भाईजी
की मूर्ति/ प्रमोद यादव
बरसों पहले की बात है, मेरे शहर में एक
सज्जन हुआ करते थे और दुर्भाग्य से वे आज भी हुआ करते हैं.. ‘दुर्भाग्य ‘ इसलिए कि इन सज्जन को अपने मरने
के बाद की कुछ ज्यादा ही चिंता रहती थी लेकिन अब तक मर नहीं पाए हैं. मरने के बाद
का सारा इंतजाम किये बैठे हैं और मौत है कि पास ही नहीं फटकती. मजाल है कि भाईजी
कभी बीमार पड़े हों..पिछले पन्द्रह सालों से देख रहा हूँ- क्या होली, क्या दिवाली,
क्या क्रिसमस, क्या मुहर्रम, क्या गरमी-सर्दी और क्या पतझर-बरसात.....सब गुजर जाते
हैं..और भाईजी इन सबसे अछूते ही रह जाते. जब भी उन्हें पाया,तंदुरुस्त पाया,अपने
लाज के मुहाने पर पालथी मारे पाया.
तो किस्सा ये है कि
एक दिन भाईजी ने पूरे शहर में खलबली मचा दी. उनका लाज और वे स्वयं चर्चा के विषय
बने थे. हुआ यूँ था कि लाज के प्रवेश-द्वार पर उन्होंने स्वयं की एक भव्य विशालकाय
मूर्ति लगवा रखी थी. मूर्ति आधी
थी(पासपोर्ट साइज़ वाली) पर बात पूरी करती थी. हू-ब-हू भाईजी लगते. वही भारी-भारी मूंछे, बड़ी-बड़ी उल्लू
जैसी पनीली आँखें, गोल-मटोल फ़ुटबाल- से सिर पर गाँधी टोपी...देखने वालों की भीड़
उमड़े पड़ रही थी. उत्सुकतावश मैं भी लाज पहुंचा. बाजार-सा माहौल था वहाँ...लोग
चार-चार,पांच-पांच की टोली में आसपास बिखरे, कहकहे लगाते ,लुत्फ़ उठाते बार-बार कभी
भाईजी को तो कभी उनकी मूर्ति को निहार रहे थे और भाईजी थे कि हमेशा की तरह गेट पर
पालथी मारे भीड़ देख मंद-मंद मुस्कुराते,
मोटी- मोटी मूछों को ऐंठ
रहे थे, मानों कह रहे हों- ‘ लो बादशाहों, इस गरीब शहर के लिए मैंने एक अदद मूर्ति तो
बनवा दी अब सही जगह पर लगवाना तुम लोगों का काम. ‘
उन दिनों शहर में केवल एक मूर्ति खड़ी थी- गांधीजी की मूर्ति. उसे भी न मालूम कैसे
शहर के एक नामी डाक्टर ने अपने स्वर्गीय बाप की याद में बनवाया था. मैं आज तक समझ
नहीं पाया कि डाक्टर ने बाप की याद में
गाँधी की मूर्ति क्यों बनवाया? बाप की ही बनवा लेता, खर्च तो उतना ही पड़ता. भाईजी
की मूर्ति देखने के बाद वे अपनी गलती और मूर्खता पर जरुर पछताए होंगे.
भाईजी की
मूर्ति और भाईजी को देखने वालों की भीड़ दिन-ब-दिन बढती जा रही थी. लाज में
ठहरनेवालों को इस मूर्ति ने काफी तकलीफ
में डाल दिया था...गेट से आना-जाना मुश्किल हो गया था. भाईजी के बेटों की हालत तो
सबसे ज्यादा खराब थी. यार-दोस्त उन्हें चिढाते, बाप की बेवकूफी पर ताना मारते, मजाक
करते, कहकहे लगाते. पर बेटे बेचारे तो बेटे ही थे, बाप से डरते, हिचकते. तनिक भी
विरोध न कर पाते. पहले ही दिन जब बड़े बेटे ने विरोध दर्ज कर भाईजी को समझाया कि
जीते जी अपनी मूर्ति लगाना अच्छी बात नहीं तो भाईजी तमक गए थे- ‘मूर्ति तेरी है क्या?...नहीं,
तुमने बनवाई क्या?.... नहीं, ये लाज जहाँ लगी है, तेरा है क्या?..... नहीं...जब
कुछ भी तेरा नहीं तो तुझे कुछ बोलने का भी हक नहीं....समझे? ‘
उनके बेटों ने काफी समझाया-
मूर्ति बनवा ली, अच्छा किया लेकिन इसे अभी न लगवायें, हटवा दें पर भाईजी टस से मस
न हुए. बेटों ने यहाँ तक कहा कि इस तरह मूर्ति बनवाकर आप हम सब पर अविश्वास जता
रहें हैं...लोग हमें क्या-क्या नहीं सुना रहे ...सब हम पर हंसते और कहते हैं कि
भाईजी को अपने बेटों पर विश्वास नहीं, इसलिए मूर्ति एडवांस में बना रखी है.
