Friday, 12 September 2014

टाईम पास टीचर / प्रमोद यादव


रामलाल मिडिल स्कूल में पी.टी.आई.है सुबह-सुबह रोज विद्यार्थियों को एक-डेढ़  घंटे सुर-ताल से पी.टी. कराकर फ्री हो जाता है. उसका फ्री होना स्कूल के बाकी टीचर्स को खूब अखरता है. वे बेचारे छः-छः पीरियेड पढ़ाकर तनखा पाते हैं और पी.टी.आई. एक-डेढ़ घंटे सावधान-विश्राम कर पा लेता है. बाक़ी टीचर्स काफी मेहनत-मशक्कत कर,रात-रात भर तैयारी कर बच्चों को पढ़ाते हैं. सिलेबस भी ऐसा कि स्टूडेंट्स से ज्यादा टीचर्स को पढ़ना पड़ता है और स्टूडेंट्स भी कमबख्त इतने शरीर कि ठीक से ना पढाओ तो प्रिसिपल तक जा धमकते है.. रामलाल भगवान को अक्सर धन्यवाद देता कि अच्छा हुआ वह पी.टी.आई. ही बना...पढ़ने-पढ़ाने का कोई झंझट ही नहीं. फिजिकल ट्रेनिंग के सिलेबस में तो आजादी के बाद से आज तक कुछ ख़ास बदलाव हुआ ही नहीं - वही सावधान और वही विश्राम..दोनों हाथ बांये फेंको फिर उलटे दायें ..एक कदम आगे तो दो कदम पीछे. मजे की बात ये कि उनके पी.टी. के क्रिया-कलापों को ना तो रोज-रोज प्रिसिपल देख सकता है,ना ही अन्य टीचर्स. एक ही फिल्म को भला कोई बार-बार कैसे झेले ? शोले को अट्ठारह बार देख रामलाल खुद बोर हो गया था.
 तो किस्सा ये है कि जब कभी कोई टीचर अनुपस्थित रहता,छुट्टी पर जाता या ट्रेनिंग में होता तो उनके खाली पीरियेड को भरने पी.टी.आई रामलाल को किसी भी स्टैण्डर्ड के क्लास में कभी भी भेज दिया जाता ताकि विद्यार्थी हो-हुल्लड़ न करे.और क्लास में अमन-चैन रहे.. स्कूल में सब उन्हें टाईम-पास टीचर भी कहते. प्रिसिपल के आदेश के तहत उन्हें सब करना पड़ता. वह बिना किसी तकरार के किसी भी क्लास में बैठकर बच्चों का टाईम पास कर खुद का भी निपटा लेता.
एक दिन जब आठवीं क्लास के गणित टीचर तिवारीजी एकाएक अनुपस्थित हुए तो उनके पीरियेड का जोड़-तोड़ करने पी.टी.आई.रामलाल को भेजा गया. उनका तो गणित से कोई दूर-दूर का भी नाता नहीं था...प्लस-माइनस कर लेता, इतना ही काफी था... इस विषय में भला विद्यार्थियों को क्या टीप देता ? टाईम-पास करने उसने  बच्चों से कहा कि जो छात्र सबसे ज्यादा कल्पना की ऊंची उड़ान भरेगा,उसे वह एक पारकर पेन ईनाम में देगा.
छात्रों ने पूछा- कैसी कल्पना - कैसी उड़ान सर ?
 तब उसने हिंट दिया कि सामान्य जीवन के जो क्रिया-कलाप हैं-उससे अलग-थलग,कुछ हटकर असामान्य बातों की कल्पना करो- कल्पना करो कि हम आस-पास के ग्रहों में बिना वीसा-पासपोर्ट के आसानी से आ-जा सकें तो कैसा हो ? कल्पना करो कि अगर घर की वस्तुएं भी हमारी तरह चलने-फिरने लगे तो क्या हो ? आदि-आदि. सारे छात्र विषय और आशय को समझ गए. फिर चार-पांच वक्ताओं ( विद्यार्थियों ) ने बारी-बारी से अपनी-अपनी कल्पनाओं में रंग भरे.
  पहले विद्यार्थी ने कल्पना की उड़ान भरते कहा- सर, पूरे विश्व में आज जाम (ट्रेफिक जाम) की स्थिति है.दिन-ब-दिन यह और बिगडती जा रही...काश हम हवा में उड़कर आ-जा पाते..
पी.टी.आई ने टोका- ये कल्पना तो कब से साकार है बरखुरदार ..हम उड़ तो रहे है-विमान से, हेलीकाप्टर से,अन्तरिक्सयान से..
नहीं सर..मेरा मतलब इंडीव्यूजुअल से था..हम यूं ही जब चाहे हवा में छलांग लगा दौड़ पाते, चल पाते, उड़ पाते..
पी.टी.आई. ने पुनः टोका- पहाड़ से छलांग मारते लोग पैराग्लाईडिंग तो कर ही रहें हैं..
नहीं सर..मेरा आशय बिना किसी अतिरिक्त अटेचमेंट के उड़ने से था-जैसे चिड़िया उडती  है..फुर्र से कभी भी उड़ जाती है और बिना किसी रनवे के कहीं भी उतर भी जाती है..
फिर तो भैय्या ..जैसे विमानों के लिए ए.टी.सी. होता है वैसे ही कुछ व्यवस्था करनी होगी..हवा में फोर-लेन, सिक्स लेन बनाने होंगे..जिनके पास हवा में उड़ने का लाइसेंस होगा,वे ही हवा में उड़ेंगे और बाकी बी.पी.एल.टाईप के लोग नीचे अपनी सुविधानुसार   चलेंगे..आधे ऊपर और आधे नीचे...नीचे वालों पर हमेशा मौत का साया मंडराता रहेगा..क्या मालुम कब कोई ऊपर से मौत बन सर पर टपक जाए..ऊपर एक्सीडेंट होगा तो ऊपर कोई मरे न मरे नीचे वाले का मरना तो तय..तब अखबारों में कुछ इस तरह के न्यूज पढने मिलेंगे- कल रात आकाशमार्ग क्रमांक-तीन में दो हडताली गुटों के बीच जबरदस्त संघर्ष हुआ जिसमें बत्तीस हड़ताली कलेक्टोरेट पहुँचने की जगह देवलोक पहुँच गए. बाकी जो बचे ,उनमें से चालीस हडताली नीचे सदर बाजार इलाके में गिरकर काल-कलवित हो गए.. कुछ भाग्यशाली जो इस हादसे में बचे वे सरकारी हास्पीटल में आखिरी सांस गिन रहे..मरने वालों में दोनों पक्ष के हडताली शामिल. इस हादसे में बाजार के बारह दुकान चपेट में आने से तेरह राहगीर ,चौदह गाय और पंद्रह आवारा कुत्ते भी मारे गए..
