Thursday, 1 August 2013



1 अगस्त 2013
प्रमोद यादव का व्यंग्य : मेरा पुतला दहन
मेरा पुतला-दहन/ प्रमोद यादव

जब-जब देश, राज्य या शहर-कस्बे में कोई बड़ा घोटाला होता है, भ्रष्टाचार होता है या कोई बड़ा नेता कोई बड़ा ही बेतुका बयान बकता है तब पुतला-दहनका पावन पर्व शुरू हो जाता है और फिर सियासत गरमा जाती है. देश स्तर पर होता है तो यह कार्यक्रम बिजली की गति से शहर-दर-शहर सफ़र करता है(टी.वी न्यूज .के माध्यम से ) और कसबे या शहर स्तर का होता है तो राज्य के किसी मंत्री-संत्री या मुख्य- मंत्री का पुतला फूंक अपनी अंतरात्मा को शांत कर लेते हैं. पुतला-दहन से हमेशा की तरह होता कुछ नहीं...ना सरकार कभी इससे जलती ( गिरती ) है ना ही कोई मंत्री-संत्री मरता या इस्तीफा देता है. ,ना ही फूंकने वाले किसी पुण्य के भागीदार बन स्वर्गीयस्थिति को प्राप्त होते हैं बल्कि अगले चुनाव के बाद पासा पलट जाता है और पुतले फूंकने वाले खुद पुतलों की शक्ल में फूंके जाते हैं. बरसों से यह दौर-दौरा चला आ रहा है और गाय की तरह सीधी जनता (आम आदमी ) इस प्रायोजित कार्यक्रम को टी.वी. सीरियल ये रिश्ता क्या कहता हैके मानिंद तन्मयता से देखने मजबूर है.. सब .अपना टाईम पास कर रहे हैं.. आज पूरा देश ऐसे ही दृश्यों में फ्रिजहो गया है.
पुतला-दहन के इतिहास के विषय में केवल इतनी जानकारी है कि बचपन में पहली बार दशहरे के दिन रावण के पुतले को दहकते देखा...तब इसे एक पर्व की भांति ही जाना .इस पर्व के मर्म से मैं सर्वथा अनभिज्ञ था.पर साल-दर साल यही सब देखते-देखते समझदार होते गया तो पुतले के मर्म को समझता गया .. राम -रावण की कहानी से भिज्ञ हुआ.. जाना कि एक छोटी सी चिंगारी आग का दरिया कैसे बनती है..भाई लखन ने रावण की बहन शूर्पनखा की नाक काट दी तो नौबत यहाँ तक पहुंची कि लंका-दहन हो गया और रावण रिवेन्ज लेने के मूड में बेवकूफी पर बेवकूफी और अन्याय पर अन्याय करता गया पर रामजी के न्याय के आगे टिक ना सका और देवों के देव महादेव के अनन्य भक्त रावण फिसड्डी साबित हो भस्म हो गया . मोराल ऑफ़ द स्टोरी ये है कि न्याय ,अन्याय पर भारी पड़ता है ,सच का बोलबाला , झूठे का मुंह काला होता है, अच्छाई की बुराई पर सदैव जीत होती है.इसी बात को रिमाईंड कराने हर साल दशहरे पर रावण का पुतला दहन करते हैं.पर रावण कभी मरता नहीं बल्कि हर साल कुछ अधिक उंचाई के साथ खड़ा हो जाता है.
आज के दौर में सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, अच्छाई- बुराई के बीच का फर्क समझ से परे है.जो बुरे हैं, बुरा काम करते हैं - वही मलाई खा रहें. पड़ोस का ठाकुर कुछ नहीं करता सिवा तिकड़म के..मोहल्ले में कोई उसे पसंद भी नहीं करता फिर भी रोज बिरयानी की सोंधी-सोंधी खुशबू केवल उसी के घर से आती है. नए युग के नए-नए सारे उपकरण केवल उसी के घर इंट्री मारते हैं. अच्छाई के साथ चलने वाले बेचारे टेंशन में होते हैं. किसी सड़क दुर्घटना में घायल आदमी का हेल्प कर दीजिये,, पुलिस के धारावाहिक इंटरव्यू से आप पागल हो जायेंगे..बार-बार थाने जाने के चक्कर में अपना घर भी भूल जायेंगे. तब कान पकड़ यही कहेंगे- नहीं... दुबारा ऐसी भूल नहीं करूँगा कोई मरता है तो मरे.