बेटों के विरोध का
उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा. उलटे वे तर्क देते रहे कि जब एक आदमी जीतेजी अपनी फोटो
खिंचवाकर घर, दुकान में टांग सकता है तब तो उन्हें कोई कुछ नहीं कहता..मैंने अपनी
मूर्ति बनवा ली तो क्या गुनाह हो गया? .मैंने तो एक तरह से तुम लोगों का और
शहरवासिओं का एक बोझ हल्का कर दिया है- अपनी मूर्ति बनवाकर...अब तुम्हारा काम तो
यही रह गया है- सही जगह पर इसे लगाना.
बड़े बेटे ने तर्क दिया- ‘ वो तो ठीक है बापजी...पर आपका
काम अभी अधूरा है..क्या आपको यह भी बताना पड़ेगा कि मूर्ति लगवाने के लिए आदमी का
स्वर्गीय होना एक अहम अनिवार्यता है. ‘
भाईजी चिढ गए, गुस्से
से बोले- ‘ अपने
बाप के विषय में ऐसी बाते सोचते तुम्हे शर्म नहीं आती? ‘
छोटे बेटे ने जवाब दिया- ‘शर्म की क्या बात है बापजी..आपको
अपनी मूर्ति बनवाते शर्म आई क्या? हम लोगों को तो अब लाज में घुसते शर्म आती
है..किसी तरह घुस भी जाते हैं तो निकलते शर्म आती है..लोग अजीब नज़रों से घूरते
हैं, हम पर हंसते और कहते हैं- ये हैं भाईजी की औलाद.. जो जीतेजी बाप की मूर्ति
लाज में लगा रखी है....च्च.. च्च... च्च...आज के बाप भी कितने स्वार्थी होते
हैं...अपनी भर बनवा ले आये..बच्चों ने क्या बिगाड़ा था? उनकी भी बनवा लाते..थोक में
कुछ सस्ता भी पड़ जाता ‘
भाईजी की तनी भृकुटियां एकाएक सामान्य हो गयी. मुस्कुराते हुए बोले- ‘ तो बच्चू, यूं कहो न कि
तुम्हारी मूर्ति नहीं बनवाई इसलिए जल-भून रहे हो..ठीक है..अगली बार कलकत्ता गया तो
देखूंगा ‘
बेटे सिर थामकर बैठ गए. उन्हें समझाने
में सारी ऊर्जा चूक गयी. दोनों बेटे अब लाज का काम छोड़ यही मीटिंग करते कि मूर्ति
किस तरह से हटाई जाए. भीड़ थी कि कम होने का नाम नहीं ले रही थी. अखबारवालों ने भी
काफी छापा... भाईजी की फोटो, मूर्ति की फोटो, लाज की फोटो, भीड़ की फोटो....और
भाईजी रोज कटिंग काट-काट कर इकट्ठी करते रहे- मानों सर्टिफिकेट्स हों. बेटे
झल्लाते और वे गदगद होते.
नगरवासियों का यह
मनोरंजक कार्यक्रम अपनी चरम सीमा पर था कि एकाएक फिर खलबली मची. पूरे नगरवासियों
के चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थी..सब उदास थे..खबर थी कि भाईजी की मूर्ति चोरी हो
गयी...उन्हें ‘ अटेक
‘ आ गया. वे तुरंत समझ गए
कि यह नालायक बेटों की करतूत होगी. बहुत ही नाजुक हालत में अस्पताल लाया गया. बेटे
करीब थे और भाईजी मरणासन्न ....फिर भी हकला- हकला कर बोल रहे थे- ‘ कमीनों.. आखिर तुम लोगों ने
मुझे मार ही डाला...अब तो खुश हो ना?... मेरे पास वक्त बहुत कम है...काम की बात
करूँ...बताओ मरने के बाद मेरी मूर्ति कहाँ लगवाओगे? वैसे गाँधी चौक के पहले
बोथराजी की दुकान वाला चौक थोडा गुलजार चौक है, वहीँ किसी मंत्री को बुलाकर लगवा
लेना...’
