Saturday, 29 November 2014



एक शिक्षक की संछिप्त कथा../ प्रमोद यादव



जब कभी सेठ-मारवाड़ी के बच्चों को ( जवानों को भी ) दूकान के गद्देदार आसन में बैठे लाल- हरे नोटों की गड्डी गिनते देखता हूँ तो ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हे भगवान ! यह जनम तो एक शिक्षक के घर जनम लेकर व्यर्थ और अनर्थ हुआ ..अब अगले जनम का कोई चांस बनता हो तो कृपा करके किसी मालदार सेठ-मारवाड़ी की गोदी में ही डालना .. क्या ठाठ की जिंदगी होती है इनकी...गरीबी और अभाव तो इन्हें कभी छू तक नहीं पाता...पैदा होते ही.’ सिल्वर स्पून इन माउथ ‘... इनके घरों में बच्चे कितने लाड-प्यार से पलते-बढ़ते हैं..खिलौने खेलने की उमर में पूरा का पूरा मीनाबाजार इनके आगे-पीछे होता है.. औरों की तरह एक-दो झुनझुने से इनका मन नहीं बहलता....पढने-लिखने की उमर में न तो बच्चा परेशान होता है ना ही इनके माँ-बाप.. बच्चा स्कूल गया तो अच्छा और नहीं गया तो और भी अच्छा..छोटी उम्र में ही बड़ा जाब थमा देते हैं...पुश्तैनी दूकान में बिठा देते हैं..जितने समय में उसका कोई हमउम्र मेट्रिक होकर निकलता है उतने समय में ये दूकानदारी में डाक्टरेट कर लेते हैं.. 
हमारे यहाँ तो पैदा होते ही बच्चे को सिर के ऊपर से कान पकड़ने की प्रेक्टिस कराते हैं..और जिस दिन भी बच्चा कान पकड़ लेता है उस दिन से उसकी उलटी गिनती शुरू हो जाती है.. कान पकड़ने का सिलसिला फिर अनवरत जीवन भर chalchaltchalteचलते रहता है..स्कूल में बात-बात पर मास्टरजी पकड़ते हैं.. तो ghagharघर में गाहे-बगाहे माँ-बाप ....कालेज के दिनों में धोखे से कहीं प्यार-व्यार के चक्कर में पड़ गए तो बार-बार खुद ही पकड़ने होते हैं कान ..छोटी-छोटी बात के लिए माशूका से माफ़ी जो मांगनी होती है..इससे बच गए तो शादी के बाद पूरा दूकान (दोनों कान) बीबी की प्रापर्टी हो जाती है..वह पकड़ती तो नहीं बल्कि खा जाती है कान ..अनाप-शनाप इधर-उधर की बातें सुना-सुना के....
 खैर..तो बात चल रही थी पढाई-लिखाई की....बड़े घरों के बच्चे ना भी पढ़े तो कोई हर्ज नहीं पर किसी शिक्षक का बच्चा पढ़ाई-लिखाई में अरुचि दिखाए तो शामत ही आ जाती है..बार-बार उलाहने दिए जाते हैं, चेतावनी दी जाती है कि पढोगे नहीं तो कुछ बनोगे कैसे ?  ( कुछ बनोगे से तात्पर्य केवल शिक्षक बनने से होता है ) और आगे ऐसी स्थिति में कुली-कबाड़ी या  चपरासी-चौकीदार बनने का मुफ्त आशीर्वाद देते हैं....बाबूजी को लगता है कि शिक्षक बनकर वे सर्वपल्ली राधाकृष्णन बन गए..बार-बार उनका उदाहरण दे शिक्षकों का गुणगान करते थकते नहीं.. शिक्षक-दिवस के दिन तो पूरे पल्लीमय हो जाते हैं..बड़े ही मनोयोग से मनाते हैं- ये दिवस..जैसे उनका अपना ही जन्म-दिवस हो..गुरु-शिष्य परंपरा पर धुंआधार भाषण भी देते हैं..अब उन्हें कौन समझाये कि वैसे दिन कब के लद गए..वे गाँव-देहात में बरसों से पढ़ाते रहें इसलिए उन्हें इसका इल्म नहीं..लेकिन जबसे शहर में ट्रासफर होकर आये हैं, उनके पाँव के नीचे की जमीन खिसकने लगी है..बार-बार गाँव को याद कर कहते हैं-कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन को.. अक्सर कहते हैं-शहरों में इस उच्चकोटि के सम्माननीय ( शिक्षकीय ) कार्य का इतना भयंकर अवमूल्यन कैसे हुआ-समझ नहीं आता..शहर में आके इन्हें ’ दाल-aaआटे ’ का भाव मालुम होने लगा है ..देहात में तो साग-सब्जी,दाल-चांवल ,गेहूँ ,प्याज,टमाटर आदि मुफ्त ही मिल जाया करते..विद्यार्थी बड़े प्यार से ये सब स्कूल में बतौर चढ़ावाले आते ..कभी-कभी (परीक्षा के दिनों में) बच्चों के पालक भी घर पहुँच सेवा बजा देते..
शहर में तो आधे से अधिक तनखा इसी सब में घुस जाता है..ऊपर से हर एक-दो दिन में स्कूल में नए-नए कार्यक्रम...नए-नए फरमान...गाँधी जयंती, तुलसी जयंती, तिलक जयंती,बाल-दिवस, गणतंत्र दिवस,स्वतन्त्रा दिवस तक तो ठीक ..अब तो पर्यावरण दिवस,साक्षरता दिवस,ओजोनmaattrmaattmaatmaamam दिवस, विज्ञान-दिवस, खेल-दिवस और ना जाने क्या-क्या दिवस मनाते हैं..ऊपर से रोज-रोज का बड़ा ही ‘हारिबल’ दिवस- मध्यान भोजन दिवस....बाबूजी इन दिनों कहने लगे हैं कि यही हाल रहा तो देखना एक दिन ऐसा भी आएगा कि किसी एक दिन हम इन दिवसों की तरह ही ‘पढ़ाई-लिखाई दिवस’ भी मनाएंगे..पूरे साल में केवल एक ही दिन बच्चे पढेंगे-लिखेंगे..उसी दिन पढाई होगी..उसी दिन परीक्षा और उसी दिन रिजल्ट...अभी-अभी स्कूल में एक नया फरमान आया है कि प्रधानमंत्री जी शिक्षक-दिवस के दिन तीन बजे से पांच बजे तक बच्चों को संबोधित करेंगे..अभी तक तो इस दिन गुरूजी लोग ही भाषण देकर तुष्ट हो लेते थे अब यह भी गया..समझ नहीं आता जो आता है वही चाचा बनने को क्यों आतुर रहता है ? कलेक्टर की मीटिंग से लौटने के बाद से बाबूजी बहुत परेशान दिखे..
मैंने पूछा- ‘आप इतने परेशान क्यों हैं ? आवश्यक संसाधन रेडिओ-टी.वी. की व्यवस्था तो सुनिश्चित हो ही जायेंगे..’