  सब छात्र हो-हो कर हंसने लगे. पी.टी.आई. ने उस विद्यार्थी की पीठ ठोंकी और फिर दूसरे को आमंत्रित किया. दूसरे ने उड़ान भरते कहा- सर,क्या ही बढ़िया होता,अगर पशु-पक्छी भी हमारी तरह बोलते..
पी.टी.आई.ने कहा - बोलते तो हैं यार..कुत्ता भौं भौं करता है,गाय रंभाती है, गधा रेंकता है,बकरी में-में करती है,कौआ कांव-कांव करता है,बिल्ली मिमियाती है,सांप फुंकारता है..
नहीं सर..मेरा तात्पर्य है कि हम जिस तरह आपस में बोलते-समझते हैं, वैसी ही   समझ और बोलने की क्षमता उनमें होती.. हम आपसी संवाद कर पाते तो क्या बढ़िया होता..
पी.टी.आई बोला - बढ़िया नहीं मेरे लाल..बड़ी दुर्गति होती..केवल मानव जाति के शोर-शराबे से ही इस कदर ध्वनि प्रदूषण है..इन्हें शामिल कर क्यों सृष्टि को बर्बाद करना चाहते हो ?
अरे सर..इसमें बर्बादी वाली क्या बात है..इसके फायदे भी तो देखिये-आज हम पालतू जानवरों के साथ जाने-अनजाने कितना जुल्म करते हैं..उनसे हाड तोड़ काम लेते हैं पर बदले में क्या देते हैं ? मुट्ठी भर दाना-पानी ताकि वो जिन्दा रहे और हमारी जरूरतों को पूरी करता रहे..इनमें जुबान होगी तो हक़ के साथ बोल तो सकेंगे कि भैया..कम से कम पेट भर खाना तो दिया करो.
हाँ..और दूसरी बातें तुम नहीं सोच रहे हो..कल को ये भी मजदूर यूनियनों की  तरह कई यूनियन बना लेंगे..बकरे कटने से मना कर देंगे..मुर्गे सुबह-सुबह बांग नहीं देंगे मच्छर पूरे घर के दरों-दीवार पर पोस्टर चस्पा कर देंगे- जीव हत्या बंद करो बैल कभी भी हल जोतते-जोतते अचानक बोनस-एरियर्स पर अड़ जायेंगे..गधे मानव अधिकार आयोग की तरह कोई आयोग गठन कर शारीरिक शोषण के खिलाफ जंग छेड़ देंगे..घोड़ियाँ वर को अपनी पीठ पर बिठाने के पूर्व अपने लिए दो-चार वर मांगेगी..काबुली चना..ताज़ी घास आदि-अदि..
पी.टी.आई.की बाते पूरी भी नहीं हुई कि बच्चे ताली पीटने लगे.तब तीसरे वक्ता को अपनी बात रखने आमंत्रित किया. तीसरे ने कहा- सर..पशु-पक्छी न सही..अगर पेड़-पौधों के साथ संवाद कायम हो जाए तो कितना अच्छा होगा..
क्या अच्छा होगा बताओ  ? उसने पूछा.  
सर..कोई बच्चा लापता हो जाए तो हमें पुलिस के पास नहीं जाना होगा..आसपास खड़े बड़े-बड़े पेड़ों से पूछ लेंगे- पीपल भैया..टिंकू को कहीं आते-जाते देखा क्या? तब वह मिनटों में ही अपनी लम्बी-लम्बी जड़ों से आसपास के पेड़ों को तरंगे भेज, पता कर बता देगा कि टिंकू तालाब के किनारे वाले बबूल के नीचे बैठा रो रहा है..यह भी बता देगा कि उसके क्रांतिकारी क्रंदन से बबूल लाल-पीला भी हो रहा है..जल्दी जाकर उसे कब्जे में लें..
और कुछ ?
सर..घर की चौकीदारी के लिए हमें कुत्ते पालने की जरुरत नहीं होगी.गार्डन में दो-चार लम्बे-लम्बे पेड़- नारियल,अशोका,पाम जैसा लगा देंगे..पूरी रात वे चोर-उचक्कों पर नजर रखेंगे..और दूसरी बात ये कि आज जंगल के जंगल तेजी से कट रहें हैं..लकड़ी चोरों का गिरोह रातों-रात कीमती लकड़ियाँ काट ले जाते हैं..इनमें जुबान होगी तो कम से कम चिल्ला तो सकेंगे- हेल्प-हेल्प..
पी.टी.आई.ने बात काटते कहा- काटने वाले तो जुबान पर पट्टी बाँध काट ले जायेंगे..दूसरे पहलू पर भी सोचो..हम आसानी से  आम, सेब, संतरा नहीं तोड़ पायेंगे..वे टूटने से इंकार करेंगे ..यही कहेंगे- टपके तभी खाना ..टपकने के इंतज़ार में हमीं टपक जायेंगे..गुलाब, सेवंती, मोंगरा तोड़ना भी मुश्किल काम हो जाएगा तब पत्नी या प्रेयसी के जूडे में क्या टाँकेंगें ? बाबाजी का ठुल्लू ?’
 सारे विद्यार्थी ठहाका मार हंसने लगे.
अगले वक्ता को आमंत्रित करते पी.टी.आई. ने कहा- पेड़-पौधे, पशु-पक्छी को छोड़ कोई नई उड़ान भरो यार..
तो उस वक्ता ने बोलना शुरू किया- सर..क्या ही बढ़िया होता कि हम सब भी एलियन जैसे होते..सब के सब एक जैसे दिखते..जैसे फिल्म कोई मिल गया में जादू दिखता था..तब ना रंगभेद का कोई झंझट होता ना खूबसूरत-बदसूरत दिखने का रोना..सब बिना किसी टेंशन के मेल-जोल के साथ ठाठ से रहते..
नहीं बेटे.. पी.टी.आई.ने समझाया- ऐसा नहीं है..बचपन में मैं भी तुम्हारी तरह सोचता था..तब सारे पगड़ी वाले सरदार मुझे एक-से लगते..होश सम्हाला तब जाना कि देविंदर और तेजिंदर में अक्षय और अजय (देवगन) जितना फर्क है... तुम एलियन बनोगे तब यह फर्क समझ आएगा ..ठीक है..बैठ जाओ..अब पांच मिनट ही बचे हैं पीरियेड ख़त्म होने में...कोई और उड़ना चाहे तो जल्दी करे..