एक बार एक नौकर किन्हीं विषम परिस्थिति में अपने मालिक के तिजोरी से पचास हजार रूपये चुरा लेता है.घर लौटने पर उसे बड़ी ग्लानि होती है तो .पुनः पैसे को वापस रखने वह मालिक के मकान पहुंच तिजोरी खोलता है और रूपये रखते- रखते सपड़ा जाता है. मालिक उसे बेहद धुनता है.बार-बार नौकर सच्ची बातें बताता पर सुने कौन ? पुलिस में दिया तो उसने भी खूब धूना..उनका तो यह सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है.वहां भी वह सच्चाई बकता रहा पर पुलिस को तो सच्चाई के अलावा सब सुनने की आदत है. उसे लाकअप में ठूंस दिया.सत्यफेलहुआ और असत्य पास’.
मतलब ये है कि आज सब उल्टा-पुल्टा हो रहा है. किसी का पुतला-दहन कर केवल भड़ास निकाल सकते हैं... अपनी कुंठा शांत कर सकते हैं पर पुतले के भीतर के विकार को समाप्त नहीं कर सकते..
एक दिन मेरे आठ वर्षीय पुत्र ने पूछा- पापा, पुतला-दहन क्यूं करते है ?’
उसकी जिज्ञासा को शांत करने जवाब दिया- बेटा, किसी बात का विरोध प्रदर्शन करने का तरीका है यह..
किसका पुतला दहन करते हैं ?’ बेटे ने सवाल दागा.
किसी का भी...जो दिखता है उसका और जो नहीं दीखता उसका भी..जैसे- मंहगाई, आतंकवाद, ऍफ़. डी .आई. का, कभी केंद्र का , तो कभी राज्य का, कभी प्रधानमन्त्री का तो कभी मुख्यमंत्री का..कभी नेता का तो कभी अभिनेता का...
आपका पुतला दहन कब होगा ?’
मैं इस बेतुके सवाल पर चौंका. उसे समझाया- बेटे, केवल बड़े लोगों का होता है पुतला दहन..
आप भी तो बड़े हैं पापा..
अरे वैसा बड़ा नहीं बेटा..बड़े से मतलब धन-दौलत ,पावर ,पद से है..छोटे लोगों का पुतला दहन नहीं होता..
आप छोटे क्यूं हैं ? ‘वह नाराजी से पूछा.
क्योंकि मैं कभी रिश्वत नहीं खाता ..किसी से कमीशन नहीं लेता ..कोई घोटाला नहीं करता..किसी को ठेका नहीं दिलाता इसलिए ...पर ये बता...तुम्हें मेरे पुतला दहन के बारे में क्यूं सूझा ?’
उसने जवाब दिया- कल स्कूल के एक दोस्त ने बताया कि उसके बड़े पापा जो दतिया में एस.पी. हैं , उनका चार-पांच दिन पहले वहां पुतला दहन हुआ..उसने अखबार में छपी सर से पाँव तक वाली दो फोटो भी दिखाए ‘..पर समझ नहीं आया कि उसमे पुतला कौन है और एस.पी कौन..
अरे इसमे समझने वाली क्या बात है..जो बड़ा बौड़म , बेडौल ,और बदसूरत होता है वही पुतला होता है..मैंने शेखी बघारी.
पर पापा..दोनों एक से दिखते थे..दोस्त से भी पूछा कि इसमें दहन किसका हुआ तो वह भी बता न सका,कहा-अपने पापा से पूछकर बताऊंगा..