‘ अरे वो बात नहीं है..बात ये है कि पूरा दिन गया..पहले तो भाषण बाजी के बाद ग्यारह-बारह बजे तक छुट्टी हो जाती थी..अब तो पूरे दिन खटना है..एक बजे तक हमें अपने स्तर पर  मनाने का आदेश है..फिर मध्यान भोजन कराना है..रोज की तरह सुबह करायेंगे तो बच्चे दोपहर को भला क्यों आयेंगे ? तीन से पांच बजे तक प्रधान मंत्री जी का संबोधन है जिसे हमें सुनना अनिवार्य कहा है..अब शिक्षक-दिवस का भी राजनीतिकरण होने लगा है..’ वे कुछ खफा-खफा से बोले.
‘ बाबूजी..वोट की राजनीती में सब जायज है..इसमें सफल हुए और चुने गए तो आगे के पांच साल इमेज बनाने में लगते हैं,,हर वर्ग में पैठ बनाने में लगते हैं.. इसे इसी की एक प्रक्रिया मानकर चलें..ज्यादा परेशान न होवें.. ’ मैंने उन्हें ढाढस बंधाया.
शिक्षक-दिवस के दिन शाम को छः बजे वे लौटे तो एकदम हांफने लगे..पूरा चेहरा जैसे पीला पड़ गया था..पसीने से तरबतर थे..आते ही कुर्सी पर धंस गए..मैंने पूछा- ‘ क्या हुआ ?...सब ठीक तो है ना ?
तब वे बोले- ‘ गजब हो गया दीनू..सब कुछ होकर भी कुछ ना हो सका. और आगे अब क्या होगा..ईश्वर ही जाने..’
‘ अरे पहेली मत बुझाओ..बताओ..क्या हुआ ? ’
तब उन्होंने बताया कि ऐन पी.एम. साहब के भाषण के वक्त बिजली चली गई..और बच्चे हो-होकर हुल्लड़ करते भाग निकले..किसी तरह कुछ बच्चों को रोक पाए..लेकिन बिजली के आते तक पी.एम. का सम्बोधन ही समाप्त हो गया..अब न मालुम क्या होगा ? मेरी शिकायत कलेक्टर के थ्रू कहीं पी.एम. तक न चली जाए.. फिर थोडा रूककर बोले- ‘ बेटा..कुछ भी बन जाना पर भूलकर भी शिक्षक मत बनना..बड़े धोखे हैं इस राह में...कभी जनगणना में झोंकते हैं तो कभी चुनाव में..बाकी के दिनों सरकारी योजनाओं में...ईश्वर करे..अगले जनम में भी भूलकर किसी शिक्षक के घर पैदा मत लेना..’
मैं एकदम प्रसन्न हुआ कि आखिर बाबूजी ने भी मेरी मंशा पर मोहर लगा दी..अगले जनम के लिए भी छूट दे दिया..पर समस्या ये है कि अगले प्रोग्राम पर कौन मोहर लगाए ? फिर भी आशान्वित हूँ..जब इतना कुछ सुलझ गया है तो ये भी सुलझ जाएगा..किसी न किसी सेठ-मारवाड़ी के घर मुंह में सिल्वर स्पून लिए पैदा हो ही जाऊँगा....और फिर आगे लाल-हरे नोट की गड्डियां गिनूँगा..एकाएक बाबूजी की बातों से तंद्रा टूटी..वे पूछ रहे थे- ‘ क्या सोचने लगे ? ‘
‘ कुछ नहीं बाबूजी..आप घबराएं नहीं..कुछ नहीं होगा..दो दिन पहले ही सरकार ने विपक्ष के विरोध के चलते इस कार्यक्रम को स्वैक्छिक कर दिया था..शायद आपको मालुम नहीं..आप आराम करिए.. चैन से टी.वी. देखिये..’
मेरी बातों को सुन वे एकदम हलके हो गए.. और टी.वी. आन कर समाचार देखने लगे.. शिक्षक-दिवस के कार्यक्रम देखने लगे...
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                                                               प्रमोद यादव
                                                        गयानगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़



काले धन की वापसी / प्रमोद यादव


‘ पापा...काला धन किसे कहते हैं ? ‘  नौ वर्षीय बेटे ने अचानक पढ़ते-पढ़ते पूछा.
अखबार पढ़ते पापा ने जवाब दिया- ‘ उसे जो सफ़ेद नहीं होता ..’
‘ तो सफ़ेद धन किसे कहते है ? ‘
‘ उसे ..जो काला नहीं होता..’ पापा ने मजाक से कहा.
‘ क्या पापा...आप भी घोर-घोर रानी करते हैं..बताइये न..क्या है काला धन..और ये कहाँ होता है ? ‘ बेटे ने मजाक को समझते हुए गंभीरता से पूछा.
‘ पहली बात तो ये बताओ..धन-वन से आपको क्या लेना-देना ? और दूसरी बात- ये काला धन आपने कहाँ से सुना ? ‘
‘ टी.वी. से ....जब भी आप समाचार देखते हैं..अक्सर इसकी बातें होती है.. मैं भी कभी-कभी सुनता  हूँ..और एक गेरुआधारी जो बाबाजी हैं न ..वो काले घनी दाढ़ी-मूंछ वाले, वे तो रट्टू तोते की तरह इसका हिसाब भी बार-बार बताते हैं कि दस खरब,चालीस अरब डालर के बराबर काला धन विदेशी बैंकों में जमा है..ये वापस आ जाए तो देश का सारा कर्ज चुकता हो जाए..आदि-आदि.. वे तो जैसे ठाने ही बैठे हैं कि विदेशों से काला धन लाकर रहेंगे..पर एक लम्बे अरसे से वे टी. वी. चैनल्स में ही नहीं दिख रहे.. क्या  काला धन लाने बाबा विदेश गए हैं ? क्या हमारे देश में इसकी कमी है जो हम दूसरे देशों से लाने की सोच रहे ? ‘
‘ अरे नहीं बेटा..बाबाजी तो यहीं हैं..उन्हें नई सरकार ने भरोसा दिया था कि सौ दिन के भीतर इस मुद्दे  पर ठोस कार्यवाही करेंगे.. विदेशों में जमा काला धन जरूर लायेंगे... और वैसे भी काले धन की वापसी को चुनावी मुद्दा बनाकर ये चुनाव जीते थे..तो कुछ न कुछ तो करना ही था..’ 
‘पापा...सौ दिन तो हो गए...क्या काला धन वापस आ गया ? ‘
 ‘ नहीं बेटा ..सरकार ने एक कमिटी सिट गठित कर उन्हें झुनझुना थमा कह दिया – अब और  ज्यादा हल्ला नहीं करना..ना ही टी.वी.चैनल्स में दिखना..ना कोई स्टेटमेंट देना....सिट अपना काम करेगी..आप अपना काम करो... पेट को गोल-गोल घुमा जलेबी बनाओ और लोगों को केवल योग सिखाओ.. हिसाब-किताब मत समझाओ..तब से बाबाजी छू मंतर हैं..’