एक विद्यार्थी उठा और कहने लगा- सर..मेरी कल्पना कुछ हटकर है..क्या ही अच्छा होता कि औरतों की तरह मर्द भी बच्चे जनते ..एक बार माँ पैदा करे तो नेक्स्ट टर्न बाप....बारी-बारी दोनों प्रिगनेंट होते ..
गुड..वेरी गुड....तुम्हारी कल्पना सचमुच धांसू है....अब इसके फायदे-नुकसान पर भी प्रकाश डालो..
सर..फायदा ये कि नारी-शक्ति को थोड़ी राहत मिलेगी.. बच्चा जनने में ही बेचारी की सारी उर्जा चूक जाती है..थोडा तो आराम मिलेगा..और फिर हर बार वही क्यों पैदा करे ? मर्द पैदा करे तो वह भी जाने पीर पराई ...जाने कि नौ महीने चारदीवारी में कैसे कटते हैं..जाने कि डिलवरी कितना डेंजरस इवेंट होता है..आज जब सब काम स्त्री-पुरुष कंधे से कन्धा मिला कर रहे हैं तो डिलवरी क्यों नहीं ?. कितना मजा आएगा जब कोई पूछेगा- आपके पापा आजकल नहीं दिखते ..दौरे पर हैं क्या ?
तब बिटिया जवाब देगी- नहीं अंकल....पापाजी पेट से हैं..आठवां चल रहा है न..
स्कूलों में भी बर्थ सर्टिफिकेट में एम या एफ.लिखा होगा जैसे फिल्मों के आरम्भ में दिखाया जाता है कि फिल्म सर्टिफिकेट या यू वाला है..बच्चों के सर्टिफिकेट देखते ही पता चल जाएगा कि माँ ने जना या बाप ने..माँ वाले में ऊपर एफ(फीमेल).लिखा होगा और बाप वाले में एम (मेल)..
तभी स्कूल-बेल बजी और पीरियेड ख़त्म हो गया...आखिरी वक्ता अपनी उड़ान पूरी न कर पाया फिर भी पी.टी.आई.रामलाल ने उसे ईनाम में पारकर पेन देकर धांसू उड़ान के लिए सम्मानित किया.
रामलाल घर लौटा  तो बार-बार उस छात्र की बातें दिमाग में कौंधती रही.. उसकी पत्नी  दूसरी बार अभी पेट से है.. अगर कहीं ये उसका ‘टर्न’ होता.. पत्नी की जगह वह पेट से होता तो...? सोचकर ही  उसे उबकाई आने लगी.. वह वाश- बेसिन की ओर लपका ..दो-तीन उल्टियाँ हो गई..पेट भारी लगने लगा..डर गया ि कहीं सचमुच तो....वह पूरी रात सो न सका.. सोचता रहा...कल्पना-मात्र से इतना डर तो भगवान जाने सचमुच ऐसा हो तो क्या हो ?

                         zzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzz
किताब लिखने का भूत / प्रमोद यादव 

‘ गुरूजी.. सुना है कि आप किताब लिखने की सोच रहे हैं..’ गजोधर ने पान चबाते पूछा.
‘ हाँ...सोच तो रहे हैं....तो ?..’
‘  नहीं..यूं ही पूछा ..अचानक... हम कुछ समझे नहीं..’
‘ अरे.. समझने वाली क्या बात है ?..और अचानक की क्या बात ?  बड़े-बड़े लोग जब किताब-किताब खेल रहे तो हम क्यों पीछे रहें ? नेता लिख रहे..राजनयिक लिख रहे.. मंत्री लिख रहे..सलाहकार लिख रहे..इसलिए हम भी लिख रहे...’
‘ पर गुरूजी..बड़े लोगों की बड़ी बातें...वे कुछ भी लिख दें तो उनकी पुस्तक का  चर्चित होना लाजिमी..मिडिया वाले भी उन्हें सर-आँखों में बिठाए बढ़िया टाईम पास करते हैं..चार लोगों को बिठाकर बहस कराते हैं..पुस्तक में कही बातों की प्रामाणिकता पर हल्ला बोलते हैं.. जिन पर लिखते हैं..उनकी प्रतिक्रिया सुना लोगों का शानदार मनोरंजन करते हैं.. मुफ्त में ही पुस्तक का प्रोमो कर लेते हैं.. वैसे लोग कहते हैं कि अक्सर दो ही तरह के लोग किताब लिखते हैं-एक, जो घोर साहित्यिक होते हैं..और दूसरा वे जो दीन-दुनिया से हटे -कटे ‘चूके टाईप के होते हैं... पार्टी या सत्ता से सताए-तडपाये-निकाले गए होते हैं..दूसरे वाले लेखक  किताब लिखकर मन का बरसों पुराना गुबार निकालते हैं..भड़ास निकालते हैं..गड़े मुर्दे उखाड़ कितनों को जड़ से  उखाड़ने की कोशिश करते हैं..मजा तब आता है जब आरोपित नायक भी ईंट का जवाब पत्थर से देने की कोशिश में हल्ला बोलता है -किताब का जवाब किताब से देंगे जैसे नारे के साथ कहता है -हम भी अब किताब लिखेंगे....उसमें अपनी प्रतिक्रिया देंगे..पहली किताब के लेखक को लिखने में तो दस साल लगे अब ना जाने दूसरा लेखक अपनी प्रतिक्रिया (किताब) देने में कितने साल लेंगे .. खैर..वे किताब-किताब खेलें..उनसे हमें क्या ?..हमें तो ये समझ नहीं आता कि आप किस वजह से और किन बातों को लेकर लिखेंगे ? और किस पर भड़ास निकालेंगे ? किसकी खाल खींचेंगे ? आप न तो बड़े लोगों में शुमार हैं..ना ही प्रेमचंद जैसे घोर साहित्यिक लोगों में ? ‘
‘ कैसी बातें करते हो गजोधर...चलो हमने माना हम बड़ों में शुमार नहीं..पर लेखक तो हैं..प्रेमचंद जैसे न सही..पर हमारे नाम में तो दो-दो बार प्रेमहै....प्रेम नारायण ‘प्रेम..और तुम तो जानते हो यदा-कदा हम लिखते भी हैं.. शहर में जो दो पन्ने का सांध्य–दैनिक पहट निकलता है,उसमें एक-एक लाईन का भविष्यफल हम ही लिखते हैं..मोहल्ले में जब कबड्डी प्रतियोगिता का आयोजन होता है तो मुख्य-अतिथि का भाषण हम ही लिखते है..स्कूल-पत्रिका का सम्पादकीय हम ही लिखते हैं ( ये और बात है कि नीचे प्राचार्यजी अपना नाम छपवा लेते हैं )..पास-पड़ोस में शादियाँ होती है तो सबके निमंत्रण कार्ड का मजनूंन हम ही तैयार करते हैं..चंडी-चौक में गणेश-दुर्गा स्थापित करते हैं तो पूरे नौ दिन का मैटर हम ही लिखते हैं..’