तो ये बात है...बेटा, जिनके विरोध में हजारों-हजार लोग होते हैं,उन्हीं का पुतला दहन होता है..मेरे विरोध में तो आफिस का एक चपरासी तक नहीं तो क्या ख़ाक मेरा पुतला जलेगा ?’
कोई न कोई तो होगा पापा..
नहीं बेटा ..कोई भी नहीं..आफिस के सारे लोगों का काम मैं अकेले ही तो करता हूँ तो भला वे मेरा क्या विरोध करेंगे.. क्यूं मेरा पुतला दहन करेंगे ? मेरा कभी न होगा..भूल जा.. पर हाँ ...माटी का पुतला हूँ तो दहन तो इस पुतले का भी निश्चित है..तब तू ही मुझे फूंकेगा ..पर विरोध में नहीं.....जा.....ये बातें अभी तू नहीं समझेगा..जाकर पढ़ाई कर...ये आलतू-फ़ालतू की बातें मत सोचा कर..
बेटे को तो भगा दिया पर मेरा मन इस आलतू-फ़ालतूकी बातों में उलझ कर रह गया.जिंदगी रहते तो कभी बड़ों में शुमार ना हुआ ...दहकने (मरने ) के बाद ही सही..देर आयद - दुरुस्त आयद.
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-प्रमोद यादव /दुर्ग,छत्तीसगढ़


1 अगस्त 2013
प्रमोद यादव का व्यंग्य : मेरा पुतला दहन
मेरा पुतला-दहन/ प्रमोद यादव

जब-जब देश, राज्य या शहर-कस्बे में कोई बड़ा घोटाला होता है, भ्रष्टाचार होता है या कोई बड़ा नेता कोई बड़ा ही बेतुका बयान बकता है तब पुतला-दहनका पावन पर्व शुरू हो जाता है और फिर सियासत गरमा जाती है. देश स्तर पर होता है तो यह कार्यक्रम बिजली की गति से शहर-दर-शहर सफ़र करता है(टी.वी न्यूज .के माध्यम से ) और कसबे या शहर स्तर का होता है तो राज्य के किसी मंत्री-संत्री या मुख्य- मंत्री का पुतला फूंक अपनी अंतरात्मा को शांत कर लेते हैं. पुतला-दहन से हमेशा की तरह होता कुछ नहीं...ना सरकार कभी इससे जलती ( गिरती ) है ना ही कोई मंत्री-संत्री मरता या इस्तीफा देता है. ,ना ही फूंकने वाले किसी पुण्य के भागीदार बन स्वर्गीयस्थिति को प्राप्त होते हैं बल्कि अगले चुनाव के बाद पासा पलट जाता है और पुतले फूंकने वाले खुद पुतलों की शक्ल में फूंके जाते हैं. बरसों से यह दौर-दौरा चला आ रहा है और गाय की तरह सीधी जनता (आम आदमी ) इस प्रायोजित कार्यक्रम को टी.वी. सीरियल ये रिश्ता क्या कहता हैके मानिंद तन्मयता से देखने मजबूर है.. सब .अपना टाईम पास कर रहे हैं.. आज पूरा देश ऐसे ही दृश्यों में फ्रिजहो गया है.
पुतला-दहन के इतिहास के विषय में केवल इतनी जानकारी है कि बचपन में पहली बार दशहरे के दिन रावण के पुतले को दहकते देखा...तब इसे एक पर्व की भांति ही जाना .इस पर्व के मर्म से मैं सर्वथा अनभिज्ञ था.पर साल-दर साल यही सब देखते-देखते समझदार होते गया तो पुतले के मर्म को समझता गया .. राम -रावण की कहानी से भिज्ञ हुआ.. जाना कि एक छोटी सी चिंगारी आग का दरिया कैसे बनती है..भाई लखन ने रावण की बहन शूर्पनखा की नाक काट दी तो नौबत यहाँ तक पहुंची कि लंका-दहन हो गया और रावण रिवेन्ज लेने के मूड में बेवकूफी पर बेवकूफी और अन्याय पर अन्याय करता गया पर रामजी के न्याय के आगे टिक ना सका और देवों के देव महादेव के अनन्य भक्त रावण फिसड्डी साबित हो भस्म हो गया . मोराल ऑफ़ द स्टोरी ये है कि न्याय ,अन्याय पर भारी पड़ता है ,सच का बोलबाला , झूठे का मुंह काला होता है, अच्छाई की बुराई पर सदैव जीत होती है.इसी बात को रिमाईंड कराने हर साल दशहरे पर रावण का पुतला दहन करते हैं.पर रावण कभी मरता नहीं बल्कि हर साल कुछ अधिक उंचाई के साथ खड़ा हो जाता है.