‘ पापा..काला धन विदेशों में क्यों जमा है ? हमारे देश में क्यों नहीं ? ‘ बेटे ने सवाल किया.
‘ बेटा..अब तो ये हमारे देश में ही रह गया है...विदेशी बैंकों में जिन बड़े चोरों ने जमा कर रखा था..उन सबने तो कब का निकाल लिया.. दो-तीन साल से इस पर हो- हल्ला हो रहा है तो कोई बेवक़ूफ़ थोड़े हैं कि बावजूद इसके वहां काला धन रखे..सबने निकाल लिए..अभी कल का ही समाचार है कि पच्चीस लाख करोड़ रूपये का काला धन निकाल लिया गया ..’
 अच्छा..ये बताईये पापा..काला धन को लोग विदेशों में ही क्यों रखते हैं.. और कौन से बैंक में रखते हैं ? हमारे यहाँ भी तो सैकड़ों सरकारी और निजी बैंक है.. तो यहाँ क्यों नहीं ? ‘
‘ वो इसलिए कि यहाँ रखेंगे तो सरकार देर-सबेर सब खंगाल ही लेगी.. और जब्ती बना देगी..जेल जायेंगे सो अलग..विदेशी बैंको में रखने से गोपनीयता बनी रहती है.. बड़े-बड़े नेता, उद्योगपति और प्रशासनिक अधिकारी और डान टाईप के लोग अपना काला धन स्वीस बैंक में रखते हैं ..ये बैंक किसी को भी नहीं बताते कि किसका कितना करोड़ या अरब डालर जमा है...अम्ररीका वाले तो अपने देश के कालाबाजारियों का हिसाब मांगते -मांगते थक गए..तो हमारी सरकार को भला वो क्या घास डालेंगे ? ‘
‘ तो इसका मतलब है कि काला धन आने से रहा..’ बेटे ने पटाक्षेप के लहजे में कहा.
‘ कुछ बचे तो आये..सबने तो निकाल लिए..अब क्या आएगा-बाबाजी का ठुल्लू ? ‘
 ‘पापा... अब तो बताओ..काला धन किसे कहते है ?’
‘ नंबर दो की जो कमाई होती है उसे काला धन कहते हैं..’
‘नंबर दो की कमाई क्या है पापा ? ‘
‘ अपनी कमाई के बारे में वास्तविक विवरण न देकर , कर की चोरी करना ,रिश्वतखोरी-कमीशनखोरी, जुआ-सट्टा, रेस, रंगदारी जैसे गलत कार्यों से जो धन संग्रह किया जाता है, उसे काला धन कहते हैं.. इसे ही नंबर दो की कमाई कहते हैं..’
‘ तो नंबर एक की कमाई किसे कहते हैं पापा ? और इस पर कभी क्यों चर्चा नहीं होती ? ‘
‘ वो इसलिए कि ये चर्चा के लायक होता भी नहीं..तुम्हारी मम्मी जानती है कि नंबर एक की कमाई से (मेरे वेतन से) से पूरा महीना भी नहीं चल पाता..’
‘ तो आप क्यों नहीं करते नंबर दो की कमाई..आपको किसने रोक रखा है ? ‘ अचानक निशा की आवाज ने चौंका दिया- ’ और बच्चे को क्या नंबर एक – नंबर दो का पाठ पढ़ा रहे हो...पड़ोसियों को देखो..क्या बेहिसाब कमा रहें हैं....सामान रखने को मकान छोटा पड़ रहा है..और एक आपका घर है कि कमरे तो कमरे, बच्चों के गुल्लक तक खाली पड़े हैं...’
‘ अरे यार..तुम कहाँ से आ टपकी ? मैं तो बस यूं ही बेटे का नालेज बढ़ा रहा था..’
‘ आपका नालेज तो पच्चीस साल में भी नहीं बढ़ा.. तो बेटे का क्या ख़ाक बढ़ाएंगे ?..अरे..झूठ-मूठ ही सही..कभी तो ऐसा कुछ करते कि पास-पड़ोस में मेरी भी शान बढ़ जाती  ..सखी-सहेलियां मेरे नसीब पर जलती-भुनती ..’ निशा हुंकार भरते बोली.
‘ मसलन ? ‘
‘ मसलन कि एकाध खाता स्विस बैंक में ही खोल देते .. कितनी चर्चा है आजकल इस बैंक की...मैं भी गर्व से सबको बताती कि हम अपना सारा धन विदेशी बैंकों में रखते हैं..सुनकर लोग कितने इम्प्रेस्ड होते  .. वैसे सुनोजी.. अभी भी क्या बिगड़ा है..जब जागे तभी सबेरा..  आजकल तो आनलाईन का ज़माना है.. आप आनलाईन स्विस बैंक में एक खाता खोल लीजिये ना..’
‘ अरे भगवान्..तुम्हें मालूम भी है कि स्विस बैंक में खाता खोलने के लिए न्यूनतम राशि कितनी जमा करनी होती है ? ‘
‘ कितनी ? ‘ निशा ने ऐसे सहजता से पूछा जैसे अभी अंटी से निकाल दे देगी.
‘ कम से कम पचास करोड़ रूपये..’
‘ क्या.. ? ‘ पति की बातें सुन निशा को गश -सा आ गया.. कुछ पल के लिए एकदम चुप्पी साध  गई..फिर विस्फारित आँखों से देखते बोली- ‘ तो रहने दीजिये जी  ..बाद में dekhendekhengdekhengeदेखेंगे इसे  ..पहले दूध को जाकर देखूँ..शायद जल रहा है..’ और वो तेजी से किचन की ओर भाग गई.
बेटे ने मम्मी-पापा के संवाद को सुन इस विषय को कन्क्लूड करते कहा- ‘पापा.. मुझे आज तक केवल स्विस घड़ियों के बारे में ही पता था कि पूरे विश्व में प्रसिद्द है..आज जाना कि स्विस बैंक भी उतने ही मशहूर हैं..  पापा.. स्विस बैंक  में  जब भी खाता खोलना, मेरी भी एक खोल देना..’
इतना कह बेटा बस्ता ले भाग गया..
पापा मुस्कुराते हुए फिर से अखबार के उस समाचार को पढने लगे जिसमें काले-धन की वापसी के लिए स्विस बैंक से पत्राचार होने की बात कही गई थी.. वे.मन ही मन बुदबुदाने लगे- ‘अब पांच साल तो केवल यही कुछ भर होना है...पत्राचार और पत्राचार..तब तक जनता ये भी भूल जायेगी कि सरकार किस बात के लिए पत्राचार कर रही है और तब काले धन की वापसी का मुद्दा स्वमेव ही काल-कलवित हो जाएगा..’