गजोधर ने उन्हें चुप कराते कहा- ‘ गुरूजी..इसे लेखन नहीं..पत्र – लेखन कहते हैं..ऐसे पेज-दो पेज का तो हम भी बेखौफ बिना किसी कामा,अल्प विराम के लिख लेते हैं..कभी निगम के नल से पानी नहीं आने पर नल-जल विभाग को पत्र तो कभी बिजली बिल अधिक आ जाने पर बिजली विभाग को पत्र ...ऐसे लेखन में कहीं दूर-दूर तक साहित्य नहीं होता..पर असली लेखन में तो साहित्य का पुट होना एक अनिवार्यता है.. तभी तो पाठक पढेंगे..’  
गुरूजी ने तुरंत ही बात काटते सफाई दी- ‘ भई गजोधर..लेखन-लेखन होता है..बस इतना जानते हैं- हम लिखते हैं...गैर-साहित्यिक बड़े-बड़े जो पूर्व-अभूतपूर्व नेता-मंत्री लिखते हैं,उनसे तो बेहतर ही लिखते हैं..और फिर भला ऑटो बायोग्राफी (आत्मकथा) लिखने में साहित्यिक होना क्या जरुरी ? ‘
‘ तो क्या आप आत्मकथा लिख रहे हैं ? ‘ गजोधर चौंका
‘ और नहीं तो क्या ? ‘
 ‘पर गुरूजी..आपके अब तक के पूरे सपाट जीवन को..रिटायरमेंट तक तो हमने अपनी आँखों से देखा-परखा और भोगा है..और अभी भी देख रहे हैं..समझ नहीं आता..आप भला किताब में क्या लिखेंगे ? ‘
‘ क्या मतलब ? ‘गुरूजी ने आँखें ततेरते कहा.
‘ मतलब कि चार सौ पेज आप लिखेंगे क्या ?किस विषय पर लिखेंगे ? किस पर लिखेंगे ? ‘
‘ अरे जो देखा-सुना-भोगा है..उसी पर लिखेंगे ..’ गुरूजी ने जवाब दिया.
‘ लेकिन उसे पढ़ेगा कौन ? ‘ गजोधर ने फिर सवाल दागा.
‘ तुम पढोगे...घरवाली पढेगी.. साली पढेगी..छोटू पढ़ेगा..मुन्नी पढेगी... हमारी सास पढेगी..पड़ोस की रज्जू काकी पढेगी..गुप्ताजी पढेंगे..हमारे पुराने साथी गुरूजी लोग पढेंगे..प्राचार्यजी पढेंगे..हमारे पढाये विद्यार्थी पढेंगे...’
‘ बस..बस गुरूजी..पाठकों की तो आपने झड़ी लगा दी.. ठीक है..अब ये भी बता दो कि लिखोगे क्या और इसे छपवाओगे कैसे ? ‘
‘ देखो गजोधर..कैसे भी करके तीन-चार सौ पेज तो लिख ही लेंगे..पर हमारी इच्छा है कि इसे अंग्रेजी में छपवायें..’ गुरूजी ने अपने मन की बात कही.
‘क्या ? पागल तो नहीं हो गए गुरूजी .. अंग्रेजी में भला कौन पढ़ेगा ? जितने भी पाठकों के अभी नाम गिनाये,उनमें कितनों को अंग्रेजी आती है ? और फिर आप तो खुद अंग्रेजी का ए.बी.सी. नहीं जानते तो लिखेंगे क्या ख़ाक ? ‘ गजोधर तमकते हुए बोला.
‘ यार गजोधर ..तुम समझे नहीं...किताब तो अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी में ही लिखेंगे..पर प्रकाशन किसी अंग्रेजी के विद्वान् से अनुदित कराके अंग्रेजी में ही करायेंगे..’ गुरूजी ने खुलासा किया.
‘ इस कसबे में भला कौन है जो हिंदी से अंग्रेजी में अनुदित करे ? ‘ गजोधर ने शंका जताई.
‘ अरे वो सिद्दकी सर है न जो कालेज में अंग्रेजी पढ़ाते हैं..उनके पास बिटिया भी ट्यूशन पढ़ती है..उसे यह महती काम सौंप देंगे..दो-चार ट्यूशन का एक्स्ट्रा पेमेंट कर देंगे..’
‘ पर गुरूजी..मेरी समझ में ये नहीं आता कि किताब अंग्रेजी में ही क्यों छपवाना है ? ‘
‘ ऐसा है गजोधर..बड़े-बड़े लोग अंग्रेजी में ही किताब लिखते हैं.जैसे.डिस्कवरी आफ इंडिया”.. विंग्स आफ फायर”..”द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर.. थ्रू द कारीडोर्स आफ पावर..वाकिंग विद लायंस.. आदि-आदि.. अंग्रेजी का एक अलग ही इम्प्रेशन पड़ता है..इसलिए..’
‘ अच्छा..ठीक है..पर आप लिखोगे क्या ? आपके पूरे सपाट जीवन की अतुकांत कहानी तो इसी कसबे से शुरू होकर इसी कसबे में ख़त्म होती है..बत्तीस साल स्कूल में गुरूजी रहे..डी.ई.ओ. आफिस से ज्यादा दूर कभी कहीं गए नहीं..तो फिर किस पर और क्या लिखेंगे..किसकी तारीफ़ लिखेंगे ? किसकी टांग खीचेंगे ? ‘ गजोधर ने गुस्से से पूछा.
‘ गजोधर भैया..इतना परेशांन तो हम नहीं हो रहे जितना तुम हो रहे हो..समझ लो हमने किताब लिख ली..अब तुम जरा प्रकाशन की व्यवस्था में सहयोग कर दो.. हमें नहीं मालूम कि कहाँ छपेगा ? कैसे छपेगा ? कितने में छपेगा ? ‘
‘ या कोई छापेगा भी या नहीं? ‘ गजोधर ने एक और पंक्ति जोड़ते कहा.
