चाय के बाद अब दूध....वे भी अगर  भाषण पिलाकर पिलायें तो ? मैंने मजाक किया.
नहीं..ऐसा तो नहीं होना चाहिए...दूध तो बस गरम करो..सर्व करो..शक्कर,चायपत्ती,पानी मिलाने का कोई झंझट ही नहीं..पहले दूध मिलेगा फिर भाषण..इस बार तो बिलकुल नहीं झेलना है भाषण..
मतलब कि दूध जरुर पीना है..वो भी पार्लर में..मुफ्त में..?
हाँ..बिलकुल.. उसने फटाक से जवाब दिया.
अच्छा बताओ...वोट किसे दोगी ? चाय कि दूध को ? मैंने सहज भाव से पूछा.
जिससे ज्यादा फायदा हो .. उसने तुरंत जवाब दिया.
श्रीमतीजी .फायदे तो दूध के ही ज्यादा हैं..किसी से भी पूछ लो..स्वास्थ्य के लिए हितकारी..इसे धरती का अमृत भी कहते हैं..एक तरह से इसे पूरा भोजन माना जाता है..यह टी.बी.नाशक, बुद्धिवर्धक, पाचक होता है..दूध से चहरे का सौन्दर्य बढ़ता है..झांई, मुंहासे, दाग-धब्बे सब गरम दूध लगाने से चले जाते हैं..इससे ही मलाई,मक्खन,घी बनता है-चाय से नहीं..दूध किसी का हो- गाय-भैंस, भेड़-बकरी, ऊंटनी-गधी...सबका फायदेमंद होता है..तुम्हें मालूम है न - क्लियोपेट्रा रोज गधी के दूध से नहाती थी..उसकी सुन्दरता का राज लक्स नहीं गधी का दूध था.. गधी का दूध दो हजार रूपये लीटर में बिकता है...पुराने लोग आज भी दूधो नहाओ-पूतो फलो का आशीर्वाद देते हैं.
उसने बीच में टोका- अब चाय पे भी थोड़ी चम्मच चला दो..इसके भी गुण गिना दो..
मैंने कहा - चाय के केवल नुकसान बता सकता हूँ..यह स्वास्थ्य की सबसे बड़ी दुश्मन है..यह लत है..नशा है..इसमें कोई पौष्टिक तत्व नहीं होता..इससे एसीडीटी बढती है..शरीर में खुश्की आती है..पाचन में दिक्कत पैदा करती है..अनिद्रा की बिमारी देती है...अब बताओ..किसे वोट करोगी ? चाय कि दूध ?
पत्नी ने जवाब दिया- अभी तो चुनाव दूर है जी ...तब तक हो सकता है ..कोई मुफ्त में पिला दे जूस या कोई पिला दे सूप ..कोई पिला दे काफी तो कोई पिला दे लस्सी  .. तब तक वेट कर लेती हूँ..सब पीने के बाद तय करुँगी - किसको वोट करूँ..
अरे भागवान..मुफ्त का इतना कुछ पिओगी तो अपचन हो जाएगा..फिर वोटिंग के दिन  वोट नहीं कर पाओगी..पूरे दिन टायलेट में रह जाओगी..  मैंने समझाया.
अपचन होगा तो सबका टोंटा(गला) दबाने जाउंगी.....ई.वी.एम. में नोटा दबाकर  आउंगी.... इतना बोल वह हंसने लगी.
 मुझे बेहद ही फील-गुड फिल हुआ कि चलो अखबार पढ़ पत्नी सिलाई-गोटा से नोटा तक तो पहुंची...
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                                                 - प्रमोद यादव

                                            गया नगर , दुर्ग, छत्तीसगढ़
चाय पे बुलाया है../ प्रमोद यादव

           “ शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है
       बिना मतलब के कोई किसी को चाय पर नहीं बुलाता..( वैसे तो आजकल यह चलन आउट डेटेडहै..कोई चाय तो क्या पानी भी नहीं पूछता ) पर इन्होनें तो पूरे आवाम को एक साथ,एक ही वेन्यु में चाय पर बुलाया तो मतलब कुछ न कुछ नहीं बल्कि बहुत ही कुछ था..कहने को वे कहते रहे कि किसी ज़माने में वे भी चाय बेचा करते..इसलिए उन्हें मालूम है कि चाय की गुमटी या ठेला एक तरह से फुटपाथ का पार्लियामेंट होता है...दुनिया-जहान की सारी आवश्यक और अनावश्यक बातों की,राजनीति,धर्म,विज्ञानं,सिनेमा,युद्ध,सीमा की ,पड़ोस की अनुपमा,साधना आदि की चर्चा केवल यहीं होती है..इसलिए देश की दशा,दुरदशा,व्याप्त भ्रष्टाचार,सुराज-स्वराज आदि की चर्चा करने चाय की चौपाल को चुना..वे ये भी फरमाए कि चाय गरीबों का व्यापार है..( इतना तो सभी जानते हैं भाई....हम कहाँ कहते हैं कि टाटा या अम्बानी केतली लिए घूमते हैं ) आगे बोले कि सारे देश की जनता से एकमुश्त चर्चा करने चाय की गुमटी को चुनने का कारण इनसे बेपनाह मोहब्बत है.और इसलिए इन्हें सम्मानित करने का शौक चर्राया ..यह एक प्रयोग है..सार्थक हुआ( चुनाव जीते ) तो आगे और भी कुछ करेंगे..( अगला पड़ाव पानठेला हो सकता है..पानठेले में भी वही सब चर्चा होती है जो चायठेलों में होती है..फर्क इतना है कि चाय आगाज है तो  पान अंत)
      अब तक तो देश में दो ही तरह के चाय प्रसिद्द रहे रेलवे की चाय और नान-रेलवे चाय..पहली वाली चाय कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक जैसी,एक कीमत की और बेहद ही बकवास - बेस्वाद..वहीँ दूसरी चाय (नान-रेलवे) विभिन्न स्वाद व महंगे दामों में ठेलों, गुमटियों, ढाबों, रेस्तराओं, थ्री-स्टार, फाइव स्टार में उबलब्ध होते हैं..अब ये तीसरी पोलिटिकल चाय का प्रमोशन-विमोचन हुआ है..इसका स्वाद तो वही बता पाएंगे जिन्होंने चुस्की ली....राजीनीतिक चाय को हलक से उतारना हर किसी के बस की बात नहीं. और वो भी मुफ्त की...तो आइये- बात करते है..कुछ पीने और पिलानेवालों से..चाय की चौपाल पर.. सबसे पहले चलते हैं-कोलकाता ..
हाँ भैयाजी.. सुना है आप पच्चीस सालों से यहाँ पार्टी कार्यालय के सामने पार्टी के लोगों को पिला रहें हैं..आप के पिलाये लोग आज भी राजनितिक पटल पर कई ऊँचे पदों पर पगलाए पसरे हैं..क्या इसके पूर्व कभी किसी बड़े लीडर.ने आपको इस तरह तवज्जो दी ?  
  नहीं साहब..बिलकुल नहीं..अपने आखिर अपने होते हैं..चायवाले का दर्द एक चायवाला ही समझ सकता है..
अच्छा..तो  बताओ..इनसे आपको क्या उम्मीदें हैं ?
उम्मीद तो यही है साहब कि ये पी.एम. बनेंगे तो हमारा सालों से रुका रकम(उधार की चाय का) जो पार्टी वाले पी (डकार) गए हैं..हमें ईमानदारी से दिला देंगे..हम जब-जब भी मांगते हैं, ये देते जरुर हैं पर केवल धमकी.. कि तुम्हारी गुमटी गोल कर तुम्हे भी गो-वेंट-गान कर देंगे..
ठीक है भैया ..आप पैसा वसूल कार्यक्रम जारी रखे..हमारी शुभ-कामनाएं.. और मैं चलता बना.
  इस बार पटना के पमुख इलाके के चौराहे पर स्थित चाय-स्टाल पर पहुँच मुफ्त की चाय पीते एक जजमान से पूछा-
भाई साहब..देश की सबसे महंगी मुफ्त चाय कैसी है ?
उन्होंने तपाक से कहा- मुफ्त की है इसलिए बढ़िया है..अब रोज तो मिलेगी ना ? जवाब के साथ उसने एक अदद प्रश्न भी उछाल दिया..एक के साथ एक फ्री की तरह..मैंने समझाया-
रोज नहीं भैया..केवल अभी दो घंटे भर..रोज पिलायेंगे तो ये सड़क पे आ जायेंगे... फिर इन्हें तो कोई मुफ्त में भी न पिलाये....बताइए..आप केवल चाय पीने आये हैं या इनसे कुछ चर्चा भी चाहते है ?
हाँ..मैं कुछ जानना चाहता हूँ..
क्या ?
यही कि ये पागलों की तरह सबको क्यों मुफ्त में चाय पिला रहे हैं ?
मैं आगे और कुछ न सुन सका, भाग आया.
  देश का दिल दिल्ली के एक चाय स्टाल पर पहुंचा तो वहां ग्राहक टाईप आदमी कोई न दिखा..सारे लोग नेता जैसे भेष में दिखे..हकीकत तो यही है कि सब पीने वाले नेता ही थे..जिसका स्टाल था वह बंदा लोगों को दौड़-दौड़ कर कप सर्व करते दिखा..मैंने पहला सवाल उसी को दागा कि आप मालिक होकर नौकरों की तरह क्यों सर्व कर रहे हो तो उसका जवाब था- क्या करें जी..दो घंटों के लिए उन्होंने इसे जबरदस्ती हायर(हाईजैक) किया है..पैसा देंगे भी या नहीं..कह नहीं सकता..इन सबका रिकार्ड तो आप जानते ही है- माले मुफ्त-दिले बेरहम इन्होने तो ये भी कहा है कि अगर प्रोग्राम फ्लाप हुआ तो एल.सी.डी. का भी पैसा तुमसे वसूलेंगे..
सचमुच..गन्दी बात..गन्दी बात.... मैंने उसे सान्तवना दिया. फिर सवाल किया- आपको अगर चर्चा का अवसर मिले तो क्या पूछेंगे ?