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                                                           प्रमोद यादव
                                                      गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़ 


अंधे और लंगड़े की नई कहानी / प्रमोद यादव 

अगर आपकी पैदाईश चार-पांच दशक पहले की है तो निश्चित ही आप अंधे और लंगड़े की कहानी से अवगत होंगे. नए दौर के बच्चे... या कहिये दो दशक पहले पैदा लिए बच्चे शायद ही इस कहानी से वाकिफ हों..शायद ही इसे पढ़े या सुने हों. किसी के दादा-दादी या नाना-नानी ने सुनाये भी होंगे तो भी उन्हें याद नहीं होगा... मल्टी-स्टारर कहानी के ज़माने में एक अंधे और एक लंगड़े की कहानी को भला कौन याद रखेगा ? क्या मालूम यह कहानी अभी प्रायमरी स्कूल के हिंदी कोर्स में, बाल-भारती में है भी या नहीं ? वैसे भी आजकल के बच्चे तो जनमते ही कान्वेंट की राह पकड़ते हैं..हिंदी से इनका कोई नाता नहीं होता.. हिंदी पढना भी इनके शान के खिलाफ होता है..
वक्त के साथ बदलाव जरुर आता है..यह हकीकत है.. पर पिछले तीस सालों में बच्चों की जो मानसिकता बदली है तो उसमें उनका दोष नहीं..दोषी लाखों-करोड़ों पालक हैं जो इस देश को इंगलिस्तान बनाने तुले हैं..ठीक है..अंग्रेजी की अहमियत विश्व-पटल पर है पर इतना भी क्या कि अंगेजी पढ़ते बच्चों की मानसिकता के साथ संवेदना भी बदल जाए...आज के बच्चों  की अगर भूले से भी किसी अंधे या लंगड़े से पाला padपड़ जाए तो तुरंत वे कन्नी काट लेंगे ..बड़े ही संवेदनहीन हो गए हैं नए जनरेशन के बच्चे.. पुराने जमाने में तो आदमी के भीतर संवेदनाओं का सैलाब फूटा पड़ता था..जहां किसी अंधे को देखे कि तुरंत सड़क पार करा देते..ये अलग बात है कि इस सैलाब के चलते बेचारा अँधा कई बार दिगभ्रमित हो जाता कि एक्चुअल में उसे जाना किधर है...क्योंकि जैसे ही कोई उसे सड़क पार कराता, उधर से कोई अति संवेदनशील व्यक्ति फिर उसे वापस पार करा देता..और यह क्रम कई बार चल जाता तब अँधा सड़क छोड़ एक किनारे बैठ जाता.. और सड़क के सुनसान होने का इंतज़ार करता.. यही हाल लंगड़ों का था..सीढ़ी के नीचे है तो कोई ऊपर चढ़ा देता..और सीढ़ी से ऊपर है तो कोई बिना पूछे नीचे उतार देता..अंधे-लंगड़े को दिक्कत हो जाती पर उस जमाने के आदमी को ऐसा करने में कोई दिक्कत नहीं होती ..इतने संवेदनशील होते थे तब के आदमी ..अब तो कोई अँधा चीखता भी रहे कि सड़क पार करा दे..पर लोग हैं कि सुन के भी अनसुना कर निकल जाते हैं..
खैर छोडिये..तो हम अंधे और लंगड़े की दोस्ती की बातें कर रहे थे...बचपन में जब पढ़ा तो मन ने मान लिया कि ऐसा हुआ होगा..लेकिन आज पचास साल बाद न मालूम क्यों इस कहानी के पात्रों पर, स्क्रिप्ट पर.. घटना पर मुझे संदेह हो रहा है...समझ नहीं आता कि लेखक ने अंधे और लंगड़े की ही दोस्ती क्यों दिखाई ? जबकि अमूमन होता ऐसा है कि अंधे की दोस्ती अंधे से होती है..लंगड़े की दोस्ती लंगड़े से..गूंगे-बहरे की गूंगे-बहरे से..कई बार ऐसा मैंने खुद देखा-पाया है..गूंगे-बहरों की दोस्ती तो शायद कभी न भूल पाऊं...मेरे ही मोहल्ले में तीन कमाल के गूंगे-बहरे दोस्त हुआ करते थे..र्तीनों हमउम्र थे बीस-बाईस साल के...तीनों बड़े ही परिश्रमी.. पूरे दिन हाड-तोड़ मेहनत करते..और रात दस बजे तीनों खा-पीकर एक चौक में बने चबूतरे में बैठते...रोज मैं भी अपने एक अभिन्न मित्र के साथ वहां बैठ गप्पबाजी करता..तब तीनों को इशारों- इशारों से गप्पे मारते देखता..वे रोज दो-तीन घंटे वहां बैठते.. परिचित थे ..मिलते ही नमस्ते करते..उन तीनों के वार्तालाप देख हम चकित रह जाते..कभी-कभी तो एकाध गूंगा किसी देखे हुए पिक्चर की स्टोरी भी डायलाग सहित सुना देता..बाकी के दो आराम से समझ जाते..उन तीनों की दोस्ती देख मैं निहाल हो जाता..आज की तारीख में वे कहाँ है,पता नहीं..पिछले बीस-पच्चीस सालों से उन्हें नहीं देखा..
तो लेखक ने ये बेमेल दोस्ती क्यों कहानी में पिरोई - समझ नहीं आया..शायद इसलिए कि इन्हें  मेला देखने जाना था और एक दूजे का पूरक दिखाना था इसलिए या फिर अंधे की दोस्ती के जज्बे को दिखाना था इसलिए.. अब एक अँधा भला क्या मेला देखता ? लेखक ने यह कहानी उस दौर में लिखी होगी जब आवागमन का कोई साधन न था..ना तांगा-रिक्शा ना टेम्पो-बस ..बस खुदा के पास जाना है की तरह कुछ था तो पैदल ही था....बस-ऑटो होता तो अँधा या लंगड़ा दो रूपये दे अकेले ही मेला नहीं सटक लेता ? एक दूजे को ताकते ही क्यों ? तब न फोर लेन या सिक्स लेन सड़कें थी..पगडण्डी भी मुश्किल से मिल पाते थे ..वो भी उबड़-खाबड़..ऐसी स्थिति में बेचारा अँधा साठ किलो के लंगड़े को कंधे में बिठा कैसे मेला ले गया होगा..भगवान् ही जाने..और लेखक ने बताया भी नहीं कि मेला आठ किलोमीटर दूर था कि दस किलोमीटर.. कुछ भी हो यह दोस्ती की नहीं बल्कि अत्याचार की कहानी है..अंधे के कंधे में बैठ कोई उसे गधे की तरह हांकें तो इसे atyacharअत्याचार नहीं तो और क्या कहेंगे ? मुझे नहीं मालूम कि ये कहानी पंचतंत्र से है या जातक से अथवा किसी लेखक की मौलिक कहानी है..पर जो हो किसी न किसी ने तो इसे लिखा है ..उनसे क्षमा चाहता हूँ कि बैठे-ठाले मैं उनकी कहानी का कचूमर निकाल रहा हूँ..पर कहानी है मजेदार क्योकि जिस क्लास के बच्चो को यह पढाया जाता था , वे तो उस उम्र में दोस्ती का अर्थ भी नहीं जानते थे.. इसी कहानी के चलते आगे हिंदी में अंधे और लंगड़े की दोस्ती पर एक फिल्म बनी- दोस्ती जो सुपर-डूपर हिट हुई..लेकिन उसके बाद ऐसी कोई फिल्म नहीं आई..आई भी तो गाय और गौरी .. ´हाथी मेरे साथी .. धरम-वीर .. और  तोता = मैना की कहानी  जैसे आई..पर अंधे-लंगड़े की नहीं आई..