आज के दौर में सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, अच्छाई- बुराई के बीच का फर्क समझ से परे है.जो बुरे हैं, बुरा काम करते हैं - वही मलाई खा रहें. पड़ोस का ठाकुर कुछ नहीं करता सिवा तिकड़म के..मोहल्ले में कोई उसे पसंद भी नहीं करता फिर भी रोज बिरयानी की सोंधी-सोंधी खुशबू केवल उसी के घर से आती है. नए युग के नए-नए सारे उपकरण केवल उसी के घर इंट्री मारते हैं. अच्छाई के साथ चलने वाले बेचारे टेंशन में होते हैं. किसी सड़क दुर्घटना में घायल आदमी का हेल्प कर दीजिये,, पुलिस के धारावाहिक इंटरव्यू से आप पागल हो जायेंगे..बार-बार थाने जाने के चक्कर में अपना घर भी भूल जायेंगे. तब कान पकड़ यही कहेंगे- नहीं... दुबारा ऐसी भूल नहीं करूँगा कोई मरता है तो मरे.
एक बार एक नौकर किन्हीं विषम परिस्थिति में अपने मालिक के तिजोरी से पचास हजार रूपये चुरा लेता है.घर लौटने पर उसे बड़ी ग्लानि होती है तो .पुनः पैसे को वापस रखने वह मालिक के मकान पहुंच तिजोरी खोलता है और रूपये रखते- रखते सपड़ा जाता है. मालिक उसे बेहद धुनता है.बार-बार नौकर सच्ची बातें बताता पर सुने कौन ? पुलिस में दिया तो उसने भी खूब धूना..उनका तो यह सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है.वहां भी वह सच्चाई बकता रहा पर पुलिस को तो सच्चाई के अलावा सब सुनने की आदत है. उसे लाकअप में ठूंस दिया.सत्यफेलहुआ और असत्य पास’.
मतलब ये है कि आज सब उल्टा-पुल्टा हो रहा है. किसी का पुतला-दहन कर केवल भड़ास निकाल सकते हैं... अपनी कुंठा शांत कर सकते हैं पर पुतले के भीतर के विकार को समाप्त नहीं कर सकते..
एक दिन मेरे आठ वर्षीय पुत्र ने पूछा- पापा, पुतला-दहन क्यूं करते है ?’
उसकी जिज्ञासा को शांत करने जवाब दिया- बेटा, किसी बात का विरोध प्रदर्शन करने का तरीका है यह..
किसका पुतला दहन करते हैं ?’ बेटे ने सवाल दागा.
किसी का भी...जो दिखता है उसका और जो नहीं दीखता उसका भी..जैसे- मंहगाई, आतंकवाद, ऍफ़. डी .आई. का, कभी केंद्र का , तो कभी राज्य का, कभी प्रधानमन्त्री का तो कभी मुख्यमंत्री का..कभी नेता का तो कभी अभिनेता का...
आपका पुतला दहन कब होगा ?’
मैं इस बेतुके सवाल पर चौंका. उसे समझाया- बेटे, केवल बड़े लोगों का होता है पुतला दहन..
आप भी तो बड़े हैं पापा..
अरे वैसा बड़ा नहीं बेटा..बड़े से मतलब धन-दौलत ,पावर ,पद से है..छोटे लोगों का पुतला दहन नहीं होता..