  केवल यही कि हम चाय वालों ने उनका क्या बिगाड़ा ? दो घंटे बाद ये तो कूच कर लेंगे ..फिर हजारों टूट पड़ेंगे कि मुफ्त की चाय पिलाओ ..लोगों को समझाते-समझाते महीने लग जायेंगे. इस चौपाल के बाद पूरे चुनाव तक पार्टी वाले यूँ ही मुफ्त की चाय पिलाते रहेंगे तो हम चाय वाले खायेंगे क्या ?..
उसका दुःख वाजिब था..
.फिर मैं एक नेताजी की ओर मुड़ गया..पूछा- नेताजी..इस चाय पार्टी से भला देश का कोई भला होने वाला ?  
वे मुस्करा कर बोले- देश का भला- आपका ठेका. ...हमने तो इस इवेंट का ठेका लिया है..दो घंटे बीतने को है... अब.करोड़ रूपये हमारी जेब में...समझे ?
मैं बिलकुल समझ गया कि गयी भैस पानी में....तभी एक सज्जन ने मुझे भी मुफ्त की चाय थमा दी.. दो चुस्की ले मैं वहीँ कुर्सी में झपक गया...दुसरे ही पल दुसरे लोक पहुँच गया.. अमरीका का व्हाइट हॉउस...ओबामा को देख मैं पुलकित हो उठा .. मैंने हाथ मिलाया तो उन्होंने भी गर्मजोशी से शेक-हैण्ड किया..मैंने सीधे मुद्दे पर आते उनसे पूछा-
ओबमाजी.. क्या आप भी पोलिटिक्स में आने के पहले चाय बेचते थे ?
वे उबल पड़े- वाट रबिश क्वेशचन ?..पूछना है तो कोई ढंग का पूछो.. व्हाई आर यू आस्किंग अबाउट ब्लडी टी..?
मैंने बताया कि इन दिनों मेरे देश के दो बड़े लीडर चाय-चाय का खेल खेल रहें हैं.. आवाम को बता रहे हैं कि कभी वे भी चाय बेचकर गुजारा करते थे..( फ़िलहाल इनका गुजर-बसर विमान और चापर में होता है..धरती पर पाँव भी नहीं धरते) आसन्न चुनाव के चक्कर में दोनों वोट बटोरने आम बनने का चक्कर चला रहे हैं..
आप क्या बोल रहे ..मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा....आई कांट अंडरस्टेंड .... ओबामा झल्लाए.
मैंने समझाया कि ये इलेक्शन के पहले पब्लिक को भरमा रहे हैं कि कभी वे भी उन्हीं की तरह आम आदमी थे..एक ने चाय की हांक लगाई तो दूसरा भी हम किसी से कम नहीं के अंदाज में चायवाला बन गया.. वे भी देश  को चीख-चीख कर बता रहें हैं कि उनसे पहले वे....वे बेचते थे चाय... अपने भाई के साथ...इसलिए आपसे  पूछा कि क्या आप भी...?
नो..नो..हम पीते नहीं तो बेचेगा क्यों ?हमारे घर पानी ही नहीं होता तो कैसे बनेगा टी ? हम तो बचपन से ही बीयर-शेम्पेन पीते आये .. चाय की चुस्की कभी नहीं ली.. हमारे यहाँ पानी खूब महंगा.. दुकानों में बिकता है..सुना है आजकल तुम्हारे मुल्क में भी पानी बिकता है..गुड..वेरी गुड..खूब ..तरक्की किया.. वे हो-हो कर हंसने लगे.
सर जी..क्या आपने कभी इलेक्शन जीतने.. आम आदमी बनने.. कुछ बेचा ?
नहीं..हमने बेचा नहीं..बल्कि ख़रीदा.. बड़े लोग बेचते नहीं..केवल खरीदते हैं..
क्या ? मैंने चौंकते हुए पूछा.
नहीं बताएगा..वेरी सीक्रेट ..सारी.. वे चुप हो गए.
.एक पल के लिए हमारे बीच सन्नाटा पसर गया...मैं उस सीक्रेट के बारे में सोच ही रहा था कि अचानक जोरों का शोर उठा.. टूटने-फूटने, गिरने-पड़ने, दौड़ने -भागने की आहट आई..कुछ समझ पाता कि धड़ाम की आवाज के साथ मैं कुर्सी से नीचे गिरा और झपकी से बरी हो गया..ओबामा का सीक्रेट- सीक्रेट ही रह गया....पता कर पाता तो देश के इन कर्णधारों को फ्री में हैण्ड ओवर कर देता...कम से कम देश वाले डांडियाखेडा जैसे फ्लाप शो की तरह चाय-चाय का यह बोरिंग गेम देखने से तो बच जाते..
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                                               - प्रमोद यादव
                                          गयानगर,दुर्ग,छत्तीसगढ़
                                 
मैं बिकाऊ नहीं../ प्रमोद यादव
पापा ..पापा..हम अगर आपको बेचें तो आप कितने में बिकेंगे ?
आठ वर्षीय बेटे के मुंह से यह सवाल सुन मुझे अटपटा लगा, मैंने उलटे उससे पूछा- ये क्या अटपटा सवाल है ? मैं क्यों बिकूँगा ? और भला मुझे क्योंकर कोई खरीदेगा ? तुम्हारे दिमाग में ऐसी बातें आई कहाँ से ?
पापा..छोटा भीम देख रहा था तो ब्रेक आने पर दूसरे चैनल पर चला गया..वहां कोई अंकल बता रहे थे कि युवराज चौदह करोड़ में बिका..दिनेश कार्तिक साढ़े बारह करोड़ में..सहवाग तीन करोड़ में...इसलिए पूछा कि आपको अगर बेचें तो कितना मिलेगा..
अपनी मम्मी से पूछ लेना..मेरी कीमत वही लगा पाएगी..वैसे अक्सर तो वह यही कहती रहती है कि मुझे कोई कौड़ियों के भाव भी न खरीदे..
मैं समझा नहीं पापा..साफ-साफ बताओ न आप कितने में बिक सकते हैं ? और आपको खरीदेगा कौन ? क्या आदमियों की भी बोली लगती है ?
बेटे इतिहास उठाकर देखो तो समझोगे..सदियों पहले दास-प्रथा का चलन था..बड़े-बड़े अमीर विदेशी-हब्शी लोग थोक के भाव में आदमी ( दास ) खरीदते और उनसे ढोरों की तरह काम लेते..आदमियों की मंडी सजती थी….खरीदार आदमियों के शरीर को छू-छूकर देखते...हट्टे-कट्टे और मांस-पेशी वालों को पसंद करते ..जैसे शरीर-शरीर न हुआ सब्जी हो गया.. फिर मोल-भाव करते...मुझे खरीदकर कोई मेरा अचार भी नहीं दाल सकेगा..मुझे कोई नहीं खरीदेगा..
मम्मी भी नहीं ? उसने मासूमियत भरे स्वर में पूछा.
तुम्हारी मम्मी तो सत्रह साल पहले मुझे सात वचनों में लपेटकर खरीद ली है..अब तो उसी की प्रापर्टी हूँ..दुबारा मुझे क्यों खरीदेगी ?
बेच तो सकती है ना ?
हाँ..बेच सकती है अब बेटे को कैसे बताता की मुझे बेच डाली है. मैंने कहा- पर सेकण्ड हैण्ड माल आजकल खरीदता कौन है ? सबको नए की चाह है..
पर पापा..युवराज कैसे चौदह करोड़ में बिक गया..वह भी तो आपकी तरह सेकण्ड हैण्ड ही होगा..
वो नंबर वन क्रिकेट खिलाडी है बेटे .. क्रिकेट के काले धंधे में सब कुछ बिकाऊ है..
तो आप इस काले धंधे से क्यों नहीं जुड़े ? जुड़ते तो आज करोड़ों के होते..
अरे बेटा..अब ये उमर काले-धधे करने के नहीं , बल्कि बाल काले करने के हैं..बता..बाल काले करूँ कि काला धंधा करूँ ?
अच्छा पापा..ये बताइये कि क्रिकेट खिलाड़ी ही बिकते हैं या हाकी-फ़ुटबाल खिलाड़ी भी ?
वैसे तो इस देश में सब बिकाऊ है..पर दाम केवल क्रिकेट में ही अच्छे मिलते हैं..
तो पापा..कल से मैं केवल क्रिकेट ही खेलूंगा ..मेरे लिए आप स्टम्प और एक बैट ला दीजिये..प्रक्टिस करूँगा..आपकी उमर तक तो करोड़ों का हो ही जाऊँगा..
ऐसा नहीं होता मेरे लाल . मैंने समझाया केवल नामी-गिरामी खिलाड़ी ही बिकते हैं...
तो नमन झा क्यों नहीं बिका पापा ?
मैं झुंझला गया,बोला- ये क्या तुम खरीदने-बेचने और मोल-भाव की बातों में अपना समय बर्बाद कर रहे हो..जाकर चुपचाप अपनी पढ़ाई करो...बच्चों को इन सब बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए..
ध्यान नहीं दूंगा तो आपकी तरह हो जाऊँगा पापा..न घर का न घाट का....मैं भी नहीं बिक पाऊंगा  ..और करोड़ों से वंचित रह जाऊँगा..
मैंने गुस्से से फटकारा- छोडो ये बकवास ..और दूसरा कुछ पूछना हो तो पूछो..
एक सवाल के जवाब को तो आप जलेबी की तरह गोल-मोल कर रहें हैं..और क्या पूछूं ? अरे बताइये भी कि आप जैसे लोग कभी बिकते भी हैं या.. वह भी तलमला गया.
हम आम आदमी पांच साल में एक बार ही बिकते है बेटा ..चुनाव के दिनों में..वह भी कौड़ियों के मोल..कभी साडी में बिक जाते हैं तो कभी कम्बल में..इससे ज्यादा घास कोई डालता भी नहीं..अब आम आदमी करे तो क्या करे ?