‘ बापजी...चुप भी
रहिये...डाक्टरों ने बोलने से मना किया है..आपकी हालत अच्छी नहीं...यूँ ही बोलते
रहे तो सचमुच....’
‘ हाँ... सचमुच..अब जीकर भी क्या
करूँगा... हाय..मेरी मूर्ति...उसी में तो मेरी जान थी...कितने प्यार से बनवाया
था...आह....आह....’
‘
डाक्टर.... डाक्टर...’
बेटों ने चिल्लाया. डाक्टर दौड़े..नब्ज देखे. तभी पुलिस के तीन जवान धडधडाते घुस
आये- ‘भाईजी .. भाईजी...आपकी
मूर्ति मिल गयी..हमने चोरों को गिरफ्तार कर लिया है..’
सुनना भर था कि भाईजी ऐसे उठ खड़े हुए जैसे उन्हें कुछ हुआ ही ना था- ‘ कहाँ है मेरी मूर्ति?...मेरी
जान...’ इधर भाईजी का उठना हुआ
और उधर बेटों का गिरना. दोनों बेटे माथे पर हाथ धर बैठ गए.
आज भी भाईजी ज़िंदा हैं ... मूर्ति सलामत है..लेकिन अब लाज के गेट नहीं, घर के
भीतर कहीं है.. भाईजी को इंतज़ार है मौत
का... मूर्ति को इंतज़ार है चौक का और बेटों को
इंतज़ार है इस पागलपन के चक्कर से उबरने का.. .और तीनों पन्द्रह साल से जहाँ
का तहां हैं..कुछ भी नहीं बदलता. कुल मिलाकर ये प्यारा शहर एक अदद मूर्ति से वंचित
रह गया.
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प्रमोद
यादव
दुर्ग,छत्तीसगढ़, भारत
निगोड़े-भगोड़े/
प्रमोद यादव
पूरी निष्ठां और ईमानदारी
के साथ लगभग नियमित भागने का जो कर्म करता है-उसे भगोड़ा कहते हैं. भगोड़ों के
क्षेत्र अलग-अलग हो सकते हैं पर कर्म सबका एक जैसा होता है.कोई स्कूल-कालेज से
भागता है तो कोई फैक्ट्री-आफिस से,कोई पत्नी-परिवार से, तो कोई दुनिया-जहाँ से.
भागने का सुख अपार है तो दुःख भी कुछ कम नहीं( दुःख तभी जब भागते हुए पकडे जाएँ).
मेरे एक मित्र ने अपने एक भगोड़े अफसर की सच्ची कहानी के कुछ सुपर कारनामे बताये तो
सुनकर मैं दंग रह गया. प्रस्तुत है-उस निगोड़े-भगोड़े अफसर की सच्ची कहानी- मित्र की
जुबानी.
बड़े कड़क किस्म के अफसर थे
डाक्टर सिन्हा.(होम्योपेथी के डाक्टर थे) तीन शिफ्टों में ड्यूटी करते थे हम- ‘ए’ शिफ्ट( सुबह छः बजे से दोपहर दो बजे तक), ‘बी’ शिफ्ट(दोपहर दो बजे से रात दस
बजे तक) और ‘नाईट
शिफ्ट ‘ (रात दस बजे से सुबह
छ्ह बजे तक). सिन्हा साहब भी हमारे साथ शिफ्ट ड्यूटी करते. छुट्टी के मामले में बड़े
‘ किच्चक ‘ थे वो.ब्रिगेड का कोई लड़का कभी
छुट्टी मांगता या समय से पहले जाना चाहता तो छुट्टी की जगह अक्सर लेक्चर ही देता.