आप छोटे क्यूं हैं ? ‘वह नाराजी से पूछा.
क्योंकि मैं कभी रिश्वत नहीं खाता ..किसी से कमीशन नहीं लेता ..कोई घोटाला नहीं करता..किसी को ठेका नहीं दिलाता इसलिए ...पर ये बता...तुम्हें मेरे पुतला दहन के बारे में क्यूं सूझा ?’
उसने जवाब दिया- कल स्कूल के एक दोस्त ने बताया कि उसके बड़े पापा जो दतिया में एस.पी. हैं , उनका चार-पांच दिन पहले वहां पुतला दहन हुआ..उसने अखबार में छपी सर से पाँव तक वाली दो फोटो भी दिखाए ‘..पर समझ नहीं आया कि उसमे पुतला कौन है और एस.पी कौन..
अरे इसमे समझने वाली क्या बात है..जो बड़ा बौड़म , बेडौल ,और बदसूरत होता है वही पुतला होता है..मैंने शेखी बघारी.
पर पापा..दोनों एक से दिखते थे..दोस्त से भी पूछा कि इसमें दहन किसका हुआ तो वह भी बता न सका,कहा-अपने पापा से पूछकर बताऊंगा..
तो ये बात है...बेटा, जिनके विरोध में हजारों-हजार लोग होते हैं,उन्हीं का पुतला दहन होता है..मेरे विरोध में तो आफिस का एक चपरासी तक नहीं तो क्या ख़ाक मेरा पुतला जलेगा ?’
कोई न कोई तो होगा पापा..
नहीं बेटा ..कोई भी नहीं..आफिस के सारे लोगों का काम मैं अकेले ही तो करता हूँ तो भला वे मेरा क्या विरोध करेंगे.. क्यूं मेरा पुतला दहन करेंगे ? मेरा कभी न होगा..भूल जा.. पर हाँ ...माटी का पुतला हूँ तो दहन तो इस पुतले का भी निश्चित है..तब तू ही मुझे फूंकेगा ..पर विरोध में नहीं.....जा.....ये बातें अभी तू नहीं समझेगा..जाकर पढ़ाई कर...ये आलतू-फ़ालतू की बातें मत सोचा कर..
बेटे को तो भगा दिया पर मेरा मन इस आलतू-फ़ालतूकी बातों में उलझ कर रह गया.जिंदगी रहते तो कभी बड़ों में शुमार ना हुआ ...दहकने (मरने ) के बाद ही सही..देर आयद - दुरुस्त आयद.
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-प्रमोद यादव /दुर्ग,छत्तीसगढ़

Monday, 22 July 2013




कहानी-
      हैवानियत / प्रमोद यादव


ममता,अब रोना-धोना बंद भी करो...कब तक यूं रोती रहोगी ? जो होना था सो हो गया..इसे नियति मानकर चलो..मैंने तो पहले ही और उसी दिन तुम्हें सावधान किया था जिस दिन पप्पी मिली..तुम्हें बार-बार समझाया था कि आगे जाकर कहीं ये हमारे लिए दुखदाई ना बन जाये..कोई मुसीबत ना बन जाए..पर तुम्हारे ह्रदय में तो उस वक्त कुछ जरुरत से ज्यादा ही  ममत्व हिलोरें मार रहा था..तुम ममता में अंधी हो गयी थी..ऐसा नहीं कि उस खौफनाक दृश्य से मैं विचलित न हुआ..मैं भी सिहर गया था..पर एकाएक तुमने उसे साथ ले चलने का जो फैसला लिया,वो मुझे कतई पसंद  नहीं था..लेकिन इंसानियत के नाते कहकर तुमने मुझे निरुत्तर कर दिया..कुछ दिनों के लिए कहकर मुझे चुप करा दिया..पर आज तुमने देख ली ना..इंसान की इंसानियत..
हाँ..अजीत...अब इंसानियत दफ्न हो गया है...केवल हैवानियत रह गया है..कभी सपने में भी न सोची थी कि आदमी इस कदर भी गिर सकता है. हैवान हो सकता है.. .