क्या करें से क्या मतलब....कोशिश तो करें कि आल सीजन बिक सकें..साग-सब्जियों की तरह...कल को मेरा कोई दोस्त पूछेगा कि तुम्हारे पापा की क्या कीमत है तो मैं क्या जवाब दूंगा ?
कह देना डालर के मुकाबले रूपया से भी कम.. मैं भन्ना गया- पूछेगा तो पहले उसके बाप की कीमत पूछना..
पापा ..आप तो नाराज हो गए..जैसा कि आप कहते हैं-सब बिकाऊ है तो किसी का भाव पूछने में क्या हर्ज है ? आप  अपनी कीमत नहीं आंक सके पर बाकी तो आंकते ही होंगे..
हाँ..बाकी बिकाऊ होंगे..मैं नहीं .मैं किसी भी कीमत में नहीं बिकूँगा.. मुझे ताव आ गया.
युवराज से कुछ ज्यादा....बीस करोड़ में भी नहीं ? बेटे ने कटाक्ष किया.
हाँ.. बीस करोड़ में भी नहीं... मुझे काला धंधा नहीं करना..मैच-फिक्शिंग जैसे घिनौने काम नहीं करने..मैं बिकाऊ नहीं ..समझे ?
तो ठीक है पापा..आप बाल ही काला करते रहिये..मैं मम्मी से बाकी पूछ लेता हूँ..
 अब बेटे को कैसे बताता कि उसके मम्मी की नजरो में मेरी कीमत फूटी कौड़ी भी नहीं..रोज-रोज लडती है कि हर महीने आफिस से वेतन के अतिरिक्त और कुछ क्यों  नहीं लाता..जैसे पड़ोस के लोग लाते हैं.. रोज सुनाती है कि पड़ोसियों का घर दिन प्रतिदिन भरता जा रहा है और हमारा घर किसी मरघट की तरह सूना का सूना ..यही सब सोच रहा था कि अचानक पूरबी आ गई...और बेटे ने आखिरकार उसे प्रश्न दाग ही दिया- मम्मी..पापा को अगर बेचें तो कितने में बिकेंगे ?
तुम्हारे पापा बिकाऊ नहीं बिट्टू..( बिकते वही हैं जो काम के होते है )..उन्हें कोई नहीं खरीद पायेगा..
 माँ-बेटे के संवाद को और सुन न सका,चुपचाप बाथरूम की ओर बढ़ गया. पूरबी ने इतना तो ठीक कहा कि मैं बिकाऊ नहीं.पर उसका आशय यह कतई न था.
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                                                 - प्रमोद यादव
                                              गयानगर, दुर्ग,छत्तीसगढ़
                                             मोबाईल-०९९९३०३९४७५  
  चलो दिलदार चलो... / प्रमोद यादव
 बचपन में जब कभी किसी रोबदार, मूंछदार थानेदार को देखता तो मन ही मन सोचता- बड़ा होकर थानेदार बनूँगा. तब के माँ-बाप बच्चों को आज की तरह इंजीनियर या डाक्टर बनाने की नहीं सोचते थे बल्कि थानेदार बनाने की मंशा रखते. इसके पीछे लाजिक थानेदार की कमाई कतई नहीं होता , केवल  पद का रौब ही ज्यादा काम करता. तब का थानेदार दो सौ रुपल्ली के वेतन में भी हजारों पर भारी पड़ता ( रौब के मामले में ) उन दिनों तो हवलदार का भी काफी जलवा हुआ करता..हमेशा वे हलुवे में होते...  
मन बड़ा ही चंचल होता है..और बचपन में तो कुछ ज्यादा ही...पल-पल में उछलता-कूदता बदलता रहता है..कभी शहर- सेठ के ठाटबाट देख भविष्य में मालदार बनने की इच्छा पनपती तो कभी स्कूल के किसी दिमागदार विद्यार्थी को पुरस्कार पाते देख जगदीशचंद्र बसु बनने को मन करता..कभी किसी फर्राटेदार दौड़ लगाते किसी खिलाड़ी को देख भाग मिल्खा भाग जैसा मन हो जाता.. तो कभी किसी लालबत्ती वाली गाड़ी में लदे मंत्री को देख सिर में टोपी पहनने को दिल करता..
बड़ी ही अजीब बात है कि बचपन में हर चीज कुछ जरुरत से ज्यादा बड़ी दिखती थी ..मसलन कि मेरे मोहल्ले में उन दिनों श्यामलाल गुप्ता की एक छोटीसी दूकान थी जो काफी बड़ी लगती..जरुरत की हर छोटी-बड़ी चीज मै वहीँ से खरीदता..पेन्सिल,कलम, कापी,रजिस्टर,बिस्कुट,चाकलेट,चना,बेर,मुरकू..आदि-आदि..दिन में कई-कई बार दौड़ लगाता..उसके लंचबॉक्सनुमा गल्ले को देख आँखे फटी की फटी रह जाती..मुंह तक सिक्कों से अटा होता..6x6 के बाथरूमनुमा दुकान में पसरा श्यामलाल हमेशा मुझे धन्ना सेठ लगता..और उसकी दूकान सुपर बाजार.. आज की तारीख में भी वही दुकान है.. वही श्यामलाल है. वही गल्ला है..पर सब कुछ गरीब-गरीब लगता है..उसके गल्ले में जितने सिक्के होते हैं,उससे ज्यादा तो सेक्टर नाईन मंदिर के बाहर बैठे भिखारी के आगे बिछे पंछे में होता है..खैर..विषय पर लौटता हूँ..बातें बचपन की हो रही थी..
 जैसे-जैसे बचपन बीतता गया..मर्ज बढ़ता गया..जिंदगी की हकीकतों के अनेक जादुई दरवाजे सिम-सिम कर खुलने लगे..तब मालुम हुआ कि कोई थानेदार,तहसीलदार,जागीरदार,तालुकदार या मालदार यूं ही नहीं बन जाता..उसके पीछे काफी मेहनत-मशक्कत , पढाई-लिखाई और घिसाई होती है..घर से रोज नसीहतें मिलती कि कोई भी दार (रसूखदार,दमदार,मालदार,इज्जतदार,थानेदार,जागीरदार,तहसीलदार) बनना हो तो सबसे पहले ईमानदार बनो..रास्ता जरुर कुछ अडचनों भरा , घुमावदार होगा  पर मलाईदार जाब पाना है तो एक तरह से इसे मस्ट समझो....अन्यथा जमादार,चौकीदार या झाड़ूदार बनना तो तय है ही....घरवाले अक्सर एक लाइन का एक मुहावरा ( ताना) सुनाते (मारते) –“ पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब,खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब आज की तारीख में सब उल्टा-पुल्टा हो गया है..खेलने-कूदने वाले भारत-रत्न झोंक रहे हैं और पढ़े-लिखे लोग भाड़..
पढने-लिखने से ख्याल आया कि पढ़ने-लिखने के दिनों में सबसे बोर काम होता है-पढना-लिखना..इस बात को लगभग सभी बच्चे स्वीकारेंगे.. केवल दो प्रतिशत बच्चे ही माँ की कोख से पाकेट-डिक्शनरी लिए पैदा होते है..पढातू होते हैं..बाकी सारे तो माँ-बाप की तुतारी के डर से ही पढ़ते हैं..पढ़ते क्या हैं,केवल छलते हैं..झूठ क्यूं बोलूं मैंने भी छला....घरवाले, नातेदार, रिश्तेदार सबने ख़बरदार किया कि पढ़-लिखकर इज्जतदार बनूँ..पर मार्क्स इतने बुरे थे कि सिवा बेइज्जती के कुछ न हुआ  ..तब वे मेरे अन्दर एक दुकानदार तलाशने लगे..तब ऐसा ही कायदा था..पढने-लिखने से चूके तो दुकानदार
बनना तय..दूकानदार से तात्पर्य ये नहीं कि मेन मार्केट में कांच के चमचमाते दुकान में बैठ टी.वी.-फ्रिज बेचे या किसी मल्टीस्टोरी माल में लिवाइस जींस या कूपन का काउंटर खोलकर बैठे ..तब दूकान का अर्थ केवल किराने की दूकान होता था..मेरे विषय में भी यही सोचा गया..पर थर्ड डिवीजन मेट्रिक करने के बाद मैंने कालेज पढने की जिद की तो दो-तीन सालो के लिए मेरा  किराना-मर्चेंट बनना रद्द हो गया..
कालेज पहुचते ही कलेजे को ठंडक मिली..एक हसीं और संगीन हादसे का शिकार हो गया..एक चाँद जैसे मुखड़े वाली लड़की को दिल दे दिलदार हो गया..वह अंतिम क्षनो तक ( ससुराल जाते तक ) मेरे प्रति वफादार रही और मैं उसके प्रति..आज के लैला-मजनुओं की तरह ना उसने मुझे कभी चीट किया ना मैंने उसे..अच्छा हुआ उस दौर में सेलफोन नहीं था नहीं तो हमें भी ( खासकर मुझे ) बेईमान बनने में समय नहीं लगता..आज के युग में लड़कियों के पास कई आप्शन होते हैं..थोडा सा भी आपसी  तकरार हुआ या आपने गुस्सा दिखाया  कि दूसरे दिन हीर किसी दूसरे रांझे के बाइक के पीछे मुंह लपेटे सरपट भागती दिखेगी..फिर ढूंढते रह जाओगे जैसी  स्थिति हो जाती है..हमारे जमाने में ऐसा नहीं था...रूठने-मनाने में ही सबसे बढ़िया टाईम-पास होता.. उन दिनों एक गाना भी काफी लोकप्रिय था - तुम रूठी रहो,मैं मनाता रहूँ कि इन अदाओं में और प्यार आता है हमारे दौर में किसी के पास कोई आप्शन नहीं होता था.. जीना यहाँ, मरना यहाँ जैसी स्थिति होती..एक का एक पर ही मर-मिटने का रिवाज था...हालाकि कहने की बातें हैं,मरता-मिटता कोई न था..उम्र होते ही लड़की ब्याह दी जाती..और कभी-कभी अफेयर के आम हो जाने से  कम उम्र में ही  ब्याह दी जाती..और दिलदार महोदय दोनों ही स्थितियों-परिस्थितियों में मैं कहीं कवि ना बन जाऊं तेरे प्यार में ऐ कविता कहते-कहते आगे का रास्ता( जो माता-पिता तय करते )नाप लेते..
चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो..गीत आने के चार साल पहले ही मेरी पारो पार हो गई थी..मतलब कि ससुराल चली गई थी..इसलिए चाँद के उस पार क्या है,नहीं जान सका ..अब तो खुद चाँद हो गया हूँ...वह भी दागदार..छह बच्चों का पिता जो बन गया  हूँ.. खैर..दिलदार के बाद चंद दिनों के लिए दुकानदार बना..फिर इसके चलते (दुकान के न चलते) कर्जदार भी बना..कईयों से उधार लिया फिर भी उद्धार न हुआ अलबत्ता बहुतों के लिए गद्दार बन गया . अच्छे-बुरे सभी दिनों में मेरा राजदार व सुख-दुःख का  हिस्सेदार रही मेरी अभागी , सीधी-सादी पत्नी हर पल मुझे जी-जान से धारदार बनाने की कोशिश की ,.पर होता वही है जो मंजूरे-खुदा होता है..समझदार होते हुए भी जिंदगी में कोई धमाकेदार काम न कर सका..सिवा छह बच्चे पैदा करने के....दमदार,असरदार बनने के चक्कर में दर-दर भटक तार-तार हुआ..
क्या ही अच्छा होता कि किसी सरदार के घर में पैदा होता..ना कोई थानेदार,मालदार,तहसीलदार बनने का चक्कर होता  ना ही दिलदार होने का कोई दर्द....सरदार तो जन्मजात रौबदार,पानीदार,वफादार,ईमानदार,इज्जतदार,जानदार,शानदार होते हैं..इन्हें कुछ बनने के लिए कुछ भी बिगाड़ना नहीं पड़ता,,मैंने तो कुछ  बनने के फेर में सब कुछ बिगाड़ डाला..जिंदगी को जायकेदार की जगह बदबूदार बना डाला..अब तो केवल उपरवाले के दीदार की तमन्ना है..और उससे विनती  है कि अगले जनम में किसी सरदार के घर पैदा कर मुझे आल इन वन बनाए...दिलदार वाला चेप्टर इसी जनम वाला रखे तो आभारी रहूँगा.. बड़ी सोणी लड़की थी वो....जानता हूँ , अगले जनम में भी वो चाँद के उस पार जाने के पहले ही पार हो जायेगी...फिर भी..कोशिश होगी  कि अगली बार उसके कानों में गुनगुना सकूँ- चलो दिलदार चलो ..चाँद के पार चलो.. तैयार होना न होना उसकी मर्जी.
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                                              -प्रमोद यादव
                                              दुर्ग, छत्तीसगढ़
                                         मोबाइल- 09993039475 

Monday, 23 September 2013





आतंक एक जासूसी कुत्ते का / प्रमोद यादव

पुलिस स्टेशन में उस दिन बहुत गहमा-गहमी थी किन्तु गहमा-गहमी के बीच भी एक ऐसा सन्नाटा पसरा था कि आलपिन के गिरने का स्वर भी साफ़ सुनाई दे जाए. पुलिस के आला अफसर स्टेशन के दफ्तर में मौजूद थे.हर कोई किसी ख़ास मसले को लेकर फिक्रमंद था. थाने में पुलिस कप्तान की मौजूदगी से वातावरण में जो शालीनता और नीरवता व्याप्त थी, वह अपूर्व थी इसलिए बहुत हद तक अस्वाभाविक लगती थी. अपराधियों को मारे-पीटे जाने और गाली-गलौज खाने से मानो उस दिन छुट्टी मिल गयी थी. हवलदार फ़ातमी और दरोगा असलम खां और सिपाही फूलचंद जिनकी आवाजों से रोज थाने में हो-हल्ला मचा रहता था, उस दिन भीगी बिल्ली की तरह साकित थे.
एक समाचार ने सारे प्रांत में खलबली मचा रखी थी. दस लाख रुपयों की एक सनसनीखेज चोरी, वह भी एक मंत्री के घर. जिस घटना ने सारे प्रान्त में खलबली मचा रखी थी,वह जिस शहर में घटी,उस शहर का अजब हाल था. हिन्दू और मुसलमान से लेकर इसाई तक, हलवाई और नाई से लेकर कसाई तक, हर किसी की जीभ पर बस एक यही चर्चा थी. न जाने वह शातिर और दिलेर चोर कहाँ का रहने वाला था ? उसने एक मंत्री के घर चोरी करने का दुस्साहस कैसे किया ? अपने इस खतरनाक मुहिम पर कामयाब होने के बाद सबूत के लिए एक तिनका भी पीछे नहीं छोड़ गया.
     इंस्पेक्टर जनरल आफ पुलिस का ख़ास आदेश था, इस चोर को बहुत जल्द गिरफ्तार किया जाय.
   मंत्री के घर चोरी का समाचार सुनकर देशव्यापी आतंक फ़ैल गया. मगर कुछ ऐसे लोग भी थे जो चूंकि मंत्री वर्ग से दुराव रखते हैं इसलिए यह सुनकर प्रसन्न हो गए. किसी ने कहा हराम की कमाई होगी साहब,हराम में गयी एक ने अपनी समझदारी का डंका पीटते हुए तर्क किया आखिर एक मंत्री के पास इतना धन आया कहाँ से ? इसकी जांच की जाय.
                  घटना पुलिस महकमें के लिए जबर्दस्त सरदर्द थी. कहते हैं- एक चुस्त और चालाक चोर हजार हजार पुलिस अफसरों को बदनाम कर देता है. यह कांड भी कुछ ऐसा ही लगता था अर्थात चोर महोदय ने सतर्कता से काम लिया था. उसके गिरफ्त में आने की कोई संभावना नहीं थी. तय था,अखबार और समाचार पुलिस विभाग की अकर्मण्यता का ढिंढोरा पीटते. हुआ भी ऐसा ही.
                                       कई दिन बीत गए...रहस्य , रहस्य ही बना रहा. पुलिस के छोटे-बड़े अफसर याने दोपाया लोग जब असफल हो गए तो इस मुहिम पर एक चौपाया को तैनात किया गया. वह एक अल्शेसियन कुत्ता था जो शक्ल-सूरत और डील-डौल से अमूमन इंसानों से भी अधिक आकर्षक और प्रभावशाली दिखलाई पड़ता था. अपनी नस्ल में वह शायद सबसे ज्यादा कद्दावर कुत्ता था. पूरे तीन फीट की उंचाई थी. उसके जिस्म के बाल आधा सफ़ेद आधा काले थे. न जाने किस फैक्टरी के बने साबुन का कमाले-फन था कि ये बाल सुकेशी युवतियों की अलकावलियों से भी अधिक कोमल और सुन्दर थे कि जिन्हें छूने से ईरानी गलीचे का स्पर्श का भ्रम होता था.
   उस कुत्ते का नाम किसी ने शरलक होम्ज रख दिया था.मगर चूँकि ऐसा करने से विदेश के एक नामी-गिरामी जासूस कि प्रतिष्ठा को आघात लगता था इसलिए इंस्पेक्टर जनरल के आदेश से यह नाम रद्द कर दिया गया था. वैसे वह कुत्ता बचपन से पुलिस विभाग में झब्बू के नाम से संबोधित किया जाता था और अब भी वह इसी नाम से पुकारा जाता था. बहुत ही विचित्र संयोग था कि सौभाग्य या दुर्भाग्य से मंत्री महोदय ( जिनके घर में चोरी हुई ) का नाम झब्बर लाल था और अपने आत्मीय लोगों के बीच वे भी इसी नाम याने झब्बू कहकर पुकारे जाते थे. सारे प्रांत में वे इसी नाम से प्रसिद्ध थे. पुलिस के छोटे-मोटे साधारण सिपाही काफी परेशान रहते थे जब उनके आला अफसर झब्बू के विषय में विवाद करते. बेचारे समझ नहीं पाते थे कि कुत्ते के विषय में बातचीत चल रही थी या मंत्री के विषय में. चोरी क्या हुई थी, पहाड़ टूट गया था पुलिस विभाग पर. बस, अब तो झब्बू ( मंत्री नहीं,कुत्ता ) से ही उन्हें उम्मीद थी.
   तथाकथित कुत्ते यानी झब्बू के गले में फौलाद की जबर्दस्त जंजीर थी जिसको थामें हुए पुलिस का दरोगा दिन-रात शहर के गली-कूंचों में भटकता फिरता था. कुत्ते के शारीर में अतुलित शक्ति और स्फूर्ति थी इसलिए कभी वह तेज चाल चलने लगता और कभी अकस्मात् घोड़े की तरह दौड़ने लगता. इस आपाधापी में उस दरोगा के लिए जंजीर सम्हालना मुश्किल हो जाता.उसका शरीर पसीने से लथपथ हो जाता. जिस किसी गली, सड़क या चौराहे पर वह कुत्ता पहुंचता, लोग भय से सहम जाते.उसकी निगाहें खूंखार थी. देखने वालों को ऐसा लगता था जैसे अब झपटा,तब झपटा. गलिओं में बच्चों का खेलकूद बंदप्राय हो गया था.
                 कुत्ते को अपने दायित्व का भान हो चुका था तथा वह अपने काम में चतुरता से लग चुका था.किन्तु आदमियों की तरह उसकी भी बुद्धि और कौशल उसका साथ नहीं दे रहा था. हर सुबह एक आस लेकर आती थी, हर शाम दिल डूब कर रह जाता था. कुत्ते की कमरतोड़ असफलता ने पुलिस विभाग को आइसक्रीम की तरह ठंडा कर दिया था. जंजीर सम्हाले निरुद्देश्य गलिओं और सड़कों में घूमने वाला पुलिस का वह दरोगा भी खीझ उठता था. कभी-कभी गली और एकांत देखकर उस कुत्ते के नाम गंदी गालियाँ फेंकता था. इस तरह आत्म संतोष कर अपनी दिन-दिनभर की थकान मिटा लेता था.