‘ अरे यार तुम तो टोक पे टोक ही लगाए जा रहे हो..हमें लिखने के पहले ही हतोत्साहित कर रहे हो..तुम्हारी तरह दो-चार और मिल जाए तो हम तो किताब लिखने से रहे....’ वे उदास हो बोले.
‘ यही ज्यादा अच्छा होगा गुरूजी आपकी सेहत के लिए..क्यों रिटायरमेंट के पैसों को बर्बाद करने पर तुले हैं.. आप टी.वी. देखना..समाचार देखना बंद कर दें तो किताब लिखने का भूत वैसे भी उतर जाये.. टी.वी. में चाकलेट का विज्ञापन देख जैसे बच्चे उछलते हैं..वैसे ही आप भी कुछ का कुछ करते रहते  हैं..अरे उन्होंने किताब लिखा तो लिखा..  अब उनके दुश्मन लिखे तो लिखे.. इन सबके पास तो कोई काम-धाम नहीं..आपके पास तो है ना ?..उनकी नक़ल क्यों कर रहे ? ‘ गजोधर ने उनकी बिमारी पकड़ समझाईश दी.
‘ तो कुल मिलाकर तुम यही कहना चाहते हो कि हम किताब न लिखें ? ‘ गुरूजी सीरियस हो बोले.
‘ बिलकुल..’ गजोधर ने कहा.
‘तो चलो नहीं लिखते ...तुम्ही खुश रहो.. हमें भी भारी टेंशन था कि क्या लिखेंगे ? पिछले कई दिनों से सोच-सोचकर पागल हुए जा रहे थे...न सोते बनता था न जागते.. किताब की मार्केटिंग को लेकर भी परेशान थे.. अब हम टेंशन फ्री हैं ..आज चैन की बंशी बजाते..घोड़े बेच सोयेंगे.. ..धन्यवाद यार गजोधर.. हतोत्साहित करने का शुक्रिया....शुभ-रात्रि .. हम चलते हैं.. बड़ी जोरों की नींद आ रही..’
इतना कह गुरूजी पानठेले के बेंच से उठकर चलते बने..और गजोधर मन ही मन हंसते हुए घंटे भर पहले के महान लेखक को जाते देखता रहा...

                         xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
बरसात में..../ प्रमोद यादव




हमसे मिले तुम सजन...तुमसे मिले हम...बरसात में..
अगर बरसात को लेकर इस तरह की बातें आपके जेहन में उमड़-घुमड़ रहे हैं तो आप बिलकुल ही गलत सोच रहें हैं..क्योंकि किसी भी बरसात में सजनी हमसे मिलने कभी नहीं आई..और आती भी तो कैसे ? पुराना ज़माना था...पुराने लोग थे..और तब एक घर में एक ही छाते का युग था... वह भी बिग साईज के बारह काडीवाले ( कड़ीवाले) फैमली-पैक छाते का....एक के नीचे ही पूरा परिवार समां जाता..दूसरे की कोई गुंजाईश ही न थी..बस..एक घर-एक छाता....बड़े ही अमीर किस्म के लोगों के घर ही एक से अधिक छाते हुआ करते...वे होते भी तो मोहल्ले की तरह थे- पचास-साठ.. और कहीं-कहीं सत्तर भी ..तब लेडिज छाते का आविर्भाव नहीं हुआ था..ना ही कम काडी वाले छाते बाजार में उपलब्ध थे..सबका मालिक एक की तरह यही एक छाता यत्र-तत्र-सर्वत्र हर घर में उपलब्ध हुआ करता.. लेडिज-जेंट्स सभी बरसात के दिनों बारिश होने पर इसमे घुसे पड़ते..जैसे छाता-छाता न हुआ,गोवर्धन पहाड़ हुआ..
रेनकोट का भी शुरूआती दौर था.. वह काफी भारी हुआ करता - वजन में भी और दाम में भी.. तब केवल ऊँचे लोगों की पहुँच की चीज थी रेनकोट..यह सर्वथा एक व्यक्ति के लिए ही हुआ करता.. इसे हट्टे-कट्टे पहलवान जैसे लोग..खलनायक और कानन डायल के शरलक होम्स टाईप के लोग ही ओढ़ा करते..रियल-लाईफ से ज्यादा यह फिल्मों में ज्यादा दिखाई पड़ता..उन दिनों जब भी किसी को यह लबादा ओढ़े देखता, बोझ से हमारा बदन झुकने लगता .. इसकी खासियत ये थी कि इसे पहनने के बाद अच्छा-ख़ासा आदमी भी भयावह दिखने लगता..
हाँ...तो हम बता रहे थे कि ना हमने कभी बरसात में डम–डम डिगा-डिगा..मौसम भीगा-भीगा गाया.. ना ही राजकपूर–नरगिस की तरह एक छाते के नीचे प्यार हुआ इकरार हुआ..कभी गा सके..सारे मौसम में तो मिलना-जुलना हो जाता पर बरसात में बेचारी ‘वो’ घर में ही धरी की धरी रह जाती. उस पार साजन..इस पार dhaareधारे....जैसी हालत में किनारे ही रह जाती..हर बरसात में पिया मिलन की बात सोचती लेकिन उस एक अदद छाते को कभी दादाजी लेकर चलते बनते तो कभी बाबूजी..कभी भैया दुकान लेकर चले जाते तो कभी मम्मी लेकर चली जाती पड़ोस में..उसका नंबर कभी लगता ही न था..और छाते के छलावे में यूं ही बरसात निकल जाती..वो पिया मिलन को तड़प-तड़प कर रह जाती ..हमने कई बार कहा कि अपने बाप से दूसरा छाता खरीदने क्यों नहीं कहती तो अक्सर वो बापू के उदगार यूं बताती- ‘ जब एक ही छाते में सबका काम चल रहा है तो दूसरा खरीदने की फिजूलखर्ची क्यों ? और फिर दो-चार महीने ही तो काटने हैं..’