छोडो ममता...जो होना था सो हो गया..अब नीटू पर ध्यान दो..बार-बार वो पप्पी के बारे में पूछ रहा है..उसे  समझाओ..
अपनी आँखों के गीले कोरों को उँगलियों से समेटती ममता नीटू को बांहों में भरकर बोली -वो रूठकर चली गई नीटू..तू उसे तंग करता था ना..इसलिए..
सारी मम्मी..अब नहीं करूँगा..उसे बुला लो ना .. वह सुबकने लगा था.
डेढ़-वर्षीय पप्पी साल भर पहले गोंदिया स्टेशन के पास ममता को लावारिश मिली थी.पुणे से एक शादी अटेंड कर अपने पति अजीत और दो-वर्षीय पुत्र नीटू के साथ स्टेशन से ऑटो कर दो फर्लांग ही बाहर वीरान रास्ते  पर  पहुंची  थी तो देखी कि दो छोटे-छोटे कुत्ते किसी गठरीनुमा चीज को मुंह में दबाये आपस में खींच रहे थे तभी किसी बच्चे की चीख ने उसे चौंकाया.उसने तुरंत ऑटो रुकवाया. दौड़कर कुत्तों को भगाया. एक पांच-छः माह की दुधमुंही बच्ची थोड़ी घायल-सी  थी और लगातार  चीखे जा रही थी.तब तक अजीत भी वहां पहुँच गया. बच्ची को हाथों में थामे वह आसपास देखने लगी कि शायद कोई इसका अभिभावक दिख जाए पर दूर-दूर तक  वहां कोई न था. अजीत किंकर्तव्य मूढ़ खड़ा रहा. ममता उस बच्ची को गोद में ले ऑटो में बैठी. बैग से एक तौलिया निकाल उसमे लपेटी और ऑटो वाले को तुरंत ही किसी पास के डिस्पेंसरी में चलने कहा डाक्टर ने बताया कि मामूली खरोंच है, इंजेक्शन नहीं लगेंगे.. मलहम से ठीक हो जायेगी..पर इसे पर्याप्त मात्रा   में माँ का दूध मिले तो जल्दी रिकव्हर कर लेगी. बच्ची का भूख से बुरा हाल था.
ऑटो में बैठते ही ममता ने बच्ची को अपनी आँचल के नीचे छुपाया तो अजीत चीख-सा पड़ा-ये क्या कर रही हो ममता ? ना जाने किसकी है..कौन से मजहब की  है लावारिश है या  किसी के पाप की गठरी है..बिना कुछ जाने इसे दूध पिलाने जा रही हो ?
चुप रहो अजीत..चाहे कोई भी हो ..है तो एक नन्ही जान ना..और इसकी जान बचाना ही इंसानियत  का धर्म है..फिलहाल इस विषय में मुझसे और बातें न करो..सारी बातें घर चलकर करें तो अच्छा होगा...
घर पहुँचते तक बच्ची गहरी नींद के आगोश में चली गयी थी. नन्हा नीटू उस नवांगतुक को आश्चर्य भरी नज़रों से घूर रहा था.अजीत ने सवाल किया कि अब इस बच्ची का क्या करें ? ममता ने साफ-साफ कहा कि इसके माता-पिता को ढूढेंगे..पुलिस से सहायता मांगेंगे जैसे ही मिलेंगे ..उन्हें सौंप देंगे...तब तक यह यहीं रहेगी ...इसी घर में.