       उस शाम गलियां सूनी पड़ी थी. न जाने सारे लोग कहाँ मर गए थे. इन्हीं गलिओं में सदा की तरह एक कुत्ता,एक इंसान दोनों भटक रहे थे. कुत्ता अपनी नाकामियों से बौखलाया हुआ था. अपने गले पर बल दे-देकर वह उछल-कूद मछाये जा रहा था. मनो जंजीर छुडाकर भाग जाना चाहता हो. दरोगा ने उस दिन जरा पी राखी थी. कुत्ते का रवैया उसे नागवार गुजर रहा था.उसके नाम वह कई बार गंदी गालियाँ भेंट कर चुका था और अब उसका जी चाह रहा था, साले कुत्ते को लात पर लात मारे और हवालात में बंद कर दे. मगर ऐसा मुमकिन कैसे हो सकता ? क्योंकि वह तो एक असाधारण कुत्ता था, कुशाग्रबुद्धि का कि जिस पर पुलिस विभाग को गर्व था. चुनांचे दरोगा उसके साथ-साथ हांफता घिसटता चला जा रहा था कि अचानक एक झटका पड़ा और उसके हाथ से जंजीर छूट गयी. देखते ही देखते कुत्ता यह गया....वह गया...
         दरोगा के होश उड़ गए. वह वहशियों की तरह उधर ही लपका जिधर कुत्ता भागकर गम हो गया था. लगातार कई घंटे भटकने के बाद भी कुत्ते का अता-पता मालूम                     न हो सका. खबर आग की तरह चारों ओर फ़ैल गई. पुलिस के लिए एक नई मुसीबत व शर्म की बात थी. दो दिनों तक शहर का चप्पा-चप्पा छान मारा गया मगर न तो कुत्ता ही मिला न ही उसके कदमों के कोई निशान. एक अदद जासूसी कुत्ता और तैनात किया गया...कुत्ते ( झब्बू ) को खोजने के लिए.
                   इंस्पेक्टर जनरल का गुस्सा पूरे महकमें पर फाजिल हुआ.अब उस कुत्ते को ढूँढ निकालना पुलिस के हर मुलाजिम की जिम्मेदारी हो गयी. कई दिन बीत गए. एडी-चोटी का जोर लगाने पर भी कुत्ते का दर्शन देवी-देवताओं की तरह ही दुर्लभ बना रहा....और जब उसने दर्शन दिया तो उसकी अजीब ही दुर्गति की स्थिति थी. वह एक तंग बदबूदार गली की दो दीवारों के बीच निश्चेष्ट-सा पड़ा पाया गया. किसी ने उस पर जमकर थर्ड डिग्री का प्रयोग कर दिया था. उसके शरीर पर जगह-जगह खरोंच लगे थे. सिर पर एक स्थान से बहुत सारा रक्त बह निकला था. सूखे रक्त का निशान शरीर पर और आसपास जमीन पर भी स्पष्ट दिखलाई पड़ रहा था.
            कुत्ते को नियंत्रण में लाने के लिए जंजीर पकड़ने की कोशिश की गयी. न जाने क्या हुआ कि कोशिश करने वाले को कुत्ते ने हठात जोरों से भौंककर काट खाया. देखते ही देखते वहाँ भीड़ लग गई और भीड़ में खलबली भी मच गई. हर तरफ यह बात आम हो गई कि एक विदेशी नस्ल का कुत्ता जो वहाँ पहले भी पुलिस के साथ देखा जाता था, एक चोरी की तफ्तीश करते-करते पागल हो गया. हर सामने पड़ने वाले को वह काट खाता है.
स्थानीय समाचार-पत्रों ने, जो मंत्री महोदय से हर बात में विरोधी थे, अपने अखबारों के मुखपृष्ठ पर मोटे-मोटे अ क्ष रों  में समाचार दिया कि जासूसी करते-करते झब्बू पागल .. झब्बू ने काटना शुरू किया .. झब्बू पर पागलपन का भूत ...आदि...आदि. लोगों पर बड़ी विचित्र-विचित्र प्रतिक्रियाएं हुईं.
              कुत्ता अब भी बेकाबू ही था. यह देखकर पुलिस के उच्चाधिकारी चिंतित हो गए. इंस्पेक्टर जनरल को सूचना दी गई.परिणामस्वरूप कांस्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर जनरल तक पुलिस का पूरा स्टाफ शहर की गली-कूंचों में कुत्ते की तलाश में दर-ब-दर मारा फिरता नजर आने लगा. सबकी मंजिल एक थी,सबका मकसद एक था. जान-हानि की हिफाजत के लिए जल्द से जल्द कुत्ते पर काबू किया जाय...
न जाने कितने बच्चे-बूढे, जवाँ-मर्दों के शरीर में उस कुत्ते के पीने दांत गड चुके थे. जैसे कोई ज्वालामुखी फूट पड़ा हो, कोई जलजला आ गया हो. सारा शहर भयभीत और संत्रस्त था. वह बौखलाया हुआ कुत्ता नक्सलिस्ट लोगों से भी अधिक खतरनाक और आतंकवादी सिद्ध हो रहा था.
                     अंत में मंत्री महोदय को भी इस बात की सूचना दे दी गई. ऊपर से पुलिस को आदेश मिला, चोरी की जांच-पड़ताल बंद कर कुत्ते को अविलंब कैद करने के लिए चारों तरफ जवानों का जाल बिछा दिया जाए.
        ऐसी मोर्चाबंदी तथा सरगर्मियों के बावजूद वह उछलता कूदता खौफनाक कुत्ता काबू से बाहर ही बना रहा और पुलिस विभाग लाउड-स्पीकर पर ध्वनि प्रसारित करता रह गया- सावधान...होशियार...झब्बू से अपने को बचाएं...घर से बाहर ना निकलें.....कुत्ते को गिरफ्तार करने वाले को सरकार की तरफ से एक मैडल और दस हजार का नगद इनाम....
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                                               प्रमोद यादव
                                              दुर्ग, छत्तीसगढ़ 
                                         मोबाइल- 09993039475


नेता के आंसू/ प्रमोद यादव


श्री एक विख्यात नेता हैं और चूँकि विख्यात नेता हैं,उन्हें अक्सर रोना पड़ता है. कभी बाढ़ की विनाशलीला पर रोते हैं,कभी सूखे पर,कभी गरीबी पर तो कभी बेकारी पर,कभी भ्रष्टाचार पर तो कभी मंहगाई पर. देश की दुर्दशा का रोना तो उनके हर.   भाषण में होता है. उनका रोना जायज है इसलिए उनकी आंसुओं की बड़ी कीमत से इनकार नहीं किया जा सकता.
कहीं एक शेर पढ़ा था- गर अश्क बजा टपके,आंसू नहीं मोती है इस शेर के अनुसार श्री का हर आंसू एक मोती है और मोती को बर्बाद कर देना आदमी की फितरत में अभी शामिल नहीं हुआ. लिहाजा प्रबुद्ध कहलाने वाले चंद लोगों ( जिन्हें नेताजी ससम्मान जनता कहते हैं ) ने नेताजी के आंसुओं को संचित करने का उपाय किया. वे नहीं चाहते थे कि अश्कों के कीमती मोती धूल में बिखर जाएँ. अंततः उपाय निकल आया. नेताजी के आंसू शीशियों में इकट्ठे होने लगे और उनकी बड़ी-बड़ी कीमतें लगने लगी. लोग आंसुओं को खरीदते रहे और खरीद-खरीद कर मोतियों जैसी हिफाजत से रखते रहे.इतने बड़े नेता के आंसुओं की क़द्र करके जनता कृतार्थ होती रही. बड़े-बड़े ड्राईंगरूम में उनके आंसुओं का होना अनिवार्य-सा हो गया. उनके आंसुओं की शीशी रखकर लोग बिना कुछ बोले जता जाते थे कि लो देखो,हमें भी राष्ट्र और राष्ट्रवासियों के प्रति गहरी सहानुभूति है,तभी तो हमने अपने प्रिय नेता के आंसुओं तक को संभाल कर रखा है.
नेताजी के आंसुओं पर कवियों की बहुत सी कवितायें भी पत्र-पत्रिकाओं में छपी. कुछ उदाहरण निम्नांकित हैं-
शीशी भर आंसू शीर्षक से श्री काजुवाला ने लिखा-
शीशी भर आंसू-
मुझे रोज याद दिलाते हैं
कि देश यंत्रणाओं को
भोग रहा है
कि बेकारी और बढ़ रही है
या
बाढ़ अथवा सूखे से
हम मुक्त नहीं हुए
शीशी भर आंसू-
हाँ, शीशी भर आंसू ही हैं
जो मुझे प्रेरित करते हैं
और मैं देश के लिए ,
देशवासियों के लिए
आंसू बहा देता हूँ
( यह अलग बात है कि
कोई इकट्ठा नहीं करता
मेरे आंसुओं को )
दूसरी कविता है एक कवियित्री बेलारानी की,  शीशे में आग शीर्षक से, गौर करें-
शीशी में आंसू नहीं
आग है
ऐसी आग जो जला देगी
जुल्मो-सितम की
हर कहानी को
दर्द की निशानी को
शीशी में आंसू नहीं
आग है
         ऐसी अनगिनत कवितायें हैं. लेखों में भी श्री के आंसुओं की महत्ता का बखान किया गया. लेखों में लिखा गया कि ये श्री के आंसू नहीं वरन हिन्दुस्तान के आंसू हैं.इसके विपरीत कुछ साहित्यकारों को श्री के आंसुओं में स्टंट नजर आया और उन्होंने जहर उगला. इस सन्दर्भ में ये विद्रोह भरी कविता विशेष महत्त्व रखती है-
कविता का शीर्षक है- आंसुओं का भुलावा -
कविता इस प्रकार है
तुम हमें आंसुओं से मत बहलाओ
मत बार-बार रोकर
आंसुओं को बदनाम बनाओ
क्यों माने या समझें
कि तुम्हारे आंसुओं  की  
कीमत या लागत है
अरे, रोना तो तुम्हारी हाबी
तुम्हारी आदत है
श्री की दृष्टि में जब ये विद्रोही कवितायें आई तो उन्होंने एक सभा का आयोजन करवा डाला और कवियों के रुख पर आंसू बहाना शुरू किया.श्रद्धालु जनता अपने प्रिय नेता के आंसुओं से द्रवित हुई और उनके भी नयनों के कोर गीले हुए.उस दिन नेताजी के नयनों ने पूरे दो सौ पचास ग्राम आंसुओं की बरसात की.