कहते है- बरसात में.. टप- टप बरसते पानी में पिया मिलन की तड़प कुछ ज्यादा ही जोर मारता है..एक बार ऐसे ही हालात में वो आर या पार का मूड बना मूसलाधार बारिश में हमसे मिलने अपने बाप-दादा के जमाने की बारह काडीवाले विशालकाय इकलौते छाते को ले बेखौफ निकल पड़ी...मौका भी एकदम माकूल था..ना घर में दादाजी थे ना ही बाबूजी...भैया भी मामा के यहाँ गए थे...मम्मी ‘आलरेडी’ मामा के यहाँ ही थी...छाते की डंडी को मजबूती से थामे हौले-हौले पैर जमा-जमाकर,पानी भरे गड्ढों को पार करते चल रही थी.. कभी जोर से हवा चलती तो घबरा जाती..डर जाती कि कहीं छाता उसे उड़ाकर पिया के घर की जगह बन्दूक वाले प्यारेलाल की नाली में न पटक दे..हमसे मिलने की सुध में बेसुध होकर चल रही थी कि दो फर्लांग बाद ही एकाएक पड़ोस के चंदू काका बिना किसी परमिशन के बलात ही छाते में घुस गए और हें..हें..कर हंसते हुए कहने लगे- बिटिया..सीधे ही जा रही हो ना..हमें गुप्ताजी की दुकान तक जाना है..पापड लेने है..
वो क्या कहती ? चुपचाप चलती रही..छाते की कमान उसने(चंदू काका ने) जबरदस्ती ही छीनकर सम्हाल ली.. अभी एक फर्लांग ही और बढे होंगे कि फिर एक मियां बलात छाते में तेजी से घुसते बोले- अरे चंदू मियां..हमें भी साथ ले लो ..हमारे छाते को तुम्हारी मामी लेकर गई है..हमें आटा-चक्की तक छोड़ देना..और हाँ..लौटते में हमें ले लीजियो.. उसने छाते की मालकिन को नोटिस ही नहीं किया..उसे देख बस इतना ही बोले- तुम कहाँ जा रही हो बिटिया ? बिटिया की इच्छा तो हुई कि कह दे- तुम सब कमीनों के साथ जहन्नुम में.. पर चुप रही..सोचती रही कि इस तरह हर एक फर्लांग में अवांछित तत्व आते-जाते रहे तो  पिया मिलन को जाना.. कभी होगा ही नहीं..  उसे पहली बार उपरवाले पर और छाता बनाने वाले पर गुस्सा आया..चलो..उपरवाले ने तो बरसात बनाया.. ठीक ही बनाया..पर जिसने भी छाता बनाया-उसने किंग साईज छाता क्यों बनाया ? दो-चार काडी वाला बना देता तो उसका क्या बिगड़ जाता? लंदू-फंदू-चंदू जैसे लोगों से तो निजात मिलता.. तभी अचानक चंदू काका के तेजी से बाहर सटकते ही उसकी तन्द्रा भंग हुई..गुप्ताजी की दूकान में दौड़कर वे गायब हो गए..बारिश काफी तेज थी..इसके पहले कि वह आगे बढती एक सज्जन और तेजी से छाते में बलात घुस आये..उसे देखते ही वह चौंक गई और बेतहाशा डर भी गई..वो बाबूजी थे..देखते ही बोले- अरी  बिटिया...तुम ? इतनी बारिश में कहाँ जा रही हो ? इसके पहले कि वह कुछ जवाब देती बाबूजी नरमी के साथ बोले- चलो..अच्छा हुआ..तुम आ गई..हम तो परेशान थे कि इस मूसलाधार बारिश में घर कैसे जायेंगे ?..चलो चलते हैं.. तब वह बोली- बाबूजी..ये मामाजी को सामनेवाले चौक में जाना है
हाँ..ठीक है..चलो..गोवर्धन को छोड़ते हुए चलते हैं..कहते हुए छाते की कमान उन्होंने सम्हाल ली और बरसाती पानी में वे ‘फचक-फचक’ कर चलने लगे...आखिरकार लौट के बुद्धू घर को  आये की तर्ज पर वह विशालकाय छाते के साथ जैसे गई थी,वैसे ही बैरंग और बेरंग हो लौट आई.. पिया मिलन की जो भारी तड़प और रंगीन तबियत लिए चली थी उस पर पानी फिर गया..इस अप्रिय घटना की जानकारी उसने बाद में हमें दी तो हम घंटों हँसते रहे.. इसके बाद भी हर बरसात में वो मिलन की तड़पन लिए कोशिश करती लेकिन हमेशा नाकामयाब रहती..कई बार तो हमने घर का छाता चुरा उसे बतौर गिफ्ट देना चाहा पर वो अक्सर ना-ना करती..कहती- घरवाले पूछेंगे तो क्या जवाब दूँगी ? इतना बड़ा गिफ्ट भला कोई किसी को देता है ? छाता वो भी पूरे बारह काडी वाला ?
एक बार हमने शरलक होम्स वाले एक रेनकोट की व्यवस्था कर, poझिल्ली में पैक कर जबरदस्ती ही उसे थमा दिया और कहा कि इस बार की पहली बरसात में बारिश होने पर इसे पहनकर आना...छाते का नाम भी मत लेना..किसी को पता भी नहीं चलेगा..चुपचाप पहन के निकल आना..उसने भी हिम्मत दिखाई..और वादा किया कि इस बार की बारिश में जरुर मिलेंगे..जब साल की पहली झमाझम बारिश हुई तो उम्मीद जगी..सजनी जरुर रेनकोट पहन आएगी.. दरवाजे पर खड़े हो हम इन्तजार करते रहे....बादल गरजता रहा..बिजली चमकती रही..पानी गिरता रहा..और फिर हौले से जैसे किसी ने ब्रेक मारा हो..बारिश थम गई पर वो नहीं आई..मोबाईल का जमाना होता तो पूछ भी लेता- व्हाट इश रांग विथ यू ? पर वैसा कुछ न था...बरसात बीतने के कई दिनों बाद उसकी एक सहेली के मार्फ़त एक पत्र मिला..जिसमें उसने नहीं मिल सकने का भारी दुःख और खेद जताया था..आगे उसने सविस्तार लिखा था कि पहली बारिश के दिन वह रेनकोट पहन एकदम आने को तैयार ही थी कि अचानक दर्पण के सामने खुद को निहारने का लोभ संवरण नहीं कर पाई ..और दर्पण में खुद को देखते ही डरकर बेहोश हो गई..घंटों बेहोश रही..होश में आई तो बारिश थम चुकी थी..इसलिए नहीं आ सकी..इस बात के लिए उसने कोटि-कोटि माफ़ी मांगी..और हर साल की  तरह फिर प्रामिस की  कि अगले साल जब रिमझिम के तराने लेकर बरसात आएगी तो निश्चित ही मिलेंगे..और इश्वर ने चाहा तो  आगामी बारिश में खूब रपटेगे भी और फिसलेंगे भी..अमिताभ और स्मिता की तरह..