ममता की जिद पर वह वहीँ पलने लगी.उसने उसे पप्पी नाम दिया ममता और अजीत ने महीनों कोशिश की ..पुरजोर कोशिश की ,उसके माता-पिता को खोजने की और आखिर मेहनत रंग लाई...उन्हें उस गाँव का पता मिल ही गया ,जहाँ उसके माता-पिता रहते  थे.उन्हें यह भी पता चला कि बहुत गरीब लोग हैं..मेहनत-मजदूरी कर पेट पालते हैं. जिस दिन पप्पी स्टेशन के पास  मिली, उसके एक दिन पूर्व  हादसा ये हुआ था कि दोनों पति-पत्नी अपनी इस दुधमुंही बच्ची के साथ बीती रात कमाने-खाने के लिए कोलकाता जाने ट्रेन के इन्तजार में  स्टेशन पर सोये थे.एकाएक बच्ची कब और कैसे गायब हुई,वे जान ना सके.सुबह उन्होंने काफी खोजबीन की, लोगों से पूछताछ की,रेलवे पुलिस से मदद के लिए गिडगिडाया पर गरीब मजदूर की भला कौन सुनता ? दोनों रोते-बिलखते अपने जिगर के टुकड़े के बिना कमाने-खाने कोलकाता चले गए.
पता मिलते ही ममता और अजीत पप्पी को ले अविलम्ब गाँव पहुंचे पर वहां वे हताश हुए..दो दिन पूर्व ही वे कमाने-खाने किसी और शहर को रवाना हो गए थे.इस बार वे किसी को कुछ बताकर नहीं गए. दोनों वापस घर लौट आये पर उन्हें भरोसा था कि एक न एक दिन वे जरुर मिल जायेंगे. दिन बीतते गए ... बीतते गए..पूरा साल निकल गया पर कोई न मिला. पप्पी नीटू के साथ खूब घुलमिल गयी..ममता भी दोनों बच्चों के प्यार में रम गयी..अजीत भी लगभग सब कुछ भूल गया. तभी एक दिन एक ऐसा हादसा हुआ कि ममता पर वज्रपात सा हो गया. अजीत भी परेशान हो  गया. स्थानीय पुलिस-स्टेशन से सन्देश आया कि लापता बच्ची का पिता स्टेशन में मौजूद है... कृपया उसे लाकर इन्हें सौंप दें. ममता पप्पी के प्यार में इस कदर डूबी थी कि उससे बिछोह की सोचते ही दुखी  हो गयी.बड़ी मुश्किल से दिल पर पत्थर रख फैसला किया कि पप्पी गैर की अमानत है..सौंपनी तो होगी ही.
ममता बहुत ही बुझे मन से अजीत के साथ थाने पहुंची तो एक बहुत ही गरीब, कृशकाय ग्रामीण को वहां बैठा पाया. उसने पप्पी की माँ के विषय  में पूछा तो बताया  कि छः महीने पहले बच्ची के बिछोह में चल बसी.अब वह निपट अकेला है ..और उसके पास अब कोई काम-धाम भी नहीं है..ममता यह सोच बहुत  दुखी हुयी कि पप्पी को यह पालेगा कैसे..क्या खिलायेगा उसे..कैसे जियेगी ये बच्ची..क्या भविष्य होगा इसका...?
ममता हैरान थी कि कैसा बाप है ?ना उसने पप्पी को छुआ ,ना ही पुचकारा उसे देख उसके चहरे पर कोई भाव भी न उभरा.वह हतप्रभ थी कि कैसे पलेगी बच्ची उसके पास ? उसने इन्स्पेक्टर को एक कोने में ले जाकर अपने मन की बात कही.
इन्स्पेक्टर ने ग्रामीण मजदूर से कहा- चैतू...तुम्हारी तो अब पत्नी भी नहीं रही ..और तुम्हारे पास कोई काम-धाम भी नहीं है  ..तो भला इस बच्ची को पालोगे कैसे ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि तुम्हारी बेटी इन्हीं के घर पले..बढे..और पढ़े..इन्हें इसे रखने-पालने में कोई ऐतराज नहीं है..
ग्रामीण मजदूर चुप्पी साधे रहा. इधर ममता ,अजीत और इन्स्पेक्टर उसकी खामोशी टूटने के इंतज़ार में थे. दो मिनट की चुप्पी के बाद वह फूटा- ठीक है साहब..ये चाहें,तो रख सकते हैं...पर..