      एक दिन नेताजी के किसी हितैषी ने जाने कैसे सोचा कि नेताजी के आंसुओं का महत्त्व और अधिक बढ़ सकता है यदि आंसुओं की शीशी पर उनके बहाने की तारीख और बहाने का कारण लिख दिया जाय. यह सुझाव सभी को बेहद पसंद आया. यह सुझाव   अमल में लाया गया और शीशियों पर लिखा जाने लगा- फलां तारीख को फलां जगह की बाढ़ पर बहाए गए श्री के आंसू या फलां प्रांत के सूखे पर बहाए गए श्री के आंसू...
      एक दिन मेरी बड़ी इच्छा हुई कि श्री से मिलूं. बड़ी कोशिशों के बाद उनके कमरे में पहुँच पाया. वे टेलीफोन पर किसी से बात कर रहे थे. वे जोर-जोर से देश की दुर्दशा का जिक्र कर रहे थे मगर आँखें उनकी बिलकुल सूखी थी. मैंने उनसे पूछा-    ताज्जुब है कि आप रो नहीं रहे हैं जबकि बात देश की दुर्दशा की कर रहे
हम घर पर नहीं रोते...पब्लिक की अमानत पब्लिक के सामने ही पेश करना चाहिए.. उन्होंने कहा और व्हिस्की की बोतल खोलने लगे. मेरी आस्था पर व्हिस्की की बोतल बिजली बनकर गिरी और यह शायद उन्होंने महसूस कर लिया, बोले- इसके पीने के   बाद आंसू बहाने में आसानी होती है. सुनकर मन का काँटा निकल गया.
      कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने अगला प्रश्न किया- आपके आंसुओं को कैसे इकठ्ठा किया जाता है ? उत्तर में उन्होंने अपने कुरते की जेब से एक खादी का   रुमाल निकाला और इशारा करते हुए बोले- इस रुमाल के द्वारा आंसू इकट्ठे होते है
सो कैसे ? मैं हैरान हुआ.
बहुत सीधा तरीका है वे बोले- मैं भाषण के दौरान इस रुमाल से अपने आंसुओं को पोंछता हूँ. भाषण के बाद आंसुओं से गीले रुमाल को निचोड़कर शीशियों में भर लिया जाता है....और कुछ पूछना है...
मैं एक क्षण अभिभूत- सा उन्हें देखता रहा फिर बोला- सिर्फ एक बात और पूछनी है  आपसे, आपके मन में आंसुओं का यह सागर आता कहाँ से है ? उत्तर में उनका कहकहा गूंज उठा. मैं उनके कहकहे को उनका उत्तर मान उठ आया.
     फिर एक दिन अखबारों में एक चौका देनेवाली खबर छपी कि नगर में धड़ल्ले से नेताजी के नकली आंसू असली दामों में बेचे जा रहे हैं. इस समाचार से भूचाल- सा आ गया. श्रद्धालु जनता की आस्था पर यह करारी चोट थी. लोगों ने सरकार को चेतावनी दी कि नकली आंसुओं के विक्रेताओं को तुरंत गिरफ्तार करें और कड़ी से कड़ी सजा दें. सरकार सक्रिय हुई मगर नतीजा शून्य रहा. लोगों की उत्तेजना बढती गयी. सरकार ने    एक पांच सदस्यीय आयोग की स्थापना की और इस मामले की तफ्शीश शुरू हुई. आयोग ने सबसे पहले चंद गवाहों की मौजूदगी में नेताजी के असली आंसुओं को इकठ्ठा किया फिर ऐसी सौ शीशियाँ इकट्ठी की जिनके नकली होने का संदेह था. ये सौ शीशियाँ और असली के नमूने लेबोरेटरी टेस्ट को भेज दिए गए. वैज्ञानिक गण इन आंसुओं पर परी क्षण करते रहे और लोगों की उत्तेजना नए-नए रंग लाती रही. श्री इस बीच सभाओं में इस काण्ड पर आंसू बहाते रहे और लोग उनके आंसुओं को बड़ी सावधानी से इकठ्ठा करते रहे.
              अंततः लेबोरेटरी टेस्ट का परिणाम सामने आया.आयोग में रिपोर्ट पढ़ी गयी.लिखा था कि हमें भेजी गई सौ शीशियों में से पैंतीस शीशियाँ नकली आंसुओं की थी और बाकी असली आंसुओं से भरी थी. किन्तु परी क्षण के दौरान एक विचित्र तथ्य उपस्थित हुआ है कि नेताजी के असली आंसुओं में इंसानी आंसुओं का कोई तत्व या गुण नहीं है. इस सन्दर्भ में आगे परी क्षण जारी है.
                                       अब आयोग के सामने नई उलझन आ गई. वे नहीं चाहते थे कि उत्तेजित लोगों को यह नई जानकारी मिले मगर बात अंततः लीक हो गई और लोगों में तरह-तरह की चर्चा  होने लगी.नेताजी ने सभाओं में जाना छोड़ दिया और अनशन पर बैठ गए कि अब लेबोरेटरी टेस्ट का यह लफड़ा बंद करो...क्या फायदा जब लेबोरेटरी टेस्ट इंसानी आंसुओं को न पहचान सके. स्थिति और उलझ गई.
         इसी बीच एक दिन मैं अकेले ही चिड़ियाघर गया -घुमने के उद्देश्य से. मैं एक कोने में बैठा था कि दो सज्जन बगल में बैठे बतिया रहे थे.एक कह रहा था- लेबोरेटरी टेस्ट ने रिपोर्ट दी है कि नेताजी के आंसुओं में इंसानी आंसुओं जैसी कोई बात नहीं....ठीक भी तो है, भगवान के आंसुओं में इंसानी आंसुओं के तत्व कैसे मिल सकते हैं ? नेताजी तो अवतार हैं अवतार....
बिलकुल यही बात है... दुसरे ने अपनी श्रद्धा प्रकट की और फिर वे उठकर आगे बढ़ गए.
   तभी मुझे एक अजीब- सा कहकहा सुनाई पड़ा.मैंने इधर-उधर देखा तो पाया कि चिड़ियाघर के टैंक में पल रहा मगरमच्छ कहकहा लगा रहा है.मैंने उससे कडाई से पूछा ऐ..इस तरह कहकहा क्यों लगा रहे हो ? जवाब में उसने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोकते हुए कहा- हंसी आती है..इंसान की अक्ल पर....लोग समझते हैं कि नेताजी के आंसुओं में इंसानी आंसुओं जैसी कोई बात नहीं, सो वे भगवान के आंसू हैं..मगर वे मूरख क्या जाने कि जिसे वे भगवान के आंसू समझ रहे हैं, वे न नेता के आंसू है ,न   भगवान के बल्कि मेरे आंसू हैं...मेरे यानी मगरमच्छ के आंसू. वह नेता मुझसे ही तो आंसू ले जाकर आज तक बहाता रहा है. यकीन न हो तो पूछ लो उस नेता से.
   इससे पहले कि मैं मगरमच्छ से कुछ कहता एकाएक वे नेताजी वहां पहुँच गए. वे अकेले थे. उनके हाथ में टिफिन का डिब्बा था टिफिन खोलकर उन्होंने मांस का एक टुकड़ा मगरमच्छ की ओर उछाल दिया. मगरमच्छ ने मांस झपट लिया मगर दूसरे  ही क्षण वह पलटी खा गया. मांस में शायद तेज जहर था.मैंने नफ़रत से नेताजी की ओर देखा. वे बोले- मैंने इसकी सारी  बातें सुन ली थी इसलिए इसे ख़त्म करना पड़ा...इस स्थिति के लिए मैं हमेशा तैयार रहता था...अतः हमेशा इसकी मौत का सामान अपनी जेब में रखता था..आज जेब का बोझ हल्का हुआ... सुनकर मेरी इच्छा हुई कि गला दबा दूँ इस आदमी का मगर अपने क्रोध को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए कहा- नेताजी, अब आयोग को मैं बताऊंगा कि वे नेताजी के आंसुओं को किसी मगरमच्छ के आंसुओं से मिलाकर देखें...समझ गए आप ? मेरे क्रोध को देखते हुए अचानक वे मोम हो गए. मेरे पैरों पर गिरते हुए बोले- मुझे बचा लो...मैं बाल-बच्चों वाला आदमी हूँ..मेरी नहीं तो मेरे इन आंसुओं की क़द्र करो....
इन आंसुओं की ? मैं चीखा- ये तो मगरमच्छ के आंसू हैं..
नहीं...नहीं... वह गिडगिडाने लगा- कोई भी कसम ले लो ...ये मेरे अपने आंसू हैं...बिलकुल अपने...चाहो तो लेबोरेटरी टेस्ट करवा लो....चाहो तो...