एक दिन यूं ही अपने तेरह वर्षीय नाती को यह कहानी सुनाया तो वह हंसते हुए बोला- ‘ ये भी कोई कहानी है नाना ? इससे अच्छा तो मैं लिख दूँ
मैंने कहा- ‘ अच्छा चलो ...इसी कहानी को अगर आप लिखते तो कैसा लिखते ? लिखकर बताईये ..’
‘ हाँ..लिख दूंगा..पर दोस्ती पर नहीं..दुश्मनी पर लिखूँगा..’ नाती ने शर्त रखते कहा.
‘ ठीक है..लिखो तो सही..देखूँ क्या लिखते हो आप ? ’
तब आधे घंटे में उसने कहानी लिखकर फेंक दी. कहानी पढ़ मेरे तो होश उड़ गए..अब आपके भी उडाऊं....कहानी यूं है---
 कई साल पहले मुंबई में दो डान हुआ करते थे-एक का नाम मोगेम्बो था..वह अँधा था..दूसरे का नाम डाबर -वो लंगड़ था..दोनों में पारंपरिक दुश्मनी थी..दोनों हत्या, डकैती, अपहरण और स्मगलिंग का धंधा करते..अक्सर एक-दूजे का ही माल लूट दुश्मनी को और मजबूत करते थे..अंधे के गिरोह में जितने भी थे सारे के सारे लंगड़ थे और लंगड़े के साथ जितने भी थे-सभी अंधे....दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने ऐसा किये थे..एक बार दोनों गिरोह की जमकर लड़ाई हुई..खूब गोलियां चली, हथियार चले पर अचानक पुलिस आ गई और दोनों गिरफ्तार हो गए..उन पर मुक़दमा चला और दोनों को फांसी की सजा हो गई..दोनों को एक साथ फांसी लगनी थी..नियत तारीख पर जब फांसी के पहले उनसे आखिरी इच्छा पूछी गई तो लंगड़े ने कहा कि मैं अंधे का पैर तोडना चाहता हूँ तो अंधे ने आखिरी इच्छा जताई कि लंगड़े की दोनों आँखें फोड़ना चाहता है ..
फाँसीघर में तैनात अफसर ने जल्लाद को इशारे किया कि लीवर खींच दो.. और धीरे से बुदबुदाया - साले दोनों पागल हैं.. और जल्लाद ने झटके से लीवर खींच दिया..दोनों लटककर तहखाने में चले गए..इसके साथ ही दोनों की दुश्मनी भी हमेशा-हमेशा के लिए दफ्न हो गई..
 अंधे और लंगड़े की नई कहानी गढ़ने की तत्परता के लिए मैंने उसकी पीठ ठोंकी और कहा- ‘ पर बेटा मुझे ये समझ नहीं आया कि तुमने दोस्ती की कहानी की जगह दुश्मनी की क्यों लिखी ?
उसने जवाब दिया- ‘ नाना.. मेरी दोस्ती मेरा प्यार अब गुजरे जमाने की बातें हैं..आज मेरे दु श्मन..तू मेरी दोस्ती को तरसे जैसे ज़माना है..सब यहाँ एक दूसरे की जान के दुश्मन हैं..कोई पीठ पीछे छुरा भोंक रहा है तो कोई सीधे सामने से..आप काउंट करके देख लीजिये ..जिंदगी में दोस्त ज्यादा हैं या दुश्मन ? इसलिए कहानी भी इसी तरह की बनेगी .. ‘
मैं निरूत्तर हो सोचने लगा- सचमुच आज के बच्चों में कैसा अनोखा बदलाव आ गया...मैंने तो इसकी उम्र में अंधे और लंगड़े की कहानी को एक्सेप्ट कर लिया था..उस पर कुछ टीका-टिपण्णी करने में पचास साल लग गए.. पर इसने तो सुनते ही रिएक्ट कर दिया...मैं मारल आफ द स्टोरी बदल रहा था..इसने तो स्टोरी ही बदल दी.. आज तक बच्चों के बारे में जो अनेक नीति वचन सुनता आया   बच्चे मन के सच्चे ..बच्चे देश का भविष्य .. बच्चे कल का भविष्य..,बच्चे भगवान का रूप अब इन सब पर संदेह होने लगा है...आनेवाले दिनों में ये कब क्या कर गुजरेंगे ? भगवान ही जाने...
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                                                         प्रमोद यादव
                                                  गयानगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़
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सफाई अभियान चालू आहे../ प्रमोद यादव


‘ देखोजी..लम्बा अरसा हो गया है भोपाल गए..बाबूजी का आपरेशन हुआ ,तब भी नहीं गए..अज्जू भैया का हाथ टूटा था तब भी नहीं जा सके..छुट्टी मिलेगी तो जायेंगे करते-करते  साल निकल गया .. कभी आपको मिलती है तो बच्चों की नहीं रहती.. बच्चों की रहती है तो आपको नहीं मिलती...समझ नहीं आता-आपने पुलिस की नौकरी ही क्यों ज्वायन की ? कहीं पटवारी होते तो ज्यादा अच्छा था..पैसे का पैसा और छुट्टी की छुट्टी....घर बैठे ही काम करो...लोगों को कागजी जमीन-नक्शा दिखाओ और दोनों हाथों से दिन-दहाड़े लूटो.. आजकल के पटवारी कम से कम करोडपति तो होते ही हैं..अखबारों में पढ़ी हूँ कि जब कभी किसी पटवारी के यहाँ रेड पड़ा..करोड़ों की संपत्ति तो मिली ही है.. इस पुलिसिया नौकरी में तो लाख भी नसीब नहीं..रिंकी बता रही थी कि कल गांधी जयंती से लेकर बकरीद तक पूरे छः दिनों की छुट्टी है..क्यों न हम इस लम्बी छुट्टी में भोपाल हो आयें..माँ की तबीयत भी इन दिनों ठीक नहीं है..देख आते..’ थानेदार की पत्नी ने पति के प्रवेश करते ही शिकायत और विनती के मिले-जुले स्वर में कहा.