बड़े प्यार से कहता- ‘ देखो
बेटा, भागना बुरी बात है.. आज काम से भागोगे, कल परिवार से, नाते-रिश्तेदार
से..फिर संसार से....भागना- विनाश की ओर जाना है...आज तुम्हे छोड़ दूँगा तो कल कोई
दूसरा भागेगा...फिर तीसरा...चौथा...सबके सब भागोगे तो काम का क्या होगा? कंपनी का
क्या होगा? कंपनी डूब जायेगी तो तनख्वाह कैसे मिलेगी? तनख्वाह न मिली तो परिवार
कैसे चलेगा? भागने का ख्याल मन से बिलकुल निकाल दो बेटा, दोबारा मत आना...जाओ अपना
काम करो...’
हर छुट्टी मांगने वाले
को वह यही नसीहत देता. पूरा ब्रिगेड उससे खार खाए बैठा था, भागने का कार्यक्रम
पूरी तरह बंद जो था. सभी मौके की तलाश में थे कि कब ऊंट पहाड के नीचे आये
धीरे-धीरे ब्रिगेड के मित्रों ने उनकी पल-पल की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की. ‘ए’ शिफ्ट और ‘नाईट शिफ्ट ‘ में तो वे पूरे शबाब के साथ पूरे समय नजर आते पर ‘बी’ शिफ्ट में वे संदिग्ध दिखते.
शाम चार बजे से रात नौ बजे तक अक्सर वे गायब मिलते. दोपहर दो बजे बिलकुल टाईम से
पहुचते. दो घंटे इधर-उधर घूमकर जल्दी-जल्दी काम निपटाते और चार बजते तक छूमंतर हो
जाते. ब्रिगेड को बताते जाते कि अमुक जगह पर चल रहे काम को देखने जा रहे या फिर
कभी कहते- पुराने विभाग के दोस्तों से मिलने जा रहे हैं.
शुरू-शुरू
में किसी ने ध्यान नहीं दिया. उनका टिफिन का डिब्बा और एक अदद पढ़ने का चश्मा टेबल
पर उनकी उपस्तिथि दर्ज कराते पड़ा रहता. यह क्रम जब कुछ अनवरत-सा हुआ तो एक दिन
ब्रिगेड के कुछ जांबाजों( बदमाशों ) ने हिम्मत कर उस टिफिन-बाक्स को खोल ही
डाला..देखा तो चकित रह गए....अंदर का स्टील-वाला भाग दर्पण की तरह चमचमाता दिखा,
जैसे अभी-अभी ख़रीदा हो. संदेह पुख्ता हो गया. तीन-चार दिनों तक लगातार टिफिन-बाक्स
खोल देखते रहे...अंदर का स्टील-वाला भाग हर बार चमचमाता रहा. सब जान गए कि टेबल पर
रखा टिफिन ‘ डमी ‘ है और चश्मा भी ‘ डमी ‘ है. ओरिजनल टिफिन को वह स्कूटर
की डिक्की में रखता और ओरिजनल चश्मे को सफारी के जेब में. रात नौ-साढ़े- नौ के
आसपास डमी टिफिन और चश्मे को आलमारी में बंद कर फुर्र हो जाता. फिर दूसरे दिन लंच
के बाद, तीन बजे के आसपास चुपके से ‘ डमी ‘टिफिन और चश्मे को टेबल पर ‘फ्लावर-पाट’ की तरह सजा देता ताकि मातहतों को लगे कि साहब यहीं
कहीं आसपास ही है.