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                                                          प्रमोद यादव
                                                  दुर्ग, छत्तीसगढ़,
                                              मोबाइल-09993039475  



                                            
हमारे जमाने में.../ प्रमोद यादव




.गुप्ताजी की बातों से मैं कभी असहमत नहीं होता. मेरे बचपन के मित्र हैं. हम साथ-साथ पले-बढे और जवान हुए.उन्होंने भी वही ज़माना देखा है जो मैंने देखा. हम दोनों की विचार धारा, दिलो-दिमाग, जीवन-अनुभव और रहन-सहन भी लगभग एक से रहे. और तो और हम दोनों रिटायर भी एक ही दिन हुए. कहीं कुछ अलग-थलग सा कुछ था तो वो थी हमारी पत्नियां. जहां मेरी पत्नी जरुरत से ज्यादा वाचाल( लगभग भूचाल )थी, वहीँ उनकी पत्नी एकदम गूंगी - पुराने मूक फिल्मों की तरह. कोई उनसे पांच लाईन बोले तो जवाब में वह कामा की तरह एकाध शब्द ही हौले से फेंकती वह भी बड़ी             मुश्किल से. कई बार गुप्ताजी से पूछा कि कैसे निभाते हो साइलेंट मूवी  के साथ ?  मेरी पत्नी तो बिना किसी बात के इतना बोलती है कि कभी-कभी बोलते-बोलते भूल जाती है कि क्या बोल रही है. मुझसे फिर पूछती है- मैं क्या बोल रही थी ? तब मैं कह देता हूँ- गुड नाईट बोल रही थी और चुपचाप सो जाता हूँ. गुप्ताजी ने अपनी पत्नी के विषय में बताया कि बनिया की बेटी ठहरी , हर काम बचपन से नाप-तौल कर करती रही..इसलिए शादी के बाद भी वैसी ही रही पर अब चढ़ती उम्र के साथ नाप-तौल में गड़बड़ा गयी है, सुधर गयी है...नाना पाटेकर की तरह बिना विराम,अल्प विराम के धारावाहिक बोल लेती है.
           पहले की तरह अब गुप्ताजी के घर आना-जाना नहीं होता. बस, हर रोज शाम के वक्त टहलने के नाम पर शहर से तीन-चार किलोमीटर बाहर सुनसान पगडंडियों में चलते-चलते एक शिव मंदिर के आँगन में धंसे सीमेंट के बेंच पर धंसकर पुरानी यादों को कुरेदते टाईम पास करते हैं. रिटायरमेंट के आगे कुछ भी तो नहीं होता जिस पर बहस, विवाद.या कुछ प्लान करें रिटायरमेंट जिंदगी का वह मुकाम है जहाँ आदमी की जिंदगी पर जो होना था,सो हो गया टाइप एक पूर्ण  विराम लग जाता है...अपवाद ही होंगे जो रिटायरमेंट के बाद भी अपनी निजी जिंदगी को रिचार्ज करने का माद्दा रखते हों. इसलिए अधिकांश लोग निजी जिंदगी के सुख को पुनः भोगने परदे के पीछे ( अतीत में ) चले जाते हैं..अतीत को कुरेदते हैं...हम दोनों ने तो कुरेद-कुरेद कर परदे ही फाड़ दिए हैं..एक दिन भी ऐसा नहीं बीतता कि पुराने दिनों को याद न करते हो. 
           अब कल ही की तो बात है- गुप्ताजी ने वाजिब बात कही कि हमारे अतीत में इतनी सारी , इतनी प्यारी-प्यारी और हैरत अंगेज यादें है कि आदि-अंत का कोई ओर-छोर नहीं.. क्या भूलूं,क्या याद रखूं वाली स्थिति है...जितना कुरेदो-उतना ही सुख..उतनी ही ताजगी....भगवान् जाने आज के छोकरों का पचास साल बाद क्या कुछ अतीत होगा ? अतीत होगा भी या नहीं ? आज के जमाने में कुछ भी तो ऐसा नहीं जिसे कोई अपनी यादों में संजो कर रखे. गैंगरेप, घोटाला, आतंक,लूट-खसोट यही सब तो है रोजमर्रा की बातें जो आदमी की जिंदगी में डी.एन.ए.की तरह व्याप्त हो गया है..नेट, इंटरनेट, मेल-ई-मेल, एस.एम्.एस.,एम्.एम्.एस.ही इस जमाने का सत्व है जो मिनटों में डिलीट भी हो जाता है..भला यह किसी के अतीत का मीठा हिस्सा कैसे और  किस मुंह. बने ? जो खुद क्ष णभंगुर हो ,वह भला अतीत के एल्बम में कैसे टिके.. कैसे यादगार बने ? गुप्ताजी बड़े चिंतित थे कि आज की पीढ़ी के बच्चों का (पचास साल बाद) अतीत किस कदर अंधकारमय होगा..वे क्या कुछ याद करेंगे ? रिटायरमेंट के बाद कैसे समय पास करेंगे ?
तब मैंने उन्हें ढाढस बंधाते कहा था-- नाहक ही इस बात के लिए परेशान न हों...उनके अतीत से हमें क्या लेना-देना ?..अपनी देखो....
हाँ यार, ठीक कहते हो..हम उनके अतीत की क्यों सोचें..  गुप्ताजी गमगीन हो एकदम से ट्रेक बदल दूसरी बात पर आ गए, बोले- यार..क्या ज़माना आ गया है..बच्चे इतने डीठ हो गए हैं कि आश्चर्यचकित रह जाता हूँ..हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं था...
क्या हुआ ? मैंने पूछा.
अरे, वो जो सोनीजी है ना हमारे पडोसी...वह अपने लड़के से बहुत परेशान हैं..बाप की कुछ सुनता ही नहीं..न लिखता है, न पढता है,न कमाता है...ऊपर से बाप से जुबान लड़ाता है...बेचारा समझाते- समझाते थक गया..वह उसे घर से भाग जाने को कहता है पर सुपुत्र है कि खूँटा गाड़े बैठा है क्यों भागूँगा ? जैसी आँखे ततेरता है..सुबह-शाम बेशर्मी से खाता-पीता और घूमता है...बहुत त्रस्त हैं सोनीजी...हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं था... गुप्ताजी उदास हो गए.
हाँ गुप्ताजी... मैंने एक ठंडी आह छोड़ते जवाब दिया- हमारे जमाने में तो बच्चों के बम्बई भाग जाने का फैशन था..जहाँ बच्चे मेट्रिक पहुंचे, और कहीं फेल हुए तो सीधे बम्बई भाग जाते...कभी पिता के पीटने से पलायन कर जाते तो कभी मम्मी की खरी-   खोटी सुन भाग जाते.. पूरे देश में भगोड़े बच्चों की शरण स्थली थी- बम्बई...कोई कभी भूले से भी भागकर मथुरा- काशी या झुमरीतलैया  नहीं जाता  ...हर भगोड़े को लगता कि बम्बई उसके लिए बाँहें पसारे खड़ा है..सबको लगता कि कहीं और मिले न मिले, बम्बई में उसे जरुर काम मिल जाएगा.. ( और वो भी फ़िल्मी-दुनिया में ) वैसे अधिकाँश भागने वाले बच्चे हीरो बनने की आस में ही  बम्बई भागते...सूरत-शक्ल से भले ही केष्टो या मुकरी दिखें लेकिन सब अपने को दिलीप कुमार या देवानंद से कम न आंकते...
ठीक कहते हो यार.. गुप्ताजी ने हामी भरते कहा- तब न सेलफोन का दौर था न ई मेल-फिमेल का..भागने वालों  का कोई पता-ठिकाना भी नहीं होता कि टेलीग्राम कर घर  बुला लें...तब मोहल्ले के लोग दुःख जताने मातमपुर्सी की शक्ल में आते..  घरवाले भी मुंह लटकाए दुखी होने का उपक्रम करते.. तेजी से फिर यह पूरे शहर में चर्चा का विषय हो जाता कि अमुक लाल का लाल चला मुरारी हीरो बनने की तर्ज पर हीरो बनने    बम्बई भाग गया..उस दौर के माता-पिता को पूरा भरोसा होता कि उसका लाडला चार-पांच दिनों में ( पैसा ख़त्म होते ही ) जरुर वापस आ जाएगा...और ऐसा होता भी था...दुनिया में विश्वास से बढ़कर और कोई चीज नहीं...जो बच्चे घर से पैसे लेकर भागते,वे पैसे समाप्त होने के पहले ही प्यार से,पोस्ट-कार्ड से  सूचित कर देते कि चौपाटी में चित पड़े हैं...जल्दी आकर ले जाएँ...जो बच्चे गरीबी में ( बिना टिकिट के ) भागते, उसे उस समय के शरीफ टी.टी.ई.समझा-बुझाके ट्रेन से किसी नजदीक के स्टेशन में उतार देते जहाँ किसी नजदीकी रिश्तेदार ( फूफा,मामा ) के पास तीन-चार दिन गुजार थ्रू प्रापर चेनल वापस घर लौट आते.. कुल मिलाकर वापस सभी आते..
हाँ यार...आजकल के बच्चे तो भागते ही नहीं.. मैंने हामी भरी- पिछले दो-तीन दशकों से यह फैशन ही समाप्त हो गया...तीन-तीन बार फेल होने पर भी नहीं भागते....और तो और भगाओ तब भी नहीं भागते..आज के बच्चों में कितनी उद्दंडता घर कर गई है... हमारे ज़माने में ऐसा नहीं था..शरमो-हया के परदे में होते थे बच्चे..फेल हुए कि किसी को चेहरा दिखाना भी गवारा नहीं करते.. .परदे में रहने दो,परदा न उठाओ के अंदाज में सीधे  बम्बई भाग जाते.... वापस लौटने पर उनका वीरोचित  सम्मान होता  जैसे कारगिल युद्ध जीतकर लौटा हो...घर में एक खुशनुमा माहौल पसर जाता..घर के सभी सदस्य उससे बड़े अदब से ऐसे पेश आते जैसे कुछ हुआ ही न हो....उसकी हरेक फरमाईशों को दौड़-दौड़ पूरा करते....रुपया-पैसा, खाना-पीना घूमना-फिरना  सब टैक्स-फ्री हो जाता ..स्कूल के दोस्तों पर भी भारी रॉब पड़ता.. बम्बई रिटर्न होने का...दोस्त-यार महीनों तक पूछते रहते- क्या देखा बम्बई में? तब वह सीना फूला शान से बम्बई के किस्से सुनाता... हीरो-हिरोईनों के किस्से..शूटिंग के किस्से...थोड़े सच्चे,अधिकतर झूठे और दोस्त उसकी किस्मत पर अश-अश और  वाह-वाह करते..        