थानेदार ने सिर से केप उतार खूँटी में टांग चुपचाप वर्दी उतारने लगा.
‘ अरे..क्या हुआ जी ? इतने गुमसुम क्यों हैं ? मैंने जो कहा आपने सुना ?..मैं छट्टियों की बात कह रही थी..’
‘ हाँ सब सुना..पुलिस से लेकर पटवारी तक..लाख से लेकर करोड़ तक...पर छुट्टी वाली बात सुनकर भी अनसुना करने को विवश हूँ....’
‘ क्यों ? ऐसी क्या बात हो गई ? छुट्टी न भी मिले तो इतना तो कर ही सकते हैं, कल गांधी जयंती की छुट्टी है तो आज रात की ट्रेन से चलकर छोड़ दो..कल रात की ट्रेन से लौट आना  फिर सन्डे-मंडे तो है ही छुट्टी..लेने आ जाना..बकरीद की शाम-रात तक घर...’
थानेदार ने बात काटते कहा- ‘ अरे कल ही की तो छुट्टी नहीं है...थाने जाना है.. एस.पी. आफिस जाना है...’
‘ क्यों ? ’ गाँधी जयंती में तो पूरे देश की छुट्टी रहती है..स्कूल-कालेज, बैंक-कारखाने..डाकघर-टेलीफोन...’
‘ पर इस बार नहीं है...’ थानेदार बोला- ‘ साठ-पैंसठ साल में जो नहीं हुआ वो सब अब हो रहा है..अरे याद नहीं अभी शिक्षक दिवस में जो हुआ..सारे बच्चे और शिक्षकों को अनिवार्य रूप से स्कूल अटेंड करने कहा... पी.एम. का भाषण सुनने कहा..चंडी गुरूजी कितने नाराज थे इस बात से..गुरुओं का एक दिन...वो भी राजनीति की भेंट चढ़ गया..’
‘ हाँ..याद है..सरकार बदलते ही सब बदला है..हमारे दिन भी कितने बदल गए.. न खाऊंगा- न खाने दूंगा के तहत हम कितने गरीब हो गए..केवल तनखा से  भला कोई घर चलता है ? वो भी पुलिसवाले का....’
‘ अब चलाना तो पड़ेगा ही..कुछ लिए-दिए तो समझो नौकरी से गए...भ्रष्टाचार के मामले में ये सरकार बहुत सख्त है..’ थानेदार ने समझाया.
‘ अच्छा छोडो इन बातों को...ये बताओ..इस बार क्या आदेश है ? क्या सारे देश वासियों को राजघाट बुलाया है ? क्या वहां पी.एम. ‘ वैष्णव जन वाला  भजन गायेंगे ? ‘ पत्नी कुछ विचलित होते बोली.
‘ अरे भागवान..तुम इन दिनों अखबार नहीं पढ़ती क्या ? कल से हमारे पी.एम. साहब पूरे देश में झाड़ू लगायेंगे..’
‘ अरे..तो फिर आप के लोग क्या करेंगे ? ‘ पत्नी हैरत से पूछी.
‘ हमारे लोग भी उनके साथ ताल से ताल मिला झाड़ू लगायेंगे..’ थानेदार बोला.
‘ अरे आप से मेरा आशय पार्टी से था..आपसे नहीं...खैर..बताइये..आप लोग क्या करेंगे ?
‘ हम लोग गांधीजी को याद कर रोयेंगे..और क्या ? ‘
‘ मैं कुछ समझी नहीं..क्या रोने का आदेश आया है ? ‘ पत्नी पूछी.
‘ अरे नहीं यार..पर जो करना है वो काम रोने जैसा ही है ..’
‘ क्या करना है ? ‘ पत्नी फिर पूछी.
‘ आफिस में , मोहल्ले में , उद्यान में.. मैदान में..सब जगह झाड़ू लगाना है..कल गांधी जयंती से पूरे देश में स्वच्छता अभियान चलाया जाएगा....पी.एम. साहब दिल्ली के बाल्मीकि मंदिर में झाड़ू लगा इस अभियान की शुरुआत करेंगे..’
‘ मैं तो पढ़ी थी की गांधीजी अहिंसा के पुजारी थे.. बिना तीर-तलवार के वे आजादी हासिल किये..तो उनकी जयंती पर सबसे पहले देश भर के हथियारों को नेस्नाबूद करने का अभियान छेड़ना चाहिए ..ये साफ़-सफाई भला क्या बला है ? ‘
‘ अरे तुम नहीं जानती..गांधीजी बड़े सफाई-पसंद इंसान थे.. अपने रोजमर्रे के जीवन में स्वच्छता का पालन करते थे..उनका हर चीज बिलकुल साफ़ होता था. धोती, चरखा, कपास, सूत...’ थानेदार ने पत्नी पर ज्ञान बघारा.
पत्नी ने भी ज्ञान बघारते कहा- ‘ हाँ..लेकिन उनकी लिखावट बेहद ख़राब थी...आप लिखे- खुदा बांचे की तरह..यहाँ पर वे मार खा गए..न मालूम कितने बार उनके गुरूजी ने उनकी कापी में लिखा होगा- साफ़ अक्षर में लिखो  खैर छोडो .. बताओ..कल आपका क्या प्रोग्राम है..?
‘ प्रोगाम क्या...पूरे दिन दफ्तर,गार्डन, परिसर, मोहल्ला, आस-पास के गाँव आदि में झाड़ू लगा कचरा साफ़ करना है..और ये अभियान पूरे एक महीने चलेगा..ऊपर से आदेश है..सब अधिकारी और कर्मी को अनिवार्य रूप से कल उपस्थित होकर स्वच्छता-शपथ भी लेना है..’
‘ अरे..तभी इन दिनों अखबार और टी.वी. में  देश के सारे मंत्री-संत्री और नेता लोग झाड़ू लगाते घूमते दीखते हैं..कोई मंत्रालय साफ़ कर रहा है तो कोई स्कूल..कोई एफ.सी.आई.तो कोई पोस्ट आफिस.. कोई नदी तो कोई नाला..ये क्या अभी रिहर्सल कर रहे हैं ? ‘ पत्नी ने सवाल किया.
‘ नहीं यार .. ऐसा कर ये बता रहे हैं कि सबको ऐसा ही करना है..डिमान्स्ट्रेशन दे रहे हैं..’
‘ तो ठीक है थानेदारजी ..आप पूरे शहर में झाड़ू लगाइये ..हम तो रोज ही ये काम करती हैं..आपको भी पता चले..साफ़-सफाई क्या बला  है ? हम तो अभी के अभी अगले ट्रेन से बच्चों के साथ मायके जा रही हैं..’
‘ ठीक है यार..चिढा लो..पर याद रखना झाड़ू लगाने में भी मुझे ईनाम मिलेगा..देख लेना..’