हम मूरख भी हमेशा की तरह अगले साल के लिए मान गए.. और आशान्वित रहे कि कभी न कभी तो बरसात में एक लड़की भीगी-भागी सी..सोती रातों में जागी सीजरुर आएगी.... पर ऐसा कभी न हुआ..  आगामी बरसात के पहले ही एकाएक उसकी शादी हो गई और वो सजनी से ससुराल गेंदाफूल हो गई..
एक दिन बरसात में बारिश से बचने बाजार में नाई की दूकान के अहाते में हम खड़े थे कि एक नव-दंपत्ति को एक छाते के नीचे हँसते-इठलाते,कहकहे लगाते नजदीक आते देखा..गौर से देखा तो वो सजनी थी..पतिदेव के साथ बारिश का लुत्फ़ उठा रही थी.. उन्हें देख हम हक्के-बक्के रह गए.. ताउम्र सपने हम देखते रहे और हकीकत की दुनिया में वो उल्लू का patthaपठ्ठा प्यार हुआ..इकरार हुआ जैसे दृश्य को  फिनिशिंग टच दे रहा था ..बरसात में इतने भी बुरे दिन होते हैं-पहली बार महसूस किये.. एकाएक ही बदन तपने लगा..पसीना छूटने लगा..

अब तो हर साल हमारे साथ यही होता है..जब भी किसी जवाँ जोड़े को छाते के नीचे देखते  हैं ..बरसात में...
प्रमोद यादव का शिक्षक दिवस विशेष व्यंग्य - एक शिक्षक की संक्षिप्त कथा
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgLZ4vlAJ_Kz3MzDl6GMJbv0REAm-x92qc5dZCQPKdcyXc-C2D050KkVWggXnxRtqiTGOc0zQ2dfBoxlOHCHpNXPuqo0JZQgSxzb0j0gWpJSjL0nljDrSE-ghkI-AYXqw1tHnO4FEOgHCc/?imgmax=200
एक शिक्षक की संक्षिप्त कथा../ प्रमोद यादव
जब कभी सेठ-मारवाड़ी के बच्चों को ( जवानों को भी ) दुकान के गद्देदार आसन में बैठे लाल- हरे नोटों की गड्डी गिनते देखता हूँ तो ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हे भगवान ! यह जनम तो एक शिक्षक के घर जनम लेकर व्यर्थ और अनर्थ हुआ ..अब अगले जनम का कोई चांस बनता हो तो कृपा करके किसी मालदार सेठ-मारवाड़ी की गोदी में ही डालना .. क्या ठाठ की जिंदगी होती है इनकी...गरीबी और अभाव तो इन्हें कभी छू तक नहीं पाता...पैदा होते ही.सिल्वर स्पून इन माउथ ‘... इनके घरों में बच्चे कितने लाड-प्यार से पलते-बढ़ते हैं..खिलौने खेलने की उमर में पूरा का पूरा मीना बाजार इनके आगे-पीछे होता है.. औरों की तरह एक-दो झुनझुने से इनका मन नहीं बहलता....पढ़ने-लिखने की उमर में न तो बच्चा परेशान होता है ना ही इनके माँ-बाप.. बच्चा स्कूल गया तो अच्छा और नहीं गया तो और भी अच्छा..छोटी उम्र में ही बड़ा जाब थमा देते हैं...पुश्तैनी दुकान में बिठा देते हैं..जितने समय में उसका कोई हमउम्र मेट्रिक होकर निकलता है उतने समय में ये दुकानदारी में डाक्टरेट कर लेते हैं..
हमारे यहाँ तो पैदा होते ही बच्चे को सिर के ऊपर से कान पकड़ने की प्रेक्टिस कराते हैं..और जिस दिन भी बच्चा कान पकड़ लेता है उस दिन से उसकी उलटी गिनती शुरू हो जाती है.. कान पकड़ने का सिलसिला फिर अनवरत जीवन भर चलते रहता है..स्कूल में बात-बात पर मास्टरजी पकड़ते हैं.. तो घर में गाहे-बगाहे माँ-बाप ....कालेज के दिनों में धोखे से कहीं प्यार-व्यार के चक्कर में पड़ गए तो बार-बार खुद ही पकड़ने होते हैं कान ..छोटी-छोटी बात के लिए माशूका से माफ़ी जो मांगनी होती है..इससे बच गए तो शादी के बाद पूरा दुकान (दोनों कान) बीबी की प्रापर्टी हो जाती है..वह पकड़ती तो नहीं बल्कि खा जाती है कान ..अनाप-शनाप इधर-उधर की बातें सुना-सुना के....
खैर..तो बात चल रही थी पढाई-लिखाई की....बड़े घरों के बच्चे ना भी पढ़े तो कोई हर्ज नहीं पर किसी शिक्षक का बच्चा पढ़ाई-लिखाई में अरुचि दिखाए तो शामत ही आ जाती है..बार-बार उलाहने दिए जाते हैं, चेतावनी दी जाती है कि पढोगे नहीं तो कुछ बनोगे कैसे ? ( कुछ बनोगे से तात्पर्य केवल शिक्षक बनने से होता है ) और आगे ऐसी स्थिति में कुली-कबाड़ी या चपरासी-चौकीदार बनने का मुफ्त आशीर्वाद देते हैं....बाबूजी को लगता है कि शिक्षक बनकर वे सर्वपल्ली राधाकृष्णन बन गए..बार-बार उनका उदाहरण दे शिक्षकों का गुणगान करते थकते नहीं.. शिक्षक-दिवस के दिन तो पूरे पल्लीमय हो जाते हैं..बड़े ही मनोयोग से मनाते हैं- ये दिवस..जैसे उनका अपना ही जन्म-दिवस हो..गुरु-शिष्य परंपरा पर धुंआधार भाषण भी देते हैं..अब उन्हें कौन समझाये कि वैसे दिन कब के लद गए..वे गाँव-देहात में बरसों से पढ़ाते रहें इसलिए उन्हें इसका इल्म नहीं..लेकिन जबसे शहर में ट्रांसफर होकर आये हैं, उनके पाँव के नीचे की जमीन खिसकने लगी है..बार-बार गाँव को याद कर कहते हैं-कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन को.. अक्सर कहते हैं-शहरों में इस उच्चकोटि के सम्माननीय ( शिक्षकीय ) कार्य का इतना भयंकर अवमूल्यन कैसे हुआ-समझ नहीं आता..शहर में आके इन्हें दाल-आटे का भाव मालूम होने लगा है ..देहात में तो साग-सब्जी,दाल-चांवल ,गेहूँ ,प्याज,टमाटर आदि मुफ्त ही मिल जाया करते..विद्यार्थी बड़े प्यार से ये सब स्कूल में बतौर चढ़ावाले आते ..कभी-कभी (परीक्षा के दिनों में) बच्चों के पालक भी घर पहुँच सेवा बजा देते..
शहर में तो आधे से अधिक तनखा इसी सब में घुस जाता है..ऊपर से हर एक-दो दिन में स्कूल में नए-नए कार्यक्रम...नए-नए फरमान...गाँधी जयंती, तुलसी जयंती, तिलक जयंती,बाल-दिवस, गणतंत्र दिवस,स्वतन्त्रता दिवस तक तो ठीक ..अब तो पर्यावरण दिवस,साक्षरता दिवस,ओजोन दिवस, विज्ञान-दिवस, खेल-दिवस और ना जाने क्या-क्या दिवस मनाते हैं..ऊपर से रोज-रोज का बड़ा ही हारिबलदिवस- मध्याह्न भोजन दिवस....बाबूजी इन दिनों कहने लगे हैं कि यही हाल रहा तो देखना एक दिन ऐसा भी आएगा कि किसी एक दिन हम इन दिवसों की तरह ही पढ़ाई-लिखाई दिवसभी मनाएंगे..पूरे साल में केवल एक ही दिन बच्चे पढेंगे-लिखेंगे..उसी दिन पढाई होगी..उसी दिन परीक्षा और उसी दिन रिजल्ट...अभी-अभी स्कूल में एक नया फरमान आया है कि प्रधानमंत्री जी शिक्षक-दिवस के दिन तीन बजे से पांच बजे तक बच्चों को संबोधित करेंगे..अभी तक तो इस दिन गुरूजी लोग ही भाषण देकर इस दिन तुष्ट हो लेते थे अब यह भी गया..समझ नहीं आता जो आता है वही चाचा बनने को क्यों आतुर रहता है ? कलेक्टर की मीटिंग से लौटने के बाद से बाबूजी बहुत परेशान दिखे..
मैंने पूछा- आप इतने परेशान क्यों हैं ? आवश्यक संसाधन रेडिओ-टी.वी. की व्यवस्था तो सुनिश्चित हो ही जायेंगे..
अरे वो बात नहीं है..बात ये है कि पूरा दिन गया..पहले तो भाषण बाजी के बाद ग्यारह-बारह बजे तक छुट्टी हो जाती थी..अब तो पूरे दिन खटना है..एक बजे तक हमें अपने स्तर पर मनाने का आदेश है..फिर मध्याह्न भोजन कराना है..रोज की तरह सुबह करायेंगे तो बच्चे दोपहर को भला क्यों आयेंगे ? तीन से पांच बजे तक प्रधान मंत्री जी का संबोधन है जिसे हमें सुनना अनिवार्य कहा है..अब शिक्षक-दिवस का भी राजनीतिकरण होने लगा है..वे कुछ खफा-खफा से बोले.
बाबूजी..वोट की राजनीति में सब जायज है..इसमें सफल हुए और चुने गए तो आगे के पांच साल इमेजबनाने में लगते हैं,,हर वर्ग में पैठ बनाने में लगते हैं.. इसे इसी की एक प्रक्रिया मानकर चलें..ज्यादा परेशान न होवें.. मैंने उन्हें ढांढस बंधाया.
शिक्षक-दिवस के दिन शाम को छः बजे वे लौटे तो एकदम हांफने लगे..पूरा चेहरा जैसे पीला पड़ गया था..पसीने से तरबतर थे..आते ही कुर्सी पर धंस गए..मैंने पूछा- क्या हुआ ?...सब ठीक तो है ना ?’
तब वे बोले- गजब हो गया दीनू..सब कुछ होकर भी कुछ ना हो सका. और आगे अब क्या होगा..ईश्वर ही जाने..
अरे पहेली मत बुझाओ..बताओ..क्या हुआ ? ’
तब उन्होंने बताया कि ऐन पी.एम. साहब के भाषण के वक्त बिजली चली गई..और बच्चे हो-होकर हुल्लड़ करते भाग निकले..किसी तरह कुछ बच्चों को रोक पाए..लेकिन बिजली के आते तक पी.एम. का सम्बोधन ही समाप्त हो गया..अब न मालूम क्या होगा ? मेरी शिकायत कलेक्टर के थ्रू कहीं पी.एम. तक न चली जाए.. फिर थोडा रूककर बोले- बेटा..कुछ भी बन जाना पर भूलकर भी शिक्षक मत बनना..बड़े धोखे हैं इस राह में...कभी जनगणना में झोंकते हैं तो कभी चुनाव में..बाकी के दिनों सरकारी योजनाओं में...ईश्वर करे..अगले जनम में भी भूलकर किसी शिक्षक के घर पैदा मत लेना..
मैं एकदम प्रसन्न हुआ कि आखिर बाबूजी ने भी मेरी मंशा पर मोहर लगा दी..अगले जनम के लिए भी छूट दे दिया..पर समस्या ये है कि अगले प्रोग्राम पर कौन मोहर लगाए ? फिर भी आशान्वित हूँ..जब इतना कुछ सुलझ गया है तो ये भी सुलझ जाएगा..किसी न किसी सेठ-मारवाड़ी के घर मुंह में सिल्वर स्पून लिए पैदा हो ही जाऊँगा....और फिर आगे लाल-हरे नोट की गड्डियां गिनूँगा..एकाएक बाबूजी की बातों से तंद्रा टूटी..वे पूछ रहे थे- क्या सोचने लगे ? ‘
कुछ नहीं बाबूजी..आप घबराएं नहीं..कुछ नहीं होगा..दो दिन पहले ही सरकार ने विपक्ष के विरोध के चलते इस कार्यक्रम को स्वैच्छिक कर दिया था..शायद आपको मालूम नहीं..आप आराम करिए.. चैन से टी.वी. देखिये..
मेरी बातों को सुन वे एकदम हलके हो गए.. और टी.वी. आन कर समाचार देखने लगे.. शिक्षक-दिवस के कार्यक्रम देखने लगे...
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
प्रमोद यादव

गयानगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़