पूरा ब्रिगेड उससे नाराज था , सभी चिढे
थे उनसे. एक दिन ब्रिगेड के दो उस्तादों ने तय किया कि आज इनका पीछा कर,इनकी ‘वाट’ लगायी जाए. चार बजे के आसपास
जैसे ही वे अपनी स्कूटर निकाल बोले कि
पुराने विभाग के दोस्तों से मिलने जा रहा हूँ- दोनों ने अपनी स्कूटर उनके
स्कूटर के पीछे लगा दी...और लगे पीछा करने. सिन्हा साहब अपनी धुन में सीधे मेनगेट
पहुंचे और बाहर निकल फुर्र हो गए. दोनों जांबाज चकित हुए..लेकिन पीछा कर भांडा तो
फोडना ही था..सो पीछे-पीछे चलते गए. थोड़ी देर में देखा- साहब अपने कंपनी- क्वार्टर
में दाखिल हो रहे हैं. दरवाजे से लगा एक अतिरिक्त कमरा और था जिसमे डाक्टरों-वाला ‘ प्लस ‘ का बोर्ड टंगा था. कमरे का
दरवाजा अधखुला-सा था. अंदर दो-तीन लोग बैठे थे. थोड़ी दूर में स्कूटर खड़ी कर दोनों
सोचने लगे कि अब आगे क्या करें? फिर देखा- साहब बगलवाले गैरेजनुमा अस्पताली कमरे
में दाखिल हो रहे हैं. तुरंत रणनीति बनी कि दोनों में से एक ‘ पेशेंट ‘ बने और दूसरा ‘ अटेंडेंट ‘. दोनों इंतजार करते खड़े रहे कि अंदर के पेशेंट बाहर आयें
तो वे अंदर
जाएँ. लगभग घंटे भर बाद
जब इत्मीनान हो गया कि अंदर अब कोई नहीं , दोनों सपाटे के साथ दाखिल हो गए. देखते
ही सिन्हा साहब चौंके-‘ तुम लोग... तुम लोग यहाँ कैसे आये? तुम दोनों को तो अभी
प्लांट में होना था..’
अटेंडेंट बने कर्मी ने मन ही मन कहा-साले...प्लांट में तो तुझे भी होना था..धीरे
से जवाब दिया- ‘ बहुत
सीरियस केस है साहब..एकाएक इसके पेट में असहनीय दर्द उठा...आपको ढूंढे, आप नहीं
मिले..आपके पुराने विभाग भी गए...मालूम हुआ, वहाँ तो आप महीनों से नहीं आये... दर्द
बढ़ता ही जा रहा था..मेनगेट खुला दिखा तो सोचा- बाहर किसी को दिखा देंगे...इधर से
गुजर रहे थे कि आपके क्वार्टर का दरवाजा खुला दिखा ...सोचा कि सौभाग्य से कहीं आप
घर पर हों तो आपको ही दिखा दें....इसलिए चले आये..’
‘ठीक है... ठीक है...चलो, इसे
बेंच में लिटा दो...देखता हूँ...वो क्या है ना.. आज सुबह तुम्हारी भाभी की तबियत
ठीक नहीं थी..इसलिए देखने आ गया था..’
अटेंडेंट बने दोस्त ने अँधेरे में तीर फेंका, बोला- ‘ डाक्टर साहब...मेरा एक दोस्त
राहुल आपके पीछे वाली स्ट्रीट में रहता है,..वो तो कहता है ,अक्सर इस समय आप यहीं होते हैं....’इतना सुनना भर था कि उनका रंग उड़
गया...बात को अनसुनी कर..बहुत ही बेमन और बेदर्दी से उस पेशेंट दोस्त के पेट को
पिचकता रहा, पूछता रहा- क्या खाए हो? कब
खाए हो? कहाँ खाए हो? गनीमत कि ये नहीं पूछा -क्यों खाए हो? फिर साबूदाने की( होम्योपेथी की) कुछ गोलियाँ
उसके मुहं में उंडेल दी और उसे उठ जाने को कहा. दोनों को सामने की कुर्सी पर प्रेम
से बिठाया और अपनी आवाज में शहद घोलते कहा- ‘देखो बेटे...मैं कोई तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ... तुम ही
लोग तो मेरे अपने हो....मेरे दिल के एकदम करीब...कभी प्लांट से बाहर जाना हो तो चुपचाप
मुझे बताकर चल दिया करो...पर वन-बाई-वन...एक दिन तुम....तो एक दिन तुम...लेकिन
ब्रिगेड के किसी भी कर्मी से इस बात का जिक्र मत करना...इसी शर्त पर भागने दूँगा..’
अंधा क्या
मांगे-दो आँख..दोनों दोस्त गदगद हो, खुशी से झूमते जाने लगे तो साहब बोले- ‘ अरे भई..फीस तो देते जाओ...घोडा
घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या? ‘ अटेंडेंट बने गधे
ने बड़े बेमन से उस घोड़े को बीस का नोट थमाया.