  और थानेदार की पत्नी मायके चली गई.  चार दिनों बाद बकरीद की रात जब लौटी तो पति महोदय घर पर नहीं थे.. घर को कुछ अस्त-व्यस्त सा देख उसे कुछ आशंका हुई..तुरंत उसने आलमारी खोली..ज्वेलरी वाला बाक्स गायब था..पत्नी के होश उड़ गए..पूरे पंद्रह तोला सोना..दो किलो चांदी..हीरे की अंगूठी..और अस्सी हजार रूपये नगद..सब के सब नदारत..तुरंत थानेदार  को मोबाइल लगाया..पर लाइन बीजी लाइन बीजी के सिवा कुछ नहीं आया..तब उसने एस.पी. साहब को फोन लगाया..उन्होंने रिसीव किया और बताया कि वे कल से पास के एक गाँव में साफ-सफाईअभियान में गए हैं..कल सुबह लौटेंगे..और बधाई दी कि आपके पति को बेस्ट परफार्मर(क्लीनर) का ईनाम मिला है..तब पत्नी चीखकर बोली- ‘ भाड में जाए ईनाम..अरे आप लोगों के साफ़-सफाई अभियान के चलते मैं साफ़ हो गई...मेरा घर साफ़ हो गया..मैं बर्बाद हो गई..’
एस.पी. साहब अकबका गए कि क्या हो गया ? जब बताया कि चोरों ने स्वच्छता अभियान के चलते उनका घर ही साफ़ कर दिया..सारे गहने साफ़ कर गए तो वे भौंचक रह गए..बोले- ‘ आप चिंता न करें..उन्हें अभी ही बुलाये देता हूँ.. पर तब तक आप इस बात का जिक्र किसी से न करें..मिडिया में बात जायेगी तो बात का बतंगड़ हो जायेगा..साफ़-सफाई अभियान के दौरान  एक पुलिस वाले के घर जमकर  सफाई..  सुनेंगे तो लोग हँसेंगे..’
‘हंसने वाला काम करेंगे तो लोग हँसेंगे ही..जब सारा देश इस अभियान में शरीक है तो चोर भला क्यों पीछे रहेंगे ? मैं कुछ नहीं जानती मुझे मेरा गहना चाहिए..चाहे आप दो या पी.एम...नहीं तो मैं दिल्ली जाकर हल्ला करुँगी..’ पत्नी गुस्से से बोली.
‘ अच्छा ठीक है..हम कुछ न कुछ करेंगे..पर आप मिडिया में न जाएँ..’ एस.पी. ने विनती की.
इस घटना के दो माह बाद ही थानेदार की पत्नी की भरपाई हो गई.. एस.पी. साहब ने थानेदार को तीन महीने के लिए न खाऊंगा-न खाने दूंगा मिशन से मुक्त कर दिया..पेट से दुगुनी क्षमता से रोज खाने का उसे अभयदान दिया.
अब थानेदार भी खुश है और उनकी पत्नी भी.
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                                                           प्रमोद यादव
                                                      गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़


एक ये भी दीवाली है.. / प्रमोद यादव


देखोजी..अब बहुत हो गया...साफ़-सफाई की बातें सुन-सुन मैं बोर हो गई..माना कि पी.एम. साहब ने अच्छी शुरुआत की लेकिन इस अभियान के लिए उन्हें किसी और का झाड़ू नहीं वापरना था..उन बेचारों ने तो देश में कुछ और ही साफ़-सफाई-अभियान का नारा भर लगाया था...थोड़े वे कमजोर क्या हुए,उनकी झाड़ू ही छीन लिए..ये तो निर्बल से लड़ाई बलवान की जैसे हो गया..
  तुम औरतों को तो झाड़ू के सिवा कुछ सूझता ही नहीं यार....जब देखो तब झाड़ू ही पीटती रहती हो..और फिर पी.एम.साहब ने तुम्हें कौन सा झाड़ू लगाने कहा है...उनकी दुश्मनी तो हम नौकरीपेशा वालों से है.. पति ने विचलित होते कहा.
हाँ..हमें तो शौक होता है झाड़ू लगाने का..आप लोग गन्दगी फैलाओ और हम घूम-घूम कर साफ़ करती रहें..औरतों की तो जैसे यही नियति है..पर भगवान् के घर देर है,अंध्रेर नहीं..उसने सुन ली....पिछले पंद्रह दिनों से आप झाड़ू लिए घूम रहे हैं..कभी दफ्तर तो कभी मोहल्ला ..कभी गार्डन तो कभी तालाब....क्यों ? अब मजा आ रहा है कि नहीं ? पत्नी मजाक उड़ाते बोली.
पति ने पलटवार करते कहा - हाँ..हाँ..क्यों नहीं आएगा मजा ? जब गांधीजी को आया तो हमें क्यूँ नहीं आएगा ? हम तो पी.एम. साहब के आभारी हैं...इसलिए नहीं कि उन्होंने झाड़ू थमाया बल्कि इसलिए कि इसी बहाने रोज अखबारों में हमारी बड़ी-बड़ी  फोटो छप रही है..मीडियावाले आगे-पीछे दौड़ रहें हैं...रोज ही कई चैनलों में इंटरव्यू आ रहे हैं...तुम लोग सदियों से झाड़ू लगा रही हो..बताओ.. क्या कभी किसी अखबार में तुम्हारी फोटो छपी ?..कभी किसी चैनल वाले ने घास डाली ? किसी ने इंटरव्यू लिया ?
बस..बस.. अब रहने भी दो..कितनी साफ-सफाई करते हैं..सब पता है हमें..खूब फोटो छपा ली आपने ... अब दीवाली करीब है..थोड़ी बहुत नोट भी छापो..
क्या मतलब ? पति चौंका.
अरे भई... मतलब ये कि लक्ष्मीजी के आगमन की तैयारी करो..थोड़ी जेब ढीली करो और घर की साफ़-सफाई में लग जाओ..आफिस साफ़ करने के लिए और भी लोग हैं..और फिर सरकारी जमादार और चपरासी तो हैं ही..कब तक इन्हें दामाद की तरह बिठाए रखोगे ? एक दिन की छुट्टी लीजिये और लग जाइए काम पर...ऐसे कबाड़ भरे घर में कहीं लक्ष्मी आएगी ?
अरे यार..हर साल का तुम्हारा यही डायलाग रहता है... बीते साल तो तुमने अकेले ही निपटा दिया था..इस बार भी निपटा लो न .. आफिस से छुट्टी मिलना मुश्किल लगता  है.. पति ने विवशता बताई.
नहीं जनाब...बीते साल मेरा भाई यहाँ था तो उसने हेल्प का दिया था...मेरे अकेले के बस का नहीं..मर जाऊँगी..अब साफ़-सफाई,रंग-रोगन तो होना ही है..चाहे आपको छुट्टी मिले,न मिले..मुझे तो बस एक अदद मददगार चाहिए..और आज के आज ही चाहिए..परसों तो दीवाली है..लक्ष्मी-पूजा है..दो दिन में ही सब करना-धरना है..