   अब तो केवल आह-आह है यार.. गुप्ताजी बोले- देखो न..सोनीजी कैसे परेशान हैं..मुंडा घर से भागता ही नहीं इसलिए दुखी और हैरान है...उन्हें कौन  समझाए कि ज़माना बदल गया है...बम्बई अब मुंबई हो गया है..ठसाठस आबादी वाला दमघोंटू  महानगर...अब तो मुंबई के बाशिंदे ही सांस लेने बाहर भाग रहे हैं....कोई बिहार, आसाम की ओर.तो कोई यू.पी. की ऑर..ऐसे में कोई लड़का भला क्यों भागे मुंबई ? .  
एक काम करो यार... मैंने गुप्ताजी को मशवरा दिया- सोनीजी को बताओ ..आज के युग में केवल होशियार बच्चे ही भागते हैं...वो भी बेंगलोर,पूना,दिल्ली की ओर...मुंबई तो अब  गधे भी नहीं भागते....उन्हें कहो वे खुद केदारनाथ  या  बद्रीधाम भाग जाएँ...तभी समस्या का समाधान संभव है...
ठीक कहा यार..अभी जाकर उनकी टिकिट कटाता हूँ.. और गुप्ताजी उठकर चलते बने.     मैं फिर अपने जमाने के जंगल में खो गया...सचमुच क्या ज़माना था....एक बात का मलाल तो आज भी है कि चाहकर भी मैं कभी बम्बई न भाग सका....पुरुषों के भाग्य का क्या भरोसा? हो सकता है आज वहां होता तो के.बी.सी. में अमिताभ की जगह मैं    होता...या हो सकता है कि दबंग का चुलबुल पांडे मैं होता.. खैर...जो हुआ..अच्छा हुआ.. व्यस्तता भरी जिन्दगी न मुझे तब पसंद थी..न अब... किसी ने कहा है न- आराम बड़ी चीज है..तो चलिए..आराम किया जाए..जय राम जी की.. 
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                                                   प्रमोद यादव
                                                  दुर्ग, छत्तीसगढ़,
                                              मोबाइल-09993039475  
                                           




थानेदार से इंटरव्यू / प्रमोद यादव



सबसे पहले बताएं कि आप थानेदार कैसे बने ?
जैसे सब बनते हैं...ले-देकर.. थानेदार ने जवाब दिया.
मेरा मतलब यह नहीं था...मैं जानना चाहूँगा कि पुलिस में भर्ती  होने का मन कैसे बना ? क्या परिवार में पहले भी कोई पुलिसवाला था ?
नहीं जी, हम सब सुखी थे...कोई न था...वो तो मेरी किस्मत कुछ खराब थी कि चोरों की वजह से पुलिस बना
वो कैसे ?
मैंने तो कभी सोचा तक न था कि पुलिस महकमे में कदम रखूँगा लेकिन दो-तीन हादसे ऐसे हुए कि पुलिस में भर्ती होने का मन बना लिया.
क्या हादसा हुआ था ?
घर से एक बार बकरी चोरी हो गई..बाप ने मेरी पिटाई कर दी कि तेरे होते यह कैसे हुआ. मैं जैसे मैं न हुआ बकरी का बाडीगाड हो गया..उन्हें शक था कि कही मैने तो नहीं बेच दी...चोरी किसी और ने की पर इल्जाम मुझ पर लगा....खैर, बात आई-गई हो गई..धीरे- धीरे वो किस्सा मैं भूल गया और घरवाले भी भूल गये.
आपने कहा कि चोरों की वजह से पुलिस बने
हाँ...ठीक ही कहा..उस घटना के बाद एक घटना और घटी...स्कूल से मेरी सायकल चोरी चली गई...इस बार भी पिटाई हुई पर बेचने का इल्जाम नहीं लगा...पिताजी ने चोरी की रपट लिखा दी पर बरसों तक नहीं मिली...मैंने महकमा ज्वाइन किया तब सायकल मिली.
वेरी गुड...आपकी सायकल काफी मजबूत रही होगी जो अब तक चल रही थी...कैसे मिली सायकल ?
इसकी एक कहानी है... थानेदार बनते ही मैंने शहर भर के तमाम पेशेवर चोरों की एक मीटिंग काल की...और कहा कि दस साल पहले स्कूल से मेरी एक हीरो सायकल चोरी हुई थी..बस इतना भर कहना था कि सारे चोर फुर्र हो गये...दूसरे दिन सुबह देखा कि थाने में लाइन से इक्कीस हीरो सायकल खड़ी थी..मैंने ईमानदारी से उसमे से एक उठा ली जिसकी शक्ल मेरे बिछुडे सायकल से मिलती-जुलती थी...बाकी सायकल स्टाफ में बाँट दी.
सर जी, आप तो कहते हैं कि चोरों के कारण इस विभाग में आये...इनसे ही आपको प्रेरणा मिली पुलिस बनने की.
हाँ..प्रेरणास्रोत तो वही चोर थे जो दो बार गच्चा देकर बकरी और सायकल ले गये और मार मुझे खानी पड़ी थी...तभी मैंने प्रण किया कि एक दिन पुलिस बनूँगा...चोरों को पकडूँगा ताकि मेरी तरह कोई और बालक बेवजह अपने बाप की पिटाई का शिकार न हो पर..... पर....
पर क्या सर ?
पर यार..पुलिस ज्वाइन करते ही मेरे ज्ञान-चक्षू खुल गये...जल्द ही जान गया कि चोर अपनी जगह है और पुलिस अपनी जगह...एक ही ट्रेक पर दोनों दौडेंगे तो चोर ही हमेशा आगे होगा और सिपाही पीछे.. पकड़ने वाला तो सर्वदा पीछे ही होता है.....कभी किसी चोर को पकड़ भी लिया तो सामान पकड़ नहीं पाते...कभी सामान पकड़ लेते हैं तो खिसियानी बिल्ली की तरह चोर ढूंढते हैं
मैंने टोका आपने सायकल बरामद कर ली तो खोई बकरी भी बटोर लिये होंगे..
आपने कैसे जाना ?...इसकी भी एक कहानी है...बकरी की मे-मे हमेशा कानो में गूंजती रहती थी, ठीक उसी तरह जिस तरह जंजीर पिक्चर में हमेशा अमिताभ बच्चन के दिमाग में घोडा दौड़ता था...एक बार एक क़त्ल के सिलसिले एक गांव गया तो जिस घर में क़त्ल हुआ था वहाँ आठ-दस बकरियाँ चरती-फुदकती दिखी..मैंने सबको गिरफ्तार कर लिया और गांववालों को छोड़ दिया...मेरी दरियादिली से वे बहुत खुश हुए..और मैं बकरी पाकर गद-गद हुआ...
चोरों के कारण आप पुलिस बने तो निश्चित ही इनके प्रति काफी श्रद्धा होगी.
हाँ भाई...ठीक कहते हो... इन पर कोई कार्रवाई करने का मन नहीं करता...लेकिन केवल बेसिक-डी.ए. से तो घर चलने से रहा...ये ना हो तो भूखे ही मर जाएँ..
शहर में गुंडागर्दी, उठाईगिरी, सट्टेबाजी, छेड़खानी, शराबखोरी, लूट, पाकिटमारी, क़त्ल आदि का ग्राफ कैसा है ?
पुलिस के होते (गुंडई के चलते ) किसी की मजाल है जो यह काम करे ? काफी अमन-चैन है शहर में.. साल में एकाध-दो क़त्ल हो जाता है...अपराधी हम पहले से तय कर रखते हैं...पकड़ते हैं और कोर्ट को सौंप देते हैं..अब कोर्ट का काम है कि फैसला करे कि खून उसी ने किया है या किसी और ने..हमारा काम केवल पकड़ना है..चाहे बुधारू को पकडे या समारू को..
शहर के तमाम चोर-उच्चक्कों, गुंडे-मवालियों को कोई सन्देश देना चाहेंगे ?
हाँ...यही कहना चाहूँगा कि हर काम सावधानी और शालीनता से करें...और अच्छे समय पर करे..जनता के साथ प्यार और नम्रता से पेश आये. .वैसे पुलिस महकमे को इसकी ज्यादा दरकार है..
पुलिस और जनता के बीच मधुर सम्बन्ध बनाने कि बात हमेशा चलती है पर लाख कोशिशों के बाद भी बनते नहीं...इस पर आप क्या कहेंगे ?
जनता-जनार्दन से अच्छे सम्बन्ध बनेंगे तो इनसे बिगड जायेंगे...इनसे बिगाड़ करके हमें भीख थोडे ही माँगना है...वैसे जनता समझदार है...जानती है कि पुलिस की ना दोस्ती अच्छी है ना ही दुश्मनी...
ठीक है थानेदारजी..इंटरव्यू के लिये धन्यवाद..
चलते-चलते हम भी एक बात कहें. थानेदार बड़ी शालीनता से गुर्राया.
हाँ-हाँ...कहिये...क्या बात है ? मैंने कहा.
हमें भी कभी सेवा का अवसर दें...आपकी कोई चीज कभी खोई हो तो बताएँ..खड़े-खड़े बरामद करवा देंगे...इस फील्ड मे हमारी मास्टरी है..
 एक पल के लिये सोचा कि कह दूँ बीस साल पहले मेरी प्रेमिका खो गई, वो दिला दे लेकिन इक्कीस तोपों की सलामी जैसे इक्कीस हीरो सायकल की याद आई तो डर गया. सचमुच कहीं थानेदार बीस-इक्कीस प्रेमिका खड़ी कर दे तो...?
मैं मुस्कराकर थैंक ही बोल पाया.

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                                               प्रमोद यादव
                                              दुर्ग, छत्तीसगढ़
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