थोड़े ही दिनों में एक नया तमाशा
शुरू हो गया....दोनों दोस्त वन-बाई-वन
भागने लगे. ब्रिगेड के बाक़ी लोग ...हैरान...परेशांन...माजरा
समझने एक दिन सभी ने उन दोनों को खूब चमकाया और सीधे जी.एम्. को बताने की बात कही
तो दोनों ने पूरी घटना की उलटी कर दी . कुछ लोगों ने त्वरित गति से पूरी घटना की
जानकारी जी.एम् साहब को दे भी दी. सुनकर वे बौखला गए, पूछा- रोज भागकर सिन्हाजी करते
क्या हैं? एक ने तुरंत जवाब दिया- ‘ साबूदाना बेचते हैं सर...’ जी.एम्. चौंके- ‘ साबूदाना....व्हाट
साबूदाना..? तब कर्मियों ने बताया कि वे होम्योपेथी के डाक्टर हैं..
शिकायत की तस्दीक करने तीन-चार
दिन जी.एम् साहब उसी समय वहाँ पहुँचते जब
डाक्टर साहब नहीं होते . चौथे ही दिन उन्हें उनके भगोड़े होने का पूरा विश्वास हो
गया.
एक दिन जी.एम् साहब ने ब्रिगेड के सभी साथियों को डाक्टर सिन्हा के आफिस में
रात नौ बजे इकट्ठे होने का आदेश दिया और ठीक नौ बजे वे स्वयं वहाँ पहुँच, उनकी
कुर्सी पर बैठ गए. पांच मिनट बाद ही डाक्टर सिन्हा कुछ गुनगुनाते- गुनगुनाते आफिस
में घुसे तो कुर्सी पर जी.एम् को बैठे देख
सकपका गए... कुछ बोल पाते कि उसके पहले ही जी.एम् साहब उबल पड़े-‘ तीन घंटों से यहाँ बैठा
हूँ...आपके इंतजार में...कहाँ थे आप अब तक?’ ब्रिगेड के सारे लोगों को देख उनकी बोलती बंद हो
गयी....फिर धीरे से फुसफुसाया-‘ यहीं तो था सर...देखिये न...मेरा टिफिन , चश्मा..सब यहीं
रखा है..’ इतना बोलना भर था कि
जी.एम् साहब चीख पड़े- ‘ ये टिफिन- चश्मा वाली सब कहानी .मालूम है.. मत सुनाओ
मुझे.. शर्म आनी चाहिए आपको...आपसे लाख दर्जे अच्छे तो ये नान-एक्स हैं जो जी-जान
से काम करते हैं..कभी इधर-उधर नहीं भागते और आप अफसर होकर टुच्चा काम करते हैं?
भगोड़े आदमी मुझे कतई पसंद नहीं..कल सुबह तक आपको ट्रांसफर आर्डर मिल जायेगा..
उठाईये अपना ये टिफिन- चश्मा..और दफा हो जाईये..’
एक सन्नाटा-सा पसर गया आफिस में.
चुपचाप वे टिफिन- चश्मा बटोरने लगे. ब्रिगेड के सारे लोग उनके ‘ बे-आबरू होकर तेरे कूचे से...’वाली सूरत देख अंदर ही अंदर गदगद हो रहे थे.
दूसरे दिन उनका ट्रांसफर
एक ऐसे विभाग में हो गया जिसका नाम सुन कई विभाग दूर भागते हैं. टोटल चार लोगों का
स्टाफ था वहाँ. महीने भर बाद वही दोनों दोस्त (पेशेंट- अटेंडेंट) नई
स्तिथि-परिस्तिथि का जायजा लेने उनके विभाग में गए तो देखा-फिर वही डमी टिफिन
और चश्मा..उनके टेबल पर पसरा मुस्कुरा रहा
था. वहीँ के एक चपरासीनुमा अफसर से उनके विषय में पूछा तो मालूम हुआ-‘ पुराने विभाग के मित्रों से
मिलने गए हैं ‘
सुनकर दोनों अपनी हंसीं रोक नहीं पाए....उलटे पांव लौटे और घंटों पागलों की तरह
हँसते रहे
दोस्त की कहानी के चक्कर
में भूल रहा हूँ कि आज बुधवार है...आज मेरी बारी है....अब ये मत पूछिए कि भागकर
मैं क्या करता हूँ....हाँ..इतना निश्चित मानिये- मैं साबूदाना नहीं बेचता... मैं
साबूदाना नहीं बेचता....
xxxxxxxxxxxxxx
प्रमोद यादव
दुर्ग, छत्तीसगढ़, भारत
मोबाइल-०९९९३०३९४७५
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