पति चुप रहा.. आफिस जाने के लिए कपडे पहनने लगा...पत्नी टिफिन देते बोली- मेरी बातें आपने सुनी भी या इस कान से सुन उस कान से निकाल दी ? पत्नी याद दिलाते बोली पर पति गहन चिंतन जैसी मुद्रा बना सटक लिया..
 दोपहर बारह बजे जब निकी स्कूल से लौटा तो दरवाजे पर उसके पीछे एक दुबला-पतला ,गोरा-नारा अजनबी युवक खड़ा दिखा .. उसे देखते ही वह पूछ बैठी-- साहब ने भेजा है ?
उसने सिर हिलाया.
अच्छा-अच्छा पहले अन्दर आओ..सबसे पहले तो अपना नाम बताओ..
लक्ष्मी.. अजनबी युवक ने जवाब दिया.
वह मन ही मन हंसी कि पतिदेव को हमेशा मजाक ही सूझता है..लक्ष्मी आने की बात की तो उन्होंने लक्ष्मी ही भेज दी..
पूरा नाम बताओ भई..
जी..लक्ष्मी नारायण... उसने बताया.
ठीक है लक्ष्मी..मैं एकदम ही शार्ट में काम समझा देती हूँ..यहाँ एक बेडरूम,एक हाल,एक किचन और एक बाथरूम है ...एकदम ही चिड़िया के घोसले के माफिक घर है..तुम झटपट काम करो तो हो सकता है-आज ही साफ़-सफाई कम्प्लीट हो जाए..कल का दिन रंग-रोगन के लिए रखेंगे ..सबसे पहले तुम बेडरूम चलो....वहां दुनिया भर का  कबाड़ जमा है..पहले वो.फिर बाकी बाद में...
जी... कहते लक्ष्मी घर की लक्ष्मी के पीछे-पीछे चलने लगा.
देखो लक्ष्मी...ये हमारा बेडरूम है..ये नीलीवाली गोदरेज की अलमारी को छोड़ बाकी सबकी साफ़-सफाई करनी है...समझ गए ना ?
उसने फिर सिर हिलाया.
तो चलो ..तुम यहीं से शुरू हो जाओ.. निकी हाल में बैठकर होमवर्क कर रहा है.. फिर खाना खाकर ट्यूशन जाएगा..तब तक मैं नहा लेती हूँ.. सब समझ गए न ?
उसने तीसरी बार सिर हिलाया.
नहा-धोकर गृहलक्ष्मी जब बाथरूम से निकल बेडरूम की ओर बढ़ी तो अचानक निकी सामने आ गया...
 भूख लगी है बेटे ? अभी खाना लगाए देती हूँ
नहीं मम्मा..अभी-अभी दो बड़े साइज के कैडबरी खाए हैं..भूख नहीं..
; कैडबरी ? किसने दिए ? गृह लक्ष्मी चौंकी.
अंकल ने..
कौन अंकल ने ?
अरे वही जो घर की साफ़-सफाई करने आये थे..
आये थे से क्या मतलब ? वह फिर चौंकी.
मतलब कि वो हमें चाकलेट दे के बाहर चले गए.. निकी बोला.
सुनते ही गीले कपड़ों में ही वह बेडरूम की ओर भागी..दरवाजा खुला था..सब कुछ अपने ठीक-ठिकाने पर दिखा, उसे हाय लगा... पर ज्यों ही आलमारी की ओर आँख गई ..उसकी आँखें खुली की खुली रह गई..चीख सी पड़ी- हाय मैं लुट गई...बर्बाद हो गई.. आलमारी से जेवरों वाला ब्रीफकेस गायब था.. बाकी सब कुछ यथास्थान था,जैसे किसी ने छुआ तक न हो .उसने तुरंत पति को मोबाइल किया..किन्तु इंगेज मिला...फिर लगाया..तब भी इंगेज..वह परेशान हो गई कि अचानक उनका ही फोन आ गया..वह कुछ बताती कि उसके पहले ही उधर से आवाज आई- यार पिंकी...तुम्हारे लिए खुश खबरी... बॉस तीन दिनों के लिए बाहर गए हैं.. आफिस का चपरासी बहुत ही कम पैसों में मान गया है.. अब दो दिन वह तुम्हारे साथ घर की साफ़-सफाई करेगा..अब तो खुश ?
क्या खाक खुश ?..सब कुछ तो साफ़ हो गया..अब उसकी क्या जरुरत ?.... इतना कह वह रोने लगी.
पति के बार-बार पूछने पर जब उसने सच्चाई बयान की तो उसे ढाढस देते पति ने कहा- रोओ मत यार...जो हो गया सो हो गया...हम आज के आज ही तुम्हें सारे जेवर फिर से खरीद देंगे..
इतना बड़ा हादसा हो गया और आपको मजाक सूझी है.. पत्नी विलाप करते-करते बोली.
अरे मजाक नहीं...सच कह रहें हैं..
क्या कोई लाटरी लगी है ? पत्नी गुस्से से बोली.
हाँ...यूं ही समझ लो...दरअसल आज जल्दी-जल्दी में हम आफिस के ब्रीफकेस की जगह तुम्हारे जेवर वाले ब्रीफकेस ले के आ गए...अभी-अभी जब.पेमेंट-स्लिप खोजने उसे  खोला तब पता चला..कितने दिनों से हम कह रहे थे - एक जैसे ब्रीफकेस होने से किसी न किसी दिन धोखा हो जाएगा...और देखो आज हो भी गया...पर शुक्र मनाओ यह धोखा बड़े अच्छे दिन हुआ..आज ये धोखा नहीं होता तो इस दीवाली में हम दोनों घर में बैठे ड्युएट गाते रहते- एक वो भी दिवाली थी...एक ये भी दिवाली है..उजड़ा हुआ गुलशन है..रोता हुआ माली है   अब चलो मुस्कुराओ..हम जल्द ही लक्ष्मी को लेकर घर आते हैं ..
कौन लक्ष्मी ? पत्नी घबराकर पूछी
अरे वो नहीं जो तुम समझ रही हो...वो बेचारा तो आफिस के पेपर्स देख कहीं सिर धुन रहा होगा..हम जेवरों की बात कर रहें...रुपयों-पैसों की बात कर रहे हैं..जिसे खोकर तुमने फिर से पा लिया..सचमुच लक्ष्मी जी तुम पर मेहरबान है..हम अभी आते हैं....शुभ- दीवाली ...
आपको भी जी...लक्ष्मी जी सदा सहाय करे..यही दुआ है हमारी ..जल्दी आईये आज आपको नाश्ते में स्पेशल नाश्ता दूंगी..
नाश्ता तो मोबाईल पर ही दे दो यार....हमें तो आज   स्पेशल डिश खाने की इच्छा है..
धत...बदमाश कहीं के... पत्नी ने शरमाते हुए फोन काट दी.

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                                                    प्रमोद यादव
                                              गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़
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