पर क्या ? इन्स्पेक्टर चौंका.
पर साहबजी..इसके एवज में मुझे इनसे एक  लाख रुपये दिला दीजिये...
ममता-अजीत यह सुन अवाक रह गए. इतने रुपये देने की उनकी कूवत न थी. पप्पी को थाने में छोड़ रोते-बिलखते ममता घर  वापस आ गयी...पप्पी की रोने की आवाज अब भी कानों में गूँज रही थी   मम्मी..मम्मी. मम्मी...
                        xxxxxxxxxxxxx
(यह कहानी एक सत्य घटना है जो पिछले दिनों अखबार में छपी थी.पात्रों के नाम भर काल्पनिक है )

                                         प्रमोद यादव
                                        दुर्ग, छत्तीसगढ़
                                     मोबाईल-०९९९३०३९४७५

Monday, 8 October 2012


"थैंक यू प्रभू"  
 
एक शहर मे एक बहुत ही काली - कलूटी कुरूप लड़की अपनी दो गोरी-गोरी बहनो माता-पिता के साथ रहती थी. अपनी कुरूपता से इस कदर दुखी रहती कि दर्पण देखने का साहस भी ना जुटा पाती..राह चलते लोग उसे देख ऐसी मुँह बनाते  
जैसे उन्होने कोई घृणित चीज़ देख लिया हो.. घरवाले तो कुछ नही कहते पर बाहरवालो की टिप्पणी और उपेक्षा से वह  
जार-जार रोती. प्रभू के आगे घंटो आँसू बहाती. एक दिन प्रभू उसकी व्यथा से व्यथित हो प्रगट हुए, बोले-बच्ची,क्यो इतना दुखी होती हो? तुम्हारी समस्या से मैं वाकिफ़ हूँ..हर समस्या का समाधान भी होता है..तुमने कभी समाधान की कोशिश की?  
"क्या कोशिश नही की प्रभू...फेयर एंड लवली,पांड्स, इमामी क्रीम..सबने धोका दिया..मेरे माता-पिता इतने धनी भी नही की माइकल जेक्शन की तरह मेरी प्लास्टिक सर्जरी करवा सके.."  
"अरे पगली इसमे धन की क्या ज़रूरत? तुम तो मात्र पच्चीस रुपये मे इस समस्या से छुटकारा पा सकती हो...अभी और इसी वक्त"  
"कैसे प्रभू?"लड़की विस्मित हुई.  
"बाजार जाओ और एक सुंदर-सा दुपट्टा ख़रीदो..उसे सर से लेकर गले के नीचे तक ऐसे लपेटो कि केवल दीदे भर दिखाई दे..लगे तो उस पर भी चश्मे चढ़ा लो और फ़र्राटे के साथ स्कूटी या सायकल पर उड़ो...तुम पर ना कोई टिप्पणी करेगा ना ही तुम्हारी उपेक्षा...उल्टे लोग तुम्हारे पीछे भागेंगे...जाओ, समय मत गवाओ..मैं साल भर बाद तुमसे मिलूँगा.."  
साल भर बाद प्रभू प्रगट हुए,पूछा-"क्या हाल है बच्ची?"  
लड़की खुशी से चहककर बोली-"बहुत खुश हूँ प्रभू..शुरू-शुरू मे दिक्कते आई..लोग अचंभे से देखते और पूछते..मैं एक ही जवाब देती-प्रदूषण से बचने मुँह बाँधती हूँ..पर अब कोई कुछ नही कहता..अब तो यह सजगता शत-प्रतिशत लड़कियो के सर पर सवार है...अब मैं अकेली ही(कुरूप) नही, शहर की सारी लड़किया मेरे साथ(कुरूप)हैं, सबको नकाब मे देखती हूँ तो बेहद खुशी होती है, हम सब मे एकरूपता जो गई..थैंक यू प्रभू..यू आर ग्रेट..थैंक यू.."  
* प्रमोद यादव  
गयनागर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)  
मोबाइल-०९९९३०३